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राजपाट: दलित फैक्टर

हैरानी जताई कि जिस दलित वर्ग की सूबे में आबादी 40 फीसद है, उसे आजादी के 70 साल के दौरान मुख्यमंत्री की कुर्सी एक बार भी नहीं दी गई। भले सरकारें किसी भी दल की क्यों न रही हों।

Author October 27, 2018 5:52 AM
प्रतीकात्‍मक तस्‍वीर (एक्सप्रेस फाइल फोटो)

आसान नहीं दिख रही मध्य प्रदेश में इस बार भाजपा की राह। अब तक जीत की हैट्रिक दर्ज है पार्टी के खाते में। इतनी अवधि में तो कोई लोकप्रिय चेहरा भी अनाकर्षक लगने लगता है। भले कांग्रेस के साथ गठबंधन नहीं करने के मायावती के फैसले से भाजपाइयों ने फौरी तौर पर राहत महसूस की हैै पर जीत को लेकर तो आत्मविश्वास शिवराज सिंह चौहान ही नहीं आलाकमान का भी डिगा हुआ है। कांग्रेस के लिए अलबत्ता परिस्थितियां अनुकूल हो सकती हैें बशर्ते गुटबाजी हावी न हो। फिलहाल कमलनाथ के लिए ज्योतिरादित्य सिंधिया खुले तौर पर तो कोई मुश्किल खड़ी नहीं कर रहे पर सत्ता की ललक तो मन में होगी ही।

दिग्विजय सिंह तो खैर नाखुश रहेंगे ही। पर पार्टी के हित में गुटबाजी से ऊपर उठ जाएं तो राहुल गांधी को फील गुड होगा। जो भी हो इस बार मध्य प्रदेश में अनुसूचित जातियों और जन जातियों ने दोनों ही दलों की नींद उड़ा दी है। इंद्रेश गजभिए भाजपा में ही थे। अब पार्टी के खिलाफ पूरी ताकत से जुट गए हैं। एक ही मकसद है कि किसी दलित को मुख्यमंत्री बनाया जाए। भाजपा के बुजुर्ग दलित नेता और अटल सरकार में मंत्री रहे संघप्रिय गौतम को 16 अक्तूबर को एससी एसटी अधिकार परिषद के सम्मेलन में बुला लिया। गौतम तो बुढ़ापे में भी पूरा चिट्ठा बांच डालते हैं। दलितों की अनदेखी के लिए भाजपा को भी नहीं छोड़ा।

हैरानी जताई कि जिस दलित वर्ग की सूबे में आबादी 40 फीसद है, उसे आजादी के 70 साल के दौरान मुख्यमंत्री की कुर्सी एक बार भी नहीं दी गई। भले सरकारें किसी भी दल की क्यों न रही हों। गौतम ने यह सवाल भी उठा दिया कि मोदी और आलाकमान अगर दलितों के हितैषी हैं तो 21 राज्यों में पार्टी की सरकारें होने के बावजूद एक भी मुख्यमंत्री दलित क्यों नहीं बनाया। गजभिए तो शिवराज चौहान को दलित विरोधी साबित करने के लिए आंकड़ों का पिटारा खोल डालते हैं। मसलन आंबेडकर की मूर्तियां तोड़े जाने से लेकर दलितों को जिंदा जलाने की घटनाओं की याद दिला एक ही एजंडे का राग अलाप रहे हैं कि मुख्यमंत्री दलित वर्ग से क्यों नहीं बनना चाहिए। मध्य प्रदेश में इस समय मुख्यमंत्री ही नहीं राज्यपाल, विधानसभा अध्यक्ष, गृह मंत्री, भाजपा का सूबेदार, मुख्य सचिव और पुलिस महानिदेशक कोई भी पद तो दलित के पास नहीं। दलितों की नाराजगी चुनाव पर असर न डाले, कैसे संभव है।

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