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राजपाट: कलह से अटकलें

गहलोत ने इकलौते रालोद विधायक को मंत्री पद दे रखा है। ऐसे में बसपा और निर्दलीय विधायकों की ललक भी बढ़ना स्वाभाविक है। पर अशोक गहलोत बेबस दिखते हैं। वे तो कांग्रेस के कद्दावर विधायकों के साथ भी इंसाफ नहीं कर पाते।

Author Published on: June 8, 2019 1:55 AM
राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और उप मुख्यमंत्री सचिव पायलट। (पीटीआई फोटो)

टोटे में लड़ाई हो ही जाती है तो राजस्थान में लोकसभा चुनाव में सूपड़ा साफ हो जाने के बाद कांग्रेस पार्टी की अंतरकलह तेज हुई है तो इसमें अचरज नहीं होना चाहिए। वैसे भी सूबे के पार्टी नेता इस हार से हैरान ही नहीं सदमे की हालत में हंै। छह महीने पहले ही तो वसुंधरा राजे के नेतृत्व वाली सूबे की भाजपाई सरकार को सत्ता से बेदखल किया था कांग्रेस ने। इसी बूते उम्मीद थी कि 25 में से कम से कम आठ-दस सीटें तो झोली में आ ही जाएंगी। हुआ एकदम उलट।

उधर, सूबे की अशोक गहलोत सरकार का बहुमत भी मामूली ठहरा। बसपा के छह और 12 निर्दलियों के भरोसे टिके हैं गहलोत। बसपा के विधायक मायावती पर बेशक सीधे न सही पर परोक्ष रूप से तो दबाव बना ही रहे हैं कि अगर सरकार उनकी मदद से चल रही है तो फिर वे सत्ता में शिरकत क्यों न करें? बाहर से मुफ्त में समर्थन से क्या फायदा? अजित सिंह के रालोद को एक सीट मिली थी।

गहलोत ने इकलौते रालोद विधायक को मंत्री पद दे रखा है। ऐसे में बसपा और निर्दलीय विधायकों की ललक भी बढ़ना स्वाभाविक है। पर अशोक गहलोत बेबस दिखते हैं। वे तो कांग्रेस के कद्दावर विधायकों के साथ भी इंसाफ नहीं कर पाते। एक दर्जन विधायक तो ऐसे हैं जो अतीत में कभी न कभी मंत्री रह चुके हैं। जाहिर है कि सूबे की सरकार ऊहापोह की हालत में है। ऊपर से मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री के मतभेद अब सतह पर दिख रहे हैं।

कुछ विधायक जहां लोकसभा चुनाव की हार का ठीकरा मुख्यमंत्री के सिर फोड़ कर सचिन पायलट को मुख्यमंत्री बनाने की मांग कर रहे हैं, तो खुद अशोक गहलोत भी अपनी पीड़ा छिपा नहीं पा रहे। वे चाहते हैं कि उनके बेटे वैभव की जोधपुर में हुई करारी हार का जिम्मा सचिन पायलट ही लें। बेटे के मोह में फंसे गहलोत को कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक में राहुल गांधी का कोपभाजन भी होना पड़ा। वैसे राजस्थान के कांग्रेसी भी अब दलील दे रहे हैं कि पार्टी सब जगह हारी है। खुद अध्यक्ष ही अपने गढ़ अमेठी को नहीं बचा पाए। सत्तारूढ़ दल की अंदरूनी कलह का असर सरकार के प्रदर्शन पर भी पड़ ही रहा है। वजह यह है कि नौकरशाह सरकार के भविष्य को लेकर तमाम तरह की अटकलों में उलझ रहे हैं।
(प्रस्तुति : अनिल बंसल)

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