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राजपाट: सत्ता का चक्रव्यूह

सरकार के एक मंत्री हरक सिंह रावत के अंदरूनी समर्थन से भी जोश और बढ़ा लिया। बेचारे भूल गए कि सत्ता के हाथ बड़े लंबे होते हैं। सूबे की पुलिस ने जाल बिछाया और धर दबोचा चैनल मालिक को उसके गाजियाबाद के घर से।

Author November 3, 2018 6:29 AM
इस तस्वीर का इस्तेमाल प्रतीकात्मक तौर पर किया गया है।

उत्तराखंड में हरीश रावत के मुख्यमंत्री रहते एक स्थानीय निजी टीवी चैनल के स्टिंग ने सियासी उथल-पुथल मचाई थी। सीबीआइ के गवाह भी बन गए थे इस चैनल के स्वामी। तब भाजपा विपक्ष में थी और केंद्र सरकार का पूरा संरक्षण मिला था संपत्ति के कारोबार से टीवी चैनल के सीईओ बने उमेश शर्मा को। बेचारे शर्मा ने सपना देखा होगा कि सूबे में भाजपा की सरकार बनेगी तो किसी के अच्छे दिन आएं या न आएं पर उनकी पौ बारह जरूर हो जाएगी। यह बात अलग है कि त्रिवेंद्र सिंह रावत की सरकार में उनकी वैसी हनक भी नहीं बन पाई जैसी कांग्रेस के जमाने में थी। ऊपर से ये महाशय मुख्यमंत्री के सबसे चहेते आईएएस अफसर ओम प्रकाश से पंगा ले बैठे।

सरकार के एक मंत्री हरक सिंह रावत के अंदरूनी समर्थन से भी जोश और बढ़ा लिया। बेचारे भूल गए कि सत्ता के हाथ बड़े लंबे होते हैं। सूबे की पुलिस ने जाल बिछाया और धर दबोचा चैनल मालिक को उसके गाजियाबाद के घर से। सहारा लिया उन्हीं के चैनल के एक पत्रकार का। जिसने पुलिस से शिकायत कर दी कि उमेश शर्मा उन पर दबाव बना रहे हैं कि मुख्यमंत्री और अपर मुख्य सचिव का स्टिंग करो ताकि उन्हें ब्लैकमेल किया जा सके। अब जेल की सलाखों के पीछे हैं। अतीत भी तो साफ-सुथरा नहीं कि समर्थन में मीडिया उतरता। चौबेजी चले थे छब्बे जी बनने पर रह गए दूबे ही।

अपने ही बेगाने
चुनाव प्रचार बिना नारों के हो ही नहीं सकता। लाउडस्पीकर पर रोक लगने से क्या फर्क पड़ता है? राजस्थान में दो नारे भाजपा की नींद उड़ा चुके हैं। ये नारे कांग्रेसी नहीं भाजपाई ही लगा रहे हैं। एक है- मोदी से बैर नहीं, पर वसुंधरा की खैर नहीं तो दूसरा- कमल का फूल हमारी भूल। सोशल मीडिया तो इनसे लबालब है। फरवरी में हुए लोकसभा उपचुनाव के वक्त भी वसुंधरा विरोधी भाजपाई खेमे ने यही हथकंडा अपनाया था। मोदी के समर्थन और वसुंधरा के विरोध का।

आलाकमान को लग रहा है कि राजस्थान में मोदी का जलवा तो अब भी कायम है पर वसुंधरा से बड़ा तबका खुश नहीं। कुछ नहीं सूझ रहा तो दोनों नारों का जवाब यह कह कर दिया जा रहा है कि यह कांग्रेसी साजिश है। जबकि खुद भाजपाई सूबे की बदलाव की परंपरा के हामी बन गए हैं। हर बार होता है यहां सत्ता परिवर्तन। इस नाते बारी अब राज करने की कांग्रेस की है। यह बात अलग है कि व्यापक हिंदू एकता की दुहाई देने वाली भाजपा अपनी विरोधी कांग्रेस को कमजोर करने के लिए जात-पात का ही सहारा ले रही है। कभी कांग्रेस पर सैनी विरोधी होने तो कभी जाटों को तवज्जो नहीं देने के आधार पर अपनी नैया पार लग जाने का दम भर रही है। पर सट्टा बाजार और चुनाव पूर्व सर्वेक्षण भाजपा की सारी रणनीतियों पर पानी फेर रहे हैं।

भाजपा सरकार के गठन के पक्ष में कोई सटोरिया फूटी कौड़ी भी लगाने को तैयार नहीं। इसके बावजूद भाजपाई करिश्मे का ख्वाब पाले हैं। कुछ नहीं तो आधे विधायकों का टिकट काट कर मतदाताओं की नाराजगी में कमी की आस ही सहारा है। जसवंत सिंह के बेटे मानवेंद्र सिंह का कांग्रेस में जाना राजपूत समाज के भाजपा से मोहभंग के संकेत के रूप में देखा जा रहा है। उधर वसुंधरा ने अपनी पकड़ ऐसी पुख्ता कर ली है कि उनसे पंगा लेने की आलाकमान हिम्मत ही नहीं कर पा रहे।
(अनिल बंसल)

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