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राजपाट: तल्खी बेमिसाल

भाजपा ने जय श्रीराम के नारे के बहाने हिंदुओं के ध्रुवीकरण का दांव चला तो ममता ने पलटवार कर दिया कि भाजपा तो राम को चुनाव के दौरान अपना एजंट बना लेती है।

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इस बार लोकसभा चुनाव में भाजपा की जैसी तल्खी तृणमूल कांग्रेस के साथ दिखी वैसी देश के किसी भी क्षेत्रीय दल के साथ नहीं। कांग्रेस तो खैर भाजपा के निशाने पर रहती ही। पिछली दफा 42 सीटों पर सिमट जाने के बावजूद भाजपा को लगातार डर कांग्रेस का ही सताता है। दरअसल मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में सत्ता में वापसी कर कांग्रेस ने जता दिया कि भाजपा अविजित नहीं है। कांग्रेस के नेता तो गाहे-बगाहे भाजपा को नसीहत भी देते रहे हैं कि उसे 1984 को नहीं भूलना चाहिए जब यह पार्टी दो सीटों तक सिमट कर रह गई थी। तीन राज्यों से पहले तो गुजरात में कांग्रेस ने अपनी स्थिति सुधार कर सियासत में चुनौती बने रहने के अपने मंसूबे जाहिर किए थे। बहरहाल पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी और भाजपा के बीच जंग महज सियासी न रह कर खुन्नस जैसी बन गई। भाजपा दीदी पर लगातार हमले कर रही है। पर ममता भी न केवल इन हमलों से अपना बचाव कर रही हैं बल्कि जवाबी हमले करने में भी कसर नहीं छोड़ रहीं। प्रधानमंत्री ने तृणमूल कांग्रेस पर टोलबाजी (उगाही) के आरोप लगाए। कसर ममता ने भी नहीं रखी। और तो और प्रधानमंत्री पर झूठ बोलने से लेकर लोकतंत्र का थप्पड़ पड़ने जैसी असंयमित भाषा का इस्तेमाल किया। भाजपा ने जय श्रीराम के नारे के बहाने हिंदुओं के ध्रुवीकरण का दांव चला तो ममता ने पलटवार कर दिया कि भाजपा तो राम को चुनाव के दौरान अपना एजंट बना लेती है। पांच साल तक राम-राम तो जरूर जपते रहे पार्टी के नेता पर राम मंदिर के निर्माण की दिशा में कोई कदम नहीं उठाया। चुनावी हिंसा के लिए भाजपा के नेता भी ममता की गिरफ्तारी तक की मांग कर चुके हैं। आखिरी दो चरणों में सूबे की 42 में से बची 17 सीटों के लिए वोट पड़ेंगे। ज्यादातर सीटें कोलकाता के आसपास की हैं। जिन पर कब्जे की होड़ में न केवल जुबानी जंग बल्कि हिंसा के भी तेज हो जाने का अंदेशा बरकरार है।

तरकश का तीर
लोकसभा चुनाव को लेकर सारे देश की निगाहें उत्तर प्रदेश पर टिकी हैं। ऐसा स्वाभाविक भी ठहरा। अस्सी सीटों वाला सूबा ही तो करता है देश की सरकार के गठन में सबसे अहम योगदान। भाजपा के लिए इसका महत्त्व सबसे ज्यादा है। अस्सी में से 73 सीटें जीती थी पिछली दफा। लेकिन इस बार समीकरण वैसे अनुकूल नहीं दिख रहे। पिछली दफा एक तो बहुकोणीय मुकाबले थे ऊपर से मुजफ्फरनगर दंगों के कारण सांप्रदायिक ध्रुवीकरण भी कमोबेश था ही। इस बार लड़ाई कहने को तो त्रिकोणीय है पर धरातल पर मुकाबला भाजपा और सपा-बसपा-रालोद के महागठबंधन के बीच ही नजर आता है। बसपा और सपा के मिलन की किसी को उम्मीद नहीं थी। भाजपा अभी भी मायावती से आस लगाए है। पर सियासी सौदेबाजी में अब मायावती मंज चुकी हैं। सही है कि चार में से तीन बार सूबे का मुख्यमंत्री पद उन्हें भाजपा के सहयोग से ही मिला था। पर हर बार वे सौदेबाजी में ज्यादा निपुण होती गर्इं। राजनाथ सिंह के बाद जब त्रिशंकु विधानसभा आई तो मायावती ने भाजपा से अपनी शर्तों पर लिया था समर्थन। भाजपा नेता चुनाव में मायावती के प्रति सबसे कम आक्रामक दिखे। यहां तक कि सपा-बसपा में फूट डालने तक की कोशिश की भाजपा नेताओं ने। खुद प्रधानमंत्री ने ही एक चुनावी सभा में कह दिया कि अखिलेश यादव ने बहिनजी को धोखा दे दिया। उनके दलितों का तो समर्थन हासिल कर लिया पर यादवों का समर्थन उन्हें शिद्दत से नहीं दिलाए। बहिनजी कांग्रेस से खफा हैं पर अखिलेश इस पार्टी के प्रति नरमदिली रखे हैं। इस बयान की प्रतिक्रिया कमाल की रही। बहिनजी ने जहां फूट डालने की कोशिश की आलोचना की, वहीं अखिलेश ने कांग्रेस पर हमला बढ़ा दिया। यह बात अलग है कि दोनों ने ही भाजपा के प्रति कतई नरमी नहीं दिखाई। उल्टे अमेठी और रायबरेली में मायावती ने बाकायदा अपने समर्थकों से कांग्रेस के पक्ष में मतदान की अपील कर डाली। नतीजतन इन दो सीटों पर बसपा उम्मीदवार न होने के कारण दलितों के वोट पा जाने के भाजपाई मंसूबे की हवा निकल गई।
(अनिल बंसल)

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