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भ्रष्टाचार की गहरी जड़ें

इंडिया करप्शन स्टडी-2017 की रिपोर्ट के आंकड़े यह बताने को काफी हैं कि देश भ्रष्टाचार के किस मकड़जाल में फंसा है।

ट्रांसपेरेंसी इंटरनैशनल की यह रिपोर्ट दिखाती है कि किसी देश के पब्लिक सेक्टर में कितना भ्रष्टाचार फैला हुआ है।

नीति आयोग के सेंटर फॉर मीडिया स्टडीज की ग्यारहवीं इंडिया करप्शन स्टडी-2017 की रिपोर्ट में सामने आया है कि भ्रष्टाचार का जाल आज भी आम आदमी के लिए मुसीबत बना हुआ है। इस रिपोर्ट के मुताबिक पिछले साल इकतीस फीसद लोगों को स्कूल, अदालत, बैंक या अन्य कामों के लिए दस रुपए से लेकर पचास हजार रुपए तक की रिश्वत देनी पड़ी है। आंकड़े बताते हैं कि 2005 में तिरपन प्रतिशत लोगों को रिश्वत देनी पड़ती थी। यानी इन सालों में भ्रष्टाचार में बाईस फीसद की कमी आई है, लेकिन इसका खात्मा होता नहीं दिखता। देश के उनतीस में से बीस राज्यों में किए गए सर्वे के आधार पर हिमाचल प्रदेश, केरल और छत्तीसगढ़ को सबसे कम भ्रष्ट राज्य माना गया है, जबकि घूसखोरी के आधार पर तैयार इस रिपोर्ट में कहा गया है कि कर्नाटक देश का सबसे भ्रष्ट राज्य है। इसके बाद आंध्रप्रदेश, तमिलनाडु, महाराष्ट्र, जम्मू-कश्मीर और पंजाब में सबसे ज्यादा भ्रष्टाचार दर्ज किया गया।
सर्वेक्षण के मुताबिक कर्नाटक में 77 फीसद, आंध्रप्रदेश में 74, तमिलनाडु में 68 और हिमाचल प्रदेश में तीन फीसद लोगों ने रिश्वत देना स्वीकार किया। सरकारी काम कराने के लिए दी जाने वाली घूस के आधार पर तैयार रिपोर्ट में कहा गया है कि देश में भ्रष्टाचार घट रहा है, लेकिन अब भी बहुत कुछ करने की जरूरत है। रिपोर्ट में कहा गया है कि सर्वे में करीब एक तिहाई लोगों ने माना कि पिछले साल उन्हें कहीं न कहीं रिश्वत देनी पड़ी, जो बताता है कि देश के हर हिस्से में सार्वजनिक सेवाओं के लिए जनता का घूस देना आम बात है। गौरतलब यह भी है कि इस सर्वेक्षण में शहर ही नहीं, गांवों के लोंगों की भी राय ली गई। यानी देश का हर हिस्सा और तबका यह दंश झेलने को विवश है।

इंडिया करप्शन स्टडी-2017 की रिपोर्ट के आंकड़े यह बताने को काफी हैं कि देश भ्रष्टाचार के किस मकड़जाल में फंसा है। वह वाकई अफसोसनाक है कि जिन सार्वजनिक सेवाओं पर आमजन का हक है उन्हें पाने या सरकारी दफ्तरों में अपना काम कराने के लिए यों घूस देने के हालात बने हुए हैं। अफसोस इस बात का भी है कि बरसों से यही होता आ रहा है। आजादी के कुछ सालों बाद ही देश भ्रष्टाचार के दलदल में डूब गया था। आज इतने बरसों बाद भी हम इसी जाल में फंसे हुए हैं। इतना ही नहीं, इस समस्या से पार पाने के लिए किए जाने वाले सरकारी प्रयास कम ही लगते हैं। क्योंकि यह कर्तव्यबोध की मानसिकता और जवाबदेही के साथ काम करने की सोच से जुड़ा मामला है। ऐसे व्यक्ति जो अपने कर्तव्यों की अवहेलना कर निजी स्वार्थ में लिप्त रहते हैं, भ्रष्टाचार को खूब बढ़ावा देते हैं। हालांकि इस सर्वे में आधे से अधिक लोगों ने माना कि नोटबंदी के दौरान घूसखोरी में कमी आई थी। साथ ही एलपीजी के ‘आधार’ से लिंक होने के चलते भी भ्रष्टाचार कम हुआ है। लेकिन इन आंकड़ों को देख कर लगता है कि नोटबंदी के बाद सरकारी दफ्तरों का माहौल फिर उसी पटरी पर लौट आया है। रिपोर्ट में आकलन किया गया है कि 2017 में बीस राज्यों के लोगों ने दस सार्वजनिक सेवाओं के लिए 6,350 करोड़ रुपए की रिश्वत दी है। जबकि वर्ष 2005 में लोगों ने 20,500 करोड़ रुपए रिश्वत दी थी। 2005 के अध्ययन में तिरपन फीसद लोगों ने रिश्वत देने की बात कबूल की थी।

