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राजपाट: सियासी दांव-पेच

जहां तक भाजपा का सवाल है, सूबे की 42 सीटों में से उसे पिछले चुनाव में महज दो पर ही सफलता मिल पाई थी। भाजपा अध्यक्ष ने लक्ष्य भले 22 सीटों का तय किया हो पर अभी इसे दिवास्वप्न ही कहा जाएगा।

Author March 9, 2019 4:25 AM
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी। (एक्सप्रेस फोटो)

चुनाव की तारीखों के औपचारिक एलान का इंतजार छोड़ अब सियासी दल अपने गठबंधनों को आखिरी जामा पहनाने में जुटे हैं। कर्नाटक में विधानसभा चुनाव से पूर्व जद (सेकु) से तालमेल नहीं करने का खमियाजा भुगतने के बाद कांग्रेस लोकसभा में वैसी चूक नहीं करना चाहती। विधानसभा के नतीजों से साफ दिखा था कि कांग्रेस और जद (सेकु) के बीच पहले से तालमेल होता तो भाजपा कमजोर साबित होती। लोकसभा में राहुल गांधी और एचडी देवगौड़ा ने गठबंधन को अंतिम रूप देने में कतई नाज-नखरे नहीं दिखाए। पर पश्चिम बंगाल में कांग्रेस दुविधा में है। तृणमूल कांग्रेस के साथ तालमेल की संभावना है ही नहीं। सो, भाजपा को रोकने के लिए वाम मोर्चे के साथ गठबंधन पर मंथन जारी है। दिक्कत दो सीटों को लेकर आ रही है।

पिछले चुनाव में कांग्रेस और माकपा को महज छह सीटों पर ही सफलता मिली थी। अपनी जीती दोनों सीटों को माकपा किसी सूरत में छोड़ने को तैयार नहीं। जबकि कांग्रेस रायगंज और मुर्शिदाबाद दोनों को अपना गढ़ बता रही है। कांग्रेस के क्षत्रपों ने फैसला राहुल गांधी पर छोड़ दिया है। सूबेदार सोमेन मित्र ने इस मुद्दे पर दिल्ली में राहुल गांधी से मिल जमीनी हकीकत बयान कर भी दी। कांग्रेस के अपने तर्क ठहरे। पिछले लोकसभा चुनाव के खराब प्रदर्शन को पार्टी ने चतुष्कोणीय मुकाबलों का अंजाम बताया है। इस बार गठबंधन होगा तो मुकाबले त्रिकोणीय होंगे। जहां तक भाजपा का सवाल है, सूबे की 42 सीटों में से उसे पिछले चुनाव में महज दो पर ही सफलता मिल पाई थी। भाजपा अध्यक्ष ने लक्ष्य भले 22 सीटों का तय किया हो पर अभी इसे दिवास्वप्न ही कहा जाएगा। भाजपा बेशक गर्व कर सकती है कि उसका जनाधार बढ़ रहा है पर सीट जीतने लायक वोट पाना अभी दूर की कौड़ी है।

फिर खींचतान
राजस्थान में भाजपा के मौजूदा 23 लोकसभा सदस्य न अपनी जीत को लेकर पूरी तरह आश्वस्त हैं और न उम्मीदवारी को लेकर। सूबे में सियासी माहौल अब बदला हुआ है। पिछले लोकसभा चुनाव के वक्त वसुंधरा राजे की सरकार थी सूबे में। लोकसभा से एक साल पहले बंपर बहुमत के साथ विजयी हुई वसुंधरा की लोकप्रियता भी कम हकदार नहीं थीं सभी सीटों पर परचम फहराने के लिए। लेकिन बाद में अजमेर और अलवर तो उपचुनाव में ही गंवा दी भाजपा ने। ज्यादातर सांसद अपने टिकट कटने की सुगबुगाहट से बेचैन हैं। संघी खेमे की खुसरफुसर से वसुंधरा समर्थकों पर गाज ज्यादा गिरने की आहट है। वसुंधरा भी अब अड़ गई हैं। अपने समर्थकों के टिकट बचाने के लिए आलाकमान से भिड़ने के मूड में हैं। पर आलाकमान उनके बेटे दुष्यंत तक का पत्ता साफ करने का मन बना चुका है। पार्टी नेतृत्व की इच्छा है कि बेटे की जगह झालावाड़ से वसुंधरा खुद चुनाव लड़ें।

यानी विधानसभा से इस्तीफा दें। जिसका सीधा मतलब होगा सूबे की सियासत का मोह त्यागना। दुष्यंत के अलावा जयपुर के रामचरण बोहरा, जालौर के देवजी पटेल, धौलपुर के मनोज राजौरिया, बाडमेर के कर्नल सोनाराम और नागौर के सीआर चौधरी की उम्मीदवारी पर भी तलवार लटकी है। चौधरी तो मोदी सरकार में मंत्री ठहरे। वसुंधरा भी अपनी पैतरेबाजी दिखाएंगी जरूर। वे अपने विरोधी सांसदों को ठिकाने लगाने का मौका चूकना नहीं चाहतीं। मसलन, जयपुर ग्रामीण के राज्यवर्धन सिंह राठौड़ और कोटा के ओम बिड़ला अब उनके निशाने पर हैं।

मुश्किल यह है कि ये दोनों ही पार्टी आलाकमान के दुलारे ठहरे। राठौड़ तो मोदी सरकार के काबिल मंत्रियों में गिने जाते हैं। बिड़ला की काट के लिए वसुंंधरा ने राज परिवार के पूर्व सांसद इज्यराज सिंह को विधानसभा चुनाव से पहले ही पार्टी में ले लिया था। आलाकमान ने सूबे के टिकट तय करने का जिम्मा प्रकाश जावडेकर को सौंप रखा है। जिन्हें हार के बावजूद आलाकमान विधानसभा चुनाव में पार्टी की लाज बचाने का श्रेय दे रहे हैं। जावडेकर खुद किसी के बुरे बनना नहीं चाहते। तभी तो हर सांसद को एक ही घुट्टी पिला रहे हैं कि आखिरी फैसला आलाकमान खुद करेंगे। वसुंधरा और उनकी खुद की भूमिका बस राय देने तक सीमित होगी। देखना है कि वसुंधरा की हठधर्मिता से अब कैसे निपटेंगे आलाकमान।
(अनिल बंसल)

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