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राजपाट: वक्त का फेर

जहां तक नीतीश कुमार का सवाल है वे फिजूल की बयानबाजी से परहेज करने के अपने स्वभाव को छोड़ नहीं रहे। तभी तो बस संकेतों में साफ कर दी अपनी नजर में प्रशांत किशोर की हैसियत।

Author Published on: March 16, 2019 4:50 AM
नरेंद्र मोदी, प्रशांत किशोर और नीतीश कुमार। (Photo: PTI)

प्रशांत किशोर पाठक को बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने अपनी पार्टी जद (एकी) का उपाध्यक्ष बनाया तो कई वरिष्ठ नेताओं ने नाक-भौं सिकोड़ी थी। अब प्रशांत किशोर अपने बयानों से न केवल पार्टी को मुश्किल में फंसा रहे हैं बल्कि अपनी हैसियत भी गंवा रहे हैं। पटना में जिस दिन प्रधानमंत्री और बिहार के मुख्यमंत्री की साझा रैली थी, उस दिन प्रशांत किशोर ने एक ट्विट कर सबकी किरकिरी कर दी। दरअसल उसी दिन पुलवामा के आतंकी हमले का शिकार हुए सीआरपीएफ के एक जवान का शव पटना पहुंचा था। प्रशांत किशोर ने इस बात पर खेद जताया कि उनकी पार्टी और सरकार का कोई नेता इस शहीद को सम्मान देने नहीं पहुंचा। इससे विपक्ष को राजग नेतृत्व की आलोचना का मुद्दा मिल गया। इससे पहले एक न्यूज पोर्टल को दिए इंटरव्यू में उन्होंने अपने नेता नीतीश कुमार के फैसले पर ही नैतिकता का सवाल उठा दिया था। उन्होंने कहा था कि राजद से नाता तोड़ने के बाद नीतीश कुमार को भाजपा से हाथ मिलाने से पहले नए सिरे से जनादेश लेना चाहिए था। जहां तक नीतीश कुमार का सवाल है वे फिजूल की बयानबाजी से परहेज करने के अपने स्वभाव को छोड़ नहीं रहे। तभी तो बस संकेतों में साफ कर दी अपनी नजर में प्रशांत किशोर की हैसियत। फरमाया कि उन्होंने चुनावी रणनीतिकार को भाजपा आलाकमान के कहने पर पार्टी में लिया था। बेचारे किशोर पर उसके बाद से जद (एकी) के कई नेताओं के व्यंग्य बाणों की बौछार हो चुकी है। कहां तो हवा बनाई थी कि नीतीश ने उन्हें सूबे की मनचाही सीट से लोकसभा चुनाव लड़ने की छूट दी है और कहां अब खुद को हाशिए पर पा रहे हैं।

फूल रही सांस
मंत्री बनने से न लोकप्रियता बढ़ने की गारंटी होती है और न जनाधार में इजाफे की। कम से कम राजस्थान के केंद्र सरकार में मंत्री बने बैठे पंजप्यारों की तो यही स्थिति है। सूबे में हुए सत्ता परिवर्तन के बाद चुनावी घमासान से घबरा रहे हैं। तभी तो पुरानी सीट छोड़ नई सीट की जुगत में हैं। अर्जुन मेघवाल को बीकानेर की जगह श्रीगंगानगर, सीआर चौधरी को नागौर की जगह अजमेर, गजेंद्र सिंह शेखावत को जोधपुर की जगह कोई और व राज्यवर्धन सिंह राठौड़ को जयपुर ग्रामीण की जगह जयपुर शहर से मोह हो गया है। पीपी चौधरी की भी पाली में सांस फूल रही है। अपने लोकसभा क्षेत्रों पर अपनी मजबूत पकड़ का आलाकमान को भरोसा दे रखा था। पर विधानसभा चुनाव में भाजपा उनके क्षेत्रों में बुरी तरह हारी तो भरोसा भ्रम साबित हुआ। हालांकि चुनाव के वक्त ठीकरा वसुंधरा सरकार के सिर फोड़ने की पैंतरेबाजी शुरू कर दी थी। अब अपने क्षेत्रों में गए तो लोगों के विरोध को देख पसीने छूट रहे हैं। मेघवाल और राठौड़ ठहरे आलाकमान के चहेते। पर वसुंधरा से पटरी कतई नहीं बैठती। सो, वसुंधरा खेमा तो दोनों के टिकट ही कटवाने के फेर में है। रही शेखावत की बात तो वे सूबेदार नहीं बन पाए क्योंकि वसुंधरा ने वीटो लगा दिया था। उनका मुकाबला मुख्यमंत्री के बेटे वैभव गहलोत से होने के संकेत हैं। जिससे हाथ-पांव फूल रहे हैं। राजसमंद की दूसरी राजपूत बहुल सीट चाहते हैं। सीआर चौधरी को अपने इलाके में जाट नेता हनुमान बेनीवाल की पार्टी से डर लग रहा है।

मुश्किल डगर
पश्चिम बंगाल को लेकर भाजपा का दावा कुछ ज्यादा ही बड़बोलापन लगता है। अभी महज दो सीटें हैं पार्टी के पास। मगर 2019 में सपना 42 में से 23 सीटों का पाल बैठे हैं। वाम मोर्चे और कांग्रेस का तालमेल नहीं हुआ होता तो भाजपा की राह आसान बन जाती। पर तिकोने मुकाबले में जनाधार बढ़ा कर भी सीटें पाना कठिन लगता है। फिलहाल उन सीटों पर फोकस बढ़ाया है जहां दूसरे नंबर पर थी पिछली दफा पार्टी। दूसरे के साथ तीसरे नंबर वाली सीटों को भी जोड़ें तो आंकड़ा डेढ़ दर्जन के पार नहीं पहुंच रहा। बेशक उपचुनाव में पार्टी का वोटबैंक बढ़ा पर सफलता मयस्सर नहीं हो पाई। फोकस उत्तर व दक्षिण बंगाल की सीटों पर टिका है। पार्टी के सूबेदार दिलीप घोष ने माना है कि नई सीटें जीतने से पहले पुरानी दोनों सीटों दार्जिलिंग और आसनसोल को बचाने की चिंता भी कर रहे हैं। जलपाईगुड़ी, कूच बिहार, मालदा उत्तर और मालदा दक्षिण में से केवल मालदा दक्षिण पर ही दूसरे नंबर पर थी भाजपा।
(अनिल बंसल)

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