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राजपाट: जुलाहों में लट्ठम-लट्ठ

टिकटों का बंटवारा कांग्रेस पार्टी के लिए एक पेचीदा कवायद मानी जाती है। टिकट तय करने के लिए बनी छानबीन समिति की मुखिया हरियाणा की दलित नेता शैलजा हैं। दिल्ली स्थित उनके आवास पर भी जमघट दिखता है। वे जब भी जयपुर आती हैं, कांग्रेसियों की हायतौबा बढ़ा जाती हैं।

Author September 15, 2018 6:01 AM
प्रतिकात्मक तस्वीर।

अभी तो विधानसभा चुनाव की तारीखों का भी एलान नहीं हुआ है। लेकिन कांग्रेसी कुछ ज्यादा ही उतावले हैं राजस्थान में विधानसभा टिकट को लेकर। सिरफुटौवल भी उसी का अंजाम है। दरअसल पार्टी आश्वस्त लग रही है कि इस बार सत्ता उसी की झोली में आएगी। सो, टिकटार्थियों की तादाद भी ज्यादा है और दौड़ जयपुर तक ही सीमित नहीं है। दिल्ली दरबार की परिक्रमा करने वालों की भी कमी नहीं। इस दौरान संगठन की तरफ पूरे सूबे में संकल्प रैली के कार्यक्रम हो रहे हैं। जिनमें भीड़ भी खूब आ रही है।

हर टिकटार्थी अपनी ताकत दिखाने के फेर में समर्थकों को जुटा कर बड़े नेताओं के सामने प्रदर्शन कर रहा है। एक सीट के कई दावेदार हों तो झगड़ा स्वाभाविक है। आपस में ही भिड़ जाते हैं टिकटार्थियों के समर्थक। मेरा बूथ मेरा गौरव कड़ी के कार्यक्रम हुए तो जूतमपैजार से खासी किरकिरी हुई पार्टी की। बीकानेर में तो हद ही हो गई। पार्टी के भारत बंद आयोजन की जानकारी देने के लिए जो बैठक हुई थी उसमें टिकट के दावेदार गुथमगुत्था हो गए। जयपुर शहर की आठों विधानसभा सीटों पर इस बार नए दावेदारों की संख्या और बढ़ी है। केंद्र की सियासत करने वाले नेता भी विधानसभा टिकट की जुगत भिड़ा रहे हैं। वे दिल्ली के बजाए जयपुर में अपना सुनहरा भविष्य मान रहे हैं। टिकट मिला तो जीत पक्की और जीते तो दावा मंत्री पद का।

टिकटों का बंटवारा कांग्रेस पार्टी के लिए एक पेचीदा कवायद मानी जाती है। टिकट तय करने के लिए बनी छानबीन समिति की मुखिया हरियाणा की दलित नेता शैलजा हैं। दिल्ली स्थित उनके आवास पर भी जमघट दिखता है। वे जब भी जयपुर आती हैं, कांग्रेसियों की हायतौबा बढ़ा जाती हैं। राहुल गांधी ने सूबे की दो सौ सीटों की देखरेख चार राष्ट्रीय सचिवों को बतौर सहप्रभारी सौंपी है। यानी एक के जिम्मे पचास सीट। हर क्षेत्र से प्रभारी को दावेदारों की सूची तैयार करनी है। सूची का पोस्टमार्टम छानबीन समिति के हवाले है। उधर दोनों कद्दावर क्षत्रपों अशोक गहलोत और सचिन पायलट को भी दावेदार चैन से नहीं बैठने दे रहे। यह धारणा जो बलवती हो चुकी है कि अंतिम निर्णय तो इन दोनों की मर्जी से ही होगा।

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