यह लोगों की जागरूकता और सरकारी दफ्तरों में तकनीक के प्रयोग का असर है कि रिश्वत मामलों में कुछ कमी आई है, पर समस्या खत्म नहीं हुई है। यह एक बड़ा सच है कि हमारा सरकारी तंत्र बहुत उलझाऊ है। यही वजह है कि शिक्षित और सजग नागरिक भी घूसखोरी के प्रति उदासीन रवैया ही अपनाते हैं। ऐसे में अपना काम कराने के लिए वे रिश्वत देने में न तो आनाकानी करते हैं और न ही सरकारी मुलाजिमों से ज्यादा सवाल-जवाब कर पाते हैं। इस अध्ययन में भी सामने आया है कि भ्रष्टाचार से जुड़े मामलों के बारे में जानने के लिए एक फीसद लोग ही आरटीआइ का इस्तेमाल करते हैं। सर्वे में अट्ठावन फीसद लोगों ने बताया कि उन्हें सूचना का अधिकार कानून की जानकारी है, लेकिन इसे इस्तेमाल करने वालों की संख्या बहुत कम है।  चिंतनीय यह भी है कि इस अध्ययन में जिन सेवाओं को मानक माना गया, वे सभी किसी देश के नागरिकों को सुरक्षित और सम्माननीय जीवन जीने के लिए आवश्यक हैं। सेवाओं की फेहरिस्त में खाद्य आपूर्ति, बिजली, पानी, अस्पताल, स्कूल, पुलिस, अदालत, बैंक, जमीन रजिस्ट्रेशन और टैक्स शामिल हैं। भ्रष्टाचार की दुखद स्थिति को रेखांकित करने के लिए यही बात काफी है कि बिना पैसा लिए अदालतें और पुलिस भी काम नहीं करती हैं। सर्वेक्षण में सामने आया है कि घूस न देने पर 3.5 प्रतिशत लोगों को अदालत से मनचाही तारीख या आदेश की सत्यापित कॉपी तक नहीं मिली। सार्वजनिक सेवाओं में मौजूद भ्रष्टाचार का अंदाज इससे भी लगाया जा सकता है कि घूस न देने पर 1.8 फीसद लोगों की पुलिस ने एफआइआर तक नहीं लिखी।

वैश्विक स्तर पर भी भ्रष्टाचार की समस्या को लेकर न केवल भारत की छवि नकारात्मक बनी हुई है, बल्कि कई अध्ययनों में हमारी रैंकिंग आईना दिखाने वाली है। ऐसे में भ्रष्टाचार की समस्या इसलिए भी चिंतनीय है कि यह कारोबारी परिवेश को नहीं, सामाजिक-पारिवारिक स्थितियों को भी प्रभावित करती है। बच्चों के दाखिलों से लेकर सही चिकित्सा सुविधा मिलने तक, हर पहलू को भ्रष्टाचार की समस्या प्रभावित कर रही है। देश-विदेश के कई काबिल नागरिक भारत में अपना उद्यम लगाने के लिए सरकारी दफ्तरों के जाल में फंस कर रह जाते हैं। ऐसे में यह बेरोजगारी बढ़ाने का भी अहम् कारण बनता है। यही वजह है कि भ्रष्टाचार के ये सारे आंकड़े डराने वाले हैं। हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था पर सवाल उठाते हैं। घूसखोरी के इस दलदल की यह स्थिति सरकारी तंत्र में हर स्तर पर बनी हुई है जिससे अंतत: आमजन को ही जूझना पड़ता है। जिस जनता के लिए ये सेवाएं और महकमे बने हैं वही इनके आगे मजबूर महसूस करती है। ऐसे में इस त्रासद स्थिति को लेकर गंभीरता से सोचा जाना जरूरी है। भ्रष्टाचार का मुद्दा सिर्फ नेताओं और सरकारी अफसरों तक सीमित नहीं है। इस समस्या से जुड़े सामाजिक पहलुओं पर भी गौर करना जरूरी है कि क्यों समाज में धनी व्यक्ति को कभी भय, तो कभी लोभ-लालच के चलते जनता हमेशा श्रेष्ठ स्थान देकर पूजनीय बना देती है। ऐसा होने के चलते आज धनार्जन ही सर्वोपरि बन गया है। भ्रष्टाचार का एक बड़ा कारण समग्र रूप से हमारे समाज की यह मानसिकता भी है, जिसमें धन का, धनी व्यक्ति का मान बहुत ऊंचा बना कर रखा है। यही वजह है कि कई सारे मोर्चों पर गहन विमर्श किए बिना इस दंश से छुटकारा संभव नहीं।

भ्रष्टाचार में कमी लाने के लिए सरकारी महकमों की कार्यशैली में पारदर्शिता लाना आवश्यक है। भ्रष्टाचार भारत की राष्ट्रीय समस्या है। इससे मुक्ति पाने के लिए जरूरी है कि भ्रष्टाचार संबंधी नियम और भी सख्त हों और घूसखोरी में लिप्त लोगों को कड़ी से कड़ी सजा मिले। प्रशासन सख्त और चुस्त हो और धार्मिक, सामाजिक, स्वयंसेवी संस्थाएं और जन जागरूकता लाने वाले संगठन इस समस्या के समाधान के लिए आगे आएं। आखिर कब तक आमजन उन सेवाओं के लिए घूस देकर आर्थिक नुकसान उठाएंगे और अपमानित होते रहेंगे, जो उनका अधिकार हैं?

 

 

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