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राजपाट: वजह कुछ और

मायावती कैसे नकार सकती हैं कि सपा के साथ आने से उन्हें फायदा नहीं हुआ। उन्होंने महज सारे यादव और जाट वोट महागठबंधन को नहीं मिलने की आड़ लेकर सपा और रालोद से पीछा छुड़ाया।

Author June 8, 2019 1:49 AM
बहुजन समाज पार्टी की प्रमुख मायावती (एक्सप्रेस फाइल फोटो)

महागठबंधन इतनी जल्दी क्यों बिखर गया यूपी में। किसी को समझ नहीं आ रहा। कमाल तो यह है कि बिखराव की पहल खुद मायावती ने कर डाली, जो मोदी की सुनामी में भी दस सीटें जीत गर्इं। घाटे में तो अखिलेश यादव रहे। पिछली दफा जहां मायावती शून्य पर निपटी थीं, वहीं सपा को परिवार की पांच सीटों पर अपने दम पर ही सफलता मिल गई थी। इस बार तो बसपा और रालोद के गठबंधन से ही उतना फायदा नहीं मिला।

लेकिन हार के कारणों पर न मंथन की कोई जल्दबाजी दिखी और न बसपा या रालोद पर तोहमत लगाने की। मायावती कैसे नकार सकती हैं कि सपा के साथ आने से उन्हें फायदा नहीं हुआ। उन्होंने महज सारे यादव और जाट वोट महागठबंधन को नहीं मिलने की आड़ लेकर सपा और रालोद से पीछा छुड़ाया। पर हकीकत उलट है। सहारनपुर, बिजनौर, नगीना, अमरोहा, जौनपुर और गाजीपुर जैसी सीटें मायावती महज इस वजह से जीत पार्इं क्योंकि मुसलमानों का ध्रुवीकरण महागठबंधन के पक्ष में हो गया।

सहारनपुर में कांग्रेस के इमरान मसूद और बिजनौर में नसीमुद्दीन सिद्दीकी को छोड़ लगभग सभी मुसलमान बसपा के साथ गए। जबकि 2014 के चुनाव में मुसलमान सपा, बसपा और कांग्रेस में बंट गया था। सपा साथ न होती तो बंटवारा इस बार भी रोकना मुश्किल होता। यह हकीकत किससे छिपी है कि मायावती केवल अपने दलित वोट बैंक के बूते तो एक भी सीट नहीं जीत सकतीं।

सो, उनका इस तरह जल्दबाजी में गठबंधन तोड़ने और आने वाले दिनों में सूबे की 11 विधानसभा सीटों का उपचुनाव अकेले लड़ने का एलान करना किसी राज की बात का संकेत है। जिसे लेकर सियासी हलकों में अटकलें लग रही हैं। एक अटकल तो यही है कि विभिन्न जांच एजंसियों के शिकंजे में फंसी मायावती ने खुद को बचाने के फेर में गठबंधन तोड़ कर विपक्ष के बिखराव के भाजपाई मंसूबे को परवान चढ़ाने की पहल की है। दूसरी अटकल अगली बार उनके भाजपा से हाथ मिलाने की भी है। आखिर चार में से तीन बार तो उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री पद उन्हें भाजपा की बदौलत ही नसीब हुआ था।
(प्रस्तुति : अनिल बंसल)

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