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राजपाट: शाही तेवर

आम आदमी पार्टी के पंजाब में ग्रह नक्षत्र कुछ उलट गए हैं। एक तरफ नवजोत सिद्धू के साथ बात नहीं बन पा रही तो दूसरी तरफ सुच्चा सिंह छोटेपुर को पार्टी के संयोजक पद से अचानक हटाना पड़ गया।

Author Published on: August 29, 2016 4:55 AM
दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल। (File Photo)

शाही तेवर

शनिवार को अमित शाह ने अपने मुख्यमंत्रियों को सुशासन की दिन भर घुट्टी पिलाई। मोदी सरकार की उपलब्धियों को जन-जन तक पहुंचाने का लक्ष्य देकर लौटाया अपने आठ मुख्यमंत्रियों को। पर सरकार तो पार्टी की नौ राज्यों में है। पाठकों को बता दें कि राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे इस बैठक से नदारद थीं। वे तो एक दिन पहले ही भूटान में चल रहे संस्कृति मेले में शिरकत के बहाने जयपुर से खिसक गईं। बैठक का उद्घाटन भले अमित शाह ने किया पर समापन तो खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ही किया। वसुंधरा को इस बात का बखूबी अंदाज रहा ही होगा कि बैठक में उनकी मौजूदगी कितनी अहम है। पर अतीत की तरह इस बार भी ठेंगा दिखा दिया। आलाकमान का हस्तक्षेप पसंद नहीं वसुंधरा को। खासकर जिस तरह अमित शाह ने ओम माथुर को राज्यसभा भिजवाया, वह वसुंधरा को नागवार गुजरा होगा। सो, उन्होंने संदेश दे दिया कि उन्हें आनंदी बेन पटेल समझने की भूल कतई न करे पार्टी का नेतृत्व। उन्हें छेड़ने का मतलब होगा पार्टी की टूट और बगावत।
राज की बात
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कार्यशैली के बारे में मीडिया में गलत तस्वीर बन रही है कि वे तानाशाह हैं या फिर अपने मंत्रियों को आजादी नहीं देते और मंत्रियों ही नहीं मुख्यमंत्रियों तक की फिजूल की विदेश यात्राओं पर उन्होंने कड़ाई कर रखी है। ऐसा वास्तव में होता तो मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज चौहान बार-बार अमेरिका की यात्रा कैसे कर पाते। वह भी प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के बहाने। पूरे सरकारी अमले और अपने बेटे कुणाल चौहान के साथ। जो विदेश में पढ़ रहा है। पिता का प्रेम उसे अकेले यात्रा करने की छूट नहीं देता। निजी दौरे को सरकारी दौरा बनाने वाले यों भी चौहान कोई अकेले मुख्यमंत्री तो हैं नहीं। ऐसा तो अक्सर ही करते हैं राजनेता। हां, डर बस यही है कि भविष्य में कांग्रेस सत्ता में आई तो उखाड़ सकती है गड़े मुर्दे कि प्रत्यक्ष विदेशी निवेश तो फूटी कौड़ी नहीं आया फिर विदेश यात्राओं पर करोड़ों फूंकने का मकसद क्या था? वैसे भी कांग्रेस ने तो व्यापम घोटाले में भी अपने सगे-संबंधियों को सरकारी नौकरियां देने का आरोप लगाया था चौहान पर।

रूठ गए नक्षत्र
लगता है कि आम आदमी पार्टी के पंजाब में ग्रह नक्षत्र कुछ उलट गए हैं। एक तरफ नवजोत सिद्धू के साथ बात नहीं बन पा रही तो दूसरी तरफ सुच्चा सिंह छोटेपुर को पार्टी के संयोजक पद से अचानक हटाना पड़ गया। सुच्चा सिंह प्रकरण ने पार्टी की छवि को बट्टा भी लगा दिया। एक तरह से अब सूबे में बाहरी लोगों की पार्टी बन कर रह गए हैं अरविंद केजरीवाल। कद्दावर क्षत्रप पहले ही हाशिए पर हैं। जो बचे हैं वे भी उपेक्षित पा रहे हैं खुद को। पंजाब की गतिविधियां दिल्ली से चला रहे हैं संजय सिंह। छोटे सिंह का स्टिंग किसने कराया, यह अभी रहस्य के परदे में है। पर सूबे की आम जनता में तो संदेश चला ही गया कि स्थानीय नेताओं की पार्टी में कद्र नहीं। सुच्चा सिंह छोटेपुर बड़ी हैसियत के नेता हैं। सूबे की सियासत में लंबे अरसे से सक्रिय रहे हैं। काश! केजरीवाल और उनके दरबारी समझ पाते कि पंजाब के लोग बाहरी नेताओं को घास नहीं डालते। कम से कम अरुण जेटली की मिसाल ही देख लेते। नवजोत सिद्धू की जगह उन्हें दिल्ली से अमृतसर भेजा था लोकसभा चुनाव में भाजपा ने। पर कैप्टन अमरिंदर सिंह से मात खा गए।

हृदय परिवर्तन
महबूबा मुफ्ती के मन के भीतर झांकने का दावा अभी कोई नहीं कर सकता। भाजपाई बेशक खुशफहमी पाल सकते हैं कि जम्मू-कश्मीर की मुख्यमंत्री को अपने जाल में फंसा लिया। पर महबूबा ही जाने अपने मन की बात। घाटी में भाजपा की मार्फत कट्टरपंथियों को कमजोर करने की चाल खेल रही हैं वे। जैसे वे ही हों कश्मीर के असली दुश्मन। भाजपा और महबूबा दोनों ने एक ही सुर अपनाया है कि घाटी में अशांति चाहने वाले पांच फीसद से ज्यादा नहीं। कट्टरपंथी कमजोर पड़े तो रोजमर्रा के बंद और पत्थरबाजी से मुक्ति मिल सकती है। तभी सूबे की सरकार कानून व्यवस्था के इतर विकास के एजंडे को आगे बढ़ाने की सोच पाएंगी। सर्दियों तक पाक अधिकृत कश्मीर को लेकर केंद्र कोई कारगर कदम उठा सकता है। वहां चल रहे आतंकवादियों के अड्डों पर कार्रवाई भी इसमें शामिल है। इसका फायदा कश्मीर के बाहर यूपी, उत्तराखंड और पंजाब के चुनाव में भी मिल सकता है भाजपा को। कहने को एक तीर से दो शिकार की रणनीति है पर अंजाम ही करेंगे इस रणनीति का सही मूल्यांकन।

देर आयद
गनीमत है कि कांग्रेस आलाकमान की नींद टूट गई। उत्तराखंड में पार्टी के घमासान का संज्ञान ले लिया। मुख्यमंत्री हरीश रावत और सूबेदार किशोर उपाध्याय दोनों की अंबिका सोनी ने 24 अगस्त को दिल्ली में पंचायत करा दी। पंच बने राहुल गांधी। अगले चुनाव तक मतभेद भुला देने की नसीहत के साथ विदा किया। उपाध्याय ही नहीं हरीश रावत के सहयोगी दलित मंत्री यशपाल आर्य ने भी खूब निकाली रावत के प्रति अपनी भड़ास। ले-देकर महिला कांग्रेस की सूबेदार सरिता आर्य ही दिखीं मुख्यमंत्री की पैरोकार। थुक्का-फजीहत से आजिज आ चुकी अंबिका सोनी ने उत्तराखंड के पार्टी नेताओं की मौजूदगी में ही राहुल गांधी से कह दिया कि उन्हें प्रभारी पद से मुक्त कर दिया जाए। तो क्या मान लिया जाए कि पंजाब से हटाए गए कमलनाथ हो सकते हैं अब उत्तराखंड में पार्टी के प्रभारी। रही पंचायत की बात तो वफादार नेताओं को रेवड़ियों के रूप में लालबत्ती वाली कुर्सियों पर बिठाने की हिदायत लेकर देहरादून लौटे हरीश रावत। जिसकी सूची भी किशोर उपाध्याय पहले से ही साथ लेकर गए थे पंचायत में। इसके पीछे मकसद बताया असंतुष्ट नेताओं की कद्र कर विधानसभा चुनाव में पार्टी को एकजुट रखना।

बिहार का सवाल
नीतीश कुमार गाहे-बगाहे ऐसा कुछ न कुछ बोल देते हैं कि उस पर चर्चा भी छिड़ जाती है और विवाद भी। उनके सूबे बिहार में इन दिनों बाढ़ ने तबाही मचा रखी है। सो उन्होंने बयान दे दिया कि फरक्का बांध को हटा लेना चाहिए। गंगा का पानी नहीं निकल पाने से ही बिहार में बाढ़ भयावह हो जाती है। हर साल भारी तबाही होती है। नीतीश दिल्ली जाकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से भी मिल आए। बाढ़ से निपटने के लिए पर्याप्त मदद की गुहार लगा दी। इसमें तो किसी को संदेह नहीं हो सकता कि बांध जहां भी होते हैं, वहां मिट्टी या गाद तो जमा होती ही है। नतीजतन नदी की तलहटी ऊपर हो जाती है। पर यह समस्या तो सूबे की हर नदी के साथ जुड़ी है। मिट्टी जमा होने से नदियों के तल ऊंचे हो रहे हैं और बाढ़ से बचने के लिए तटबंधों को भी लगातार ऊंचा करना पड़ता है। हालत यह हो चुकी है कि नदियों के दोनों किनारों की जमीन का स्तर नीचे जा चुका है। ऊपर से जलाशय और तालाब भी अब पटते जा रहे हैं। बिहार में 2006 में भी बाढ़ ने प्रलय जैसी तबाही मचाई थी। उससे भी नीतीश ने कोई सबक नहीं लिया। सूझबूझ का परिचय दिया होता तो जलाशयों और तालाबों को पुनर्जीवित करने पर ध्यान लगाते। बारिश और नदियों के पानी की निकासी के उपाय सोचते और करते। उन्होंने तो बाढ़ पीड़ितों के लिए ऊंचे प्लेटफार्म बनाने का रास्ता चुन लिया। उसका न कोई नतीजा निकलना था और न निकला। नीतीश कुमार भूल गए कि फरक्का बांध हटाने की बात पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को कैसे सहन होगी। फिर तो बाढ़ से उनका सूबा तबाह हो जाएगा। अच्छा होता कि सुझाव देने से पहले ममता को भरोसे में ले लेते। फिर बांग्लादेश भी तो है। वहां भी प्रतिकूल असर पड़ेगा। लगता है कि नीतीश को सारे पहलुओं का अंदाज तो रहा होगा पर चर्चा में बने रहने और विवाद के हालात पैदा करने की सियासत तो उनकी फितरत ठहरी।

पंडित हुए लालू
लालू यादव का कौन मुकाबला कर सकता है