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राजपाट: चकल्लस चालू

पिछली दफा भाजपा ने अपना दल सहित 80 में से 73 सीट जीत कर नया इतिहास रचा था। इस सूबे ने आंख मिचौली की तो सचमुच उथल-पुथल दिखेगी नतीजों के बाद।

Author May 18, 2019 3:24 AM
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्‍यक्ष अमित शाह। (File Photo : Reuters)

राजनीति के रंग यकीनन निराले ही होते हैं। लोकसभा चुनाव का आखिरी चरण बाकी है। जिसके लिए मतदान 19 मई को होगा और नतीजे आएंगे 23 मई की देर शाम तक। लेकिन सियासी दलों की बेचैनी भी कमाल की होती है। तभी तो पांचवें चरण का मतदान निपटते ही हो गई जोड़-तोड़ की शुरुआत। तेलंगाना और आंध्र के मुख्यमंत्री ही नहीं एनसीपी और तृणमूल कांग्रेस की तरफ से भी शुरू हो गई भावी योजनाओं पर मंथन की प्रक्रिया। भाजपा भले दावा करे कि उसकी ताकत 2014 की तुलना में और बढ़ेगी पर सियासी समीक्षक इस दावे पर भरोसा करने को तैयार नहीं। हर कोई मान रहा है कि मध्यप्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की सरकारें बन जाने व उत्तर प्रदेश में सपा-बसपा और रालोद के महागठबंधन के कारण नतीजे पहले से कमजोर ही होंगे भाजपा के। दावे भाजपाई भी चाहे जो कर रहे हों पर सरकार के गठन को लेकर मंथन इस पार्टी के भीतर भी कम नहीं चल रहा। लोगबाग नितिन गडकरी के बयान के भी अपने तर्इं मायने निकाल रहे हैं। वाजपेयी-आडवाणी का भी हवाला दिया कि केवल उनकी भी कभी नहीं थी भाजपा। एक तरफ क्षेत्रीय दल तीसरे मोर्चे की भूमिका की टोह ले रहे हैं तो दूसरी तरफ भाजपा के भीतर बहुमत से पिछड़ने की सूरत में प्लान-ए के साथ प्लान-बी पर भी मंथन हो रहा है। राष्ट्रपति की भूमिका भी चर्चा का मुद्दा बनने लगी है तो कुल मिला कर दारोमदार यूपी पर केंद्रित हो गया है। जहां पिछली दफा भाजपा ने अपना दल सहित 80 में से 73 सीट जीत कर नया इतिहास रचा था। इस सूबे ने आंख मिचौली की तो सचमुच उथल-पुथल दिखेगी नतीजों के बाद।
स्यापा शुरू

मतगणना 23 मई को होगी तो क्या? चुनाव के दौरान पार्टी से दगा करने वालों की राजस्थान में तलाश में तो भाजपा और कांग्रेस दोनों मतदान निपटते ही जुट गए। सूबे में लोकसभा चुनाव के लिए मतदान दो चरणों में निपटा। दोनों पार्टियों के नेतृत्व के पास उम्मीदवारों की तरफ से शिकायतें आई हैं। अपने ही लोगों पर पार्टी के खिलाफ काम करने के आरोप वाली। इस बीमारी से इस बार भाजपा भी नहीं बच पाई। जबकि कांग्रेस में तो यह पुराना रोग रहा ही है। कांग्रेस के दर्जन भर उम्मीदवारों ने अभी से बचाव का रास्ता तलाश लिया है कि वे हारे तो फलां-फलां की वजह से हारेंगे। ज्यादातर ने तोहमत अपनी सीट के पार्टी विधायकों पर लगाई है। वैसे तोहमत पूरी तरह निराधार है भी नहीं। आखिर विधायक चाहे किसी भी पार्टी का क्यों न हो उसे लोकसभा उम्मीदवार फूटी आंख नहीं सुहाता। अपने से बड़ा कद सियासत में कौन चाहता है दूसरे का। कांग्रेस के ज्यादातर विधायकों ने यही भूमिका निभाई। तभी तो पार्टी के प्रभारी महासचिव अविनाश पांडेय ने भी मान लिया कि विधायकों के खिलाफ उम्मीदवारों की शिकायतें आई हैं। हालांकि विधायकों की सकारात्मक भूमिका के लिए पार्टी ने इंसेंटिव योजना चलाई थी। उन्हें साफ संकेत दे दिए गए थे कि जिसके क्षेत्र में पार्टी को ज्यादा समर्थन मिलेगा, वह किसी न किसी रूप में ईनाम पाएगा। ईनाम मंत्री पद के रूप में भी हो सकता है। ज्यादातर शिकायतें जयपुर, भरतपुर, जयपुर ग्रामीण, धौलपुर-करौली, अजमेर, भीलवाड़ा, उदयपुर और बांसवाड़ा के उम्मीदवारों की तरफ से की गई हैं। पर इसका मतलब यह नहीं कि भाजपा में सब कुछ सामान्य रहा हो। इस पार्टी में भी कोटा, भीलवाड़ा, राजसमंद, सीकर, अलवर और चुरू के उम्मीदवारों ने आलाकमान से इलाके के पार्टी नेताओं की बेवफाई की शिकायत की है। नागौर सीट भाजपा ने समझौते के तहत बेनीवाल की पार्टी रालोपा को दी थी। सीआर चौधरी की छुट्टी करनी पड़ी थी इस चक्कर में। अब रालोपा ने सीआर चौधरी और युनूस खान के भीतरघात की शिकायत की है। अपनों से ही दगा का रोना कोटा के भाजपा सांसद ओम बिरला भी रोते दिखे। हालांकि भाजपा के हर उम्मीदवार को सहारा बस मोदी के नाम का है। वसुंधरा राजे के समर्थकों से शिकायत रखने वाले तो भाजपा के दर्जन से ज्यादा उम्मीदवार हैं। हालांकि उनकी शिकायत भी महज वहम कह कर खारिज करना नाइंसाफी होगी।

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