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वक्त का फेर

लड़ाई अक्सर टोटे में ज्यादा होती है। टोटा चाहे कारोबार में हो या चुनावी सियासत में। राजस्थान में भाजपा के रंगढंग आजकल इसी कहावत को चरितार्थ कर रहे हैं। सत्ता तो चली गई, अब नेता प्रतिपक्ष की कुर्सी को लेकर जंग छिड़ी है।

Author January 12, 2019 5:00 AM
वसुंधरा राजे (फोटो- एक्सप्रेस आर्काइव)

लड़ाई अक्सर टोटे में ज्यादा होती है। टोटा चाहे कारोबार में हो या चुनावी सियासत में। राजस्थान में भाजपा के रंगढंग आजकल इसी कहावत को चरितार्थ कर रहे हैं। सत्ता तो चली गई, अब नेता प्रतिपक्ष की कुर्सी को लेकर जंग छिड़ी है। जाहिर है कि इस कुर्सी की स्वाभाविक दावेदार तो पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ही थी पर पार्टी आलाकमान अब उन्हें सिर-आंखों पर बिठाने को तैयार नहीं। पार्टी की मंशा किसी युवा चेहरे को विधायक दल की कमान सौंपने की बताई जा रही है। नीति उन तीनों ही सूबों के लिए एक समान बनी है जहां पार्टी को हाल ही में पराजय का मुंह देखना पड़ा। पर राजस्थान का मामला एकदम अलग है। यहां संघी खेमे को कभी भी वसुंधरा फूटी आंखों नहीं सुहाई। वैसे भी वे अपनी कार्यशैली के लिए पार्टी आलाकमान को लगातार खटकती रही हैं। लिहाजा उन्हें सूबे की सियासत से ही बाहर करने की तैयारी है। केंद्रीय मंत्री अरुण जेटली और सूबे के पार्टी प्रभारी अविनाश राय खन्ना को तय करना है कि कौन होगा सूबे में नेता प्रतिपक्ष। जहां तक वसुंधरा का सवाल है, वे सूबे की सियासत से बाहर नहीं होना चाहतीं थी। तभी तो दिल्ली में रह कर लगातार लाबिंग करती रहीं। हालांकि, आलाकमान ने उन्हें पहले ही संकेत दे दिया था कि कोई नया चेहरा आएगा इस कुर्सी पर।

सो, वसुंधरा ने भी अपने पत्ते सहेजने शुरू कर दिए हैं। पर, आलाकमान ने वसुंधरा, शिवराज और रमन सिंह तीनों पूर्व मुख्यमंत्रियों को अपनी टीम में उपाध्यक्ष बनाकर साफ कर दिया कि तीनों जगह नेता प्रतिपक्ष नए चेहरे होंगे। इस कुर्सी को हासिल करने की पुरजोर कोशिश नाकाम होती दिखी तो अपने पसंदीदा कैलाश मेघवाल को दलित के नाते पेश कर दिया इस पद के लिए। उनकी सरकार में विधानसभा अध्यक्ष थे मेघवाल। लेकिन 85 साल के मेघवाल का नाम सामने आते ही संघी खेमा भी सक्रिय हो गया है। इस खेमे के विधायकों ने नाम सामने आने से पहले ही मेघवाल का विरोध शुरू कर दिया है। संघी खेमा तो गुलाब चंद्र कटारिया के पक्ष में बताया जा रहा है। जो वसुंधरा सरकार में गृहमंत्री थे। लेकिन उनके नाम पर वसुंधरा तैयार नहीं। संघी खेमे में दूसरा विकल्प जाट तबके के सतीश पूनिया का पेश किया है। यह बात अलग है कि पूनिया पहली बार विधायक बने हैं। एक विकल्प वसुंधरा के करीबी रहे राजेंद्र राठौड़ का भी सामने आया है। कटारिया और राठौड़ दोनों वरिष्ठ भी हैं और जिम्मा संभालने को राजी भी। रही आलाकमान की बात तो वह वसुंधरा को लोकसभा चुनाव लड़ाकर केंद्र की सियासत में स्थापित करने की मंशा जता चुका है। पर उनकी लोकसभा सीट झालावाड़ अब उनके बेटे दुष्यंत के पास है। आलाकमान ने फार्मूला दे दिया है कि वे लोकसभा लड़ें और उनकी विधानसभा सीट झालरा पाटन का टिकट उनके बेटे दुष्यंत को दे दिया जाएगा। अभी तो मशक्कत चल रही है।

(अनिल बंसल)

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