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राजपाट: इकबाल बुलंद

एक दौर में सैनी थे भी ओपी माथुर के करीबी। तब माथुर पार्टी के संगठन मंत्री थे। आजकल राष्ट्रीय उपाध्यक्ष हैं। कहने को उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य के प्रभारी भी हैं।

Author July 7, 2018 04:23 am
राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे (Source: PTI)

वसुंधरा राजे का आत्मविश्वास अचानक बढ़ गया है। पार्टी का सूबेदार आखिर अपनी पसंद से बनवाने में सफल जो हो गर्इं। भले इस मशक्कत में ढाई महीने का वक्त क्यों न लगा हो? एक तरह से पार्टी आलाकमान को बौना साबित कर दिखाया राजस्थान की मुख्यमंत्री ने। आलाकमान को ही झुकना पड़ा। वे तो गजेंद्र सिंह रावत को बुला कर जयपुर रवाना होने का संकेत भी कर चुके थे। लेकिन वसुंधरा ने ऐसा अड़ंगा लगाया कि वे सन्न रह गए। यों वसुंधरा विरोधी खेमा मदन लाल सैनी को आम सहमति वाला सूबेदार प्रचारित कर रहा है। एक दौर में सैनी थे भी ओपी माथुर के करीबी। तब माथुर पार्टी के संगठन मंत्री थे। आजकल राष्ट्रीय उपाध्यक्ष हैं। कहने को उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य के प्रभारी भी हैं। पर वहां सुनील बंसल उनकी दाल नहीं गलने दे रहे। बंसल भी आखिर राजस्थानी ही तो हैं। संगठन मंत्री का उनका ओहदा माथुर की तुलना में यों कम वजनी है पर संगठन तो उन्हीं की मर्जी से चल रहा है। सरकार में भी मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को बंसल की सिफारिशें आंखें मूंद कर माननी पड़ रही। सो, माथुर लो प्रोफाइल हो गए हैं। मदन लाल सैनी राज्यसभा के सदस्य हैं और उम्र भी 75 हो चुकी है। लिहाजा उनके सूबेदार रहते उम्मीदवारों के चयन में वसुंधरा फिर मनमानी करेंगी। नतीजतन कल तक वसुंधरा को पानी पी-पीकर कोसने वाले संघी अतीत वाले भाजपाई भी अब उन्हीं की परिक्रमा में जुट गए हैं। वसुंधरा का विरोध कर रहे सबसे वरिष्ठ पार्टी विधायक घनश्याम तिवाड़ी फिलहाल अकेले पड़ गए हैं। अपना इस्तीफा तो उन्होंने पहले ही भेज दिया था आलाकमान को।

राजपाट: पीछा छूटे ना 

कई बार मामूली बात का भी बतंगड़ बन जाता है। सियासत में प्रतिक्रियावादी होना अच्छा नहीं माना जाता। प्रतिक्रिया हमेशा क्रोध की देन होती है। उत्तराखंड के मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत अकेले में खूब पछताते होंगे। जनता दरबार में एक अध्यापिका की शिकायत पर आग बबूला न होते तो क्या बिगड़ जाता। उत्तरकाशी जिले के दुर्गम पहाड़ी गांव में सेवारत 59 साल की शिक्षक उत्तरा पंत बहुगुणा ने खूब किरकिरी करा दी मुख्यमंत्री की। जनता दरबार में मुख्यमंत्री को शांति और धैर्य से सुननी चाहिए लोगों की फरियाद। पर त्रिवेंद्र सिंह रावत आपा खो बैठे और उत्तरा से भिड़ गए। उसे न केवल निलंबित करने का आदेश दे दिया बल्कि पुलिस से गिरफ्तार भी करा दिया। शायद ही किसी संवेदनशील इंसान को जंचा होगा मुख्यमंत्री का यह तौर-तरीका। उत्तरा को झिड़कते वक्त इतना भी याद नहीं रहा कि खुद की पत्नी भी तो शिक्षक ठहरीं। विधायक और मुख्यमंत्री तो बाद में बने। पहले तो आरएसएस के प्रचारक ही थे। फिर भाजपा के संगठन मंत्री बने। यानी नियमित आय का कोई साधन था ही नहीं। शिक्षक पत्नी के वेतन से ही हो रहा होगा परिवार का निर्वाह। खुद की पत्नी दशकों से सुविधाओं वाले देहरादून शहर में नौकरी करें और विधवा उत्तरा को सेवा के आखिरी तीन साल भी अपने परिवार के साथ रहने का अवसर देने से सकुचाएं, किसी को नहीं उतर रही सरकार की यह दलील गले। मुख्यमंत्री भी तो आजकल नौकरशाही के इशारों पर नाचने लगे हैं। शिक्षा महकमे की बड़ी अफसर औलख ने जो अड़ंगा लगाया था, उसी की रट मुख्यमंत्री भी लगाते रहे। विपक्ष को उत्तरा के बहाने मुफ्त में बैठे बिठाए थमा दिया अपने असंयत व्यवहार से त्रिवेंद्र सिंह रावत ने एक असरदार मुद्दा। ऊपर से अपनी फजीहत अलग करा बैठे।
(प्रस्तुति : अनिल बंसल)

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