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राजपाट- शह और मात

अलग गोरखा लैंड राज्य की मांग करने वाला गोरखा जनमुक्ति मोर्चा टूट के कगार पर है। मोर्चे के मुखिया बिमल गुरुंग को उन्हीं के बागी बिनय तमांग ने चुनौती दी है।

Author October 16, 2017 5:27 AM
पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी। (file photo)

हाशिए पर हरीश
ज्यादा वक्त नहीं हुआ जब प्रीतम सिंह की हैसियत उत्तराखंड कांग्रेस की सियासत में हरीश रावत के एक प्यादे की थी। अब वे पार्टी के सूबेदार हैं। हरीश रावत उनसे खफा होंगे। सियासत में रिश्तों की खटास-मिठास चलती रहती है। प्रीतम सिंह परवाह नहीं कर रहे। आखिर पार्टी के सबसे बड़े नेता राहुल गांधी के दिल में जगह बना ली है। प्रदेश कांग्रेस की कार्यकारिणी की बैठक में राहुल गांधी को पार्टी की राष्ट्रीय स्तर पर कमान सौंपने का प्रस्ताव पारित कर प्रीतम सिंह ने देश के बाकी कांग्रेसी सूबेदारों को पछाड़ दिया। इससे हरीश रावत और बेचैन हुए होंगे।

प्रीतम सिंह के खिलाफ माहौल बनाना मंशा होगी तभी तो पहले कुमाऊं मंडल का दौरा किया और अब गढ़वाल में घूम रहे हैं। दरअसल इंदिरा हृदेश को पार्टी हाईकमान ने विधायक दल का नेता बनाया और प्रीतम सिंह को सूबेदार। इसमें हरीश रावत की कोई सलाह नहीं ली गई। नाराज होकर वे एक तरह से अपनी अलग समानांतर कांग्रेस चला रहे हैं। हरीश रावत ने 2009 का लोकसभा चुनाव हरिद्वार से जीता था। वजह थी कि उनकी परंपरागत अल्मोड़ा सीट अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित हो गई थी। लेकिन उसी हरिद्वार में 2014 में उनकी पत्नी रेणुका रावत हार गई थीं। वे खुद हरिद्वार ग्रामीण सीट से विधानसभा चुनाव हारे हैं। लिहाजा हरिद्वार से अब भंग हो चुका है उनका मोह। वापस कुमाऊं की नैनीताल सीट पर नजर गड़ाई है। पर यहां इंदिरा हृदेश उनकी दाल नहीं गलने देना चाहतीं।
शह और मात
दीदी का मिशन सफल हो गया। अलग गोरखा लैंड राज्य की मांग करने वाला गोरखा जनमुक्ति मोर्चा टूट के कगार पर है। मोर्चे के मुखिया बिमल गुरुंग को उन्हीं के बागी बिनय तमांग ने चुनौती दी है। दरअसल अलग गोरखालैंड की मांग को लेकर जब चार महीने पहले गोरखा जनमुक्ति मोर्चे ने बेमियादी आंदोलन शुरू किया तो ममता बनर्जी खफा हो गईं। उन्होंने दो टूक कह दिया कि सूबे का विभाजन नहीं होगा। जबकि गोरखा जनमुक्ति मोर्चे की तो मांग ही अलग गोरखा लैंड की रही है। आंदोलन छेड़ तो दिया पर केंद्र की भाजपा सरकार से वैसी मदद नहीं मिल पाई जिसकी उम्मीद थी। गोरखा जनमुक्ति मोर्चा 2009 से भाजपा की मदद कर रहा है। दार्जिलिंग लोकसभा सीट पिछले दोनों चुनावों में भाजपा को दिलाई पर केंद्र की सत्ता में बैठते ही गोरखालैंड को भाजपा ने भी भुला दिया। अमित शाह तो अब पूरे पश्चिम बंगाल में ही भाजपा की सरकार का ख्वाब देखने लगे हैं। तृणमूल कांग्रेस का भाजपा को विकल्प बनाने के मंसूबे पाल रहे हैं। ऐसे में अलग गोरखालैंड राज्य बनवा कर बाकी सूबे के बंगालियों की नाराजगी मोल लेने में यों भी कोई सियासी समझदारी है नहीं। बहरहाल तृणमूल सरकार पर दबाव बनाने के लिए बिमल गुरुंग ने गोरखालैंड क्षेत्रीय प्राधिकरण से इस्तीफा दे दिया। ऊपर से अगस्त में कुछ जगह बम विस्फोट हुए तो पुलिस ने तोहमत गुरुंग पर ही लगा दी। अहिंसक आंदोलन के हिंसक मोड़ लेते ही ममता सरकार को मौका मिल गया। बेचारे गुरुंग को फरार होना पड़ गया। लगातार भूमिगत हैं वे। इस बीच ममता ने बंदर की भूमिका में बिल्लियों के बीच लड़ाई करा दी।

पर्वतीय इलाकों के तीव्र विकास का भरोसा दे गोरखा जनमुक्ति मोर्चे के बिनय तमांग को तोड़ लिया। उन्हें ही बना दिया बोर्ड आफ एडमिनिस्ट्रेटर्स का प्रधान। सो, वे सरकारी भाषा बोलने लगे हैं। एक तरफ गुरुंग की तलाश में पश्चिम बंगाल पुलिस जगह-जगह छापे मार रही है तो दूसरी तरफ तमांग ने कहा है कि वे दार्जिलिंग को कश्मीर नहीं बनने देंगे। वे अहिंसक आंदोलन के हिमायती हैं। बेचारे गुरुंग को कुछ नहीं सूझा तो 26 सितंबर को केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह की अपील को बहाना बना कर अलग राज्य के 104 दिन पुराने आंदोलन को वापस ले लिया। यह बात अलग है कि पूरा टूरिस्ट सीजन आंदोलन के चलते खराब चला गया। स्थानीय लोगों के रोजगार पर भी प्रतिकूल प्रभाव ही पड़ा गुरुंग की जिद से। अब तो पुलिस गुरुंग के माओवादियों से रिश्ते बता रही है। उधर प्रदेश भाजपा अध्यक्ष दिलीप घोष को अब होश आया है। आरोप लगा रहे हैं कि जिस तरह ममता सरकार ने माओवादी नेता किशनजी की हत्या कराई थी उसी तरह गुरुंग भी उसके निशाने पर हैं। जो भी हो फिलहाल तो शह और मात के इस खेल में जीत ममता की ही हुई है।

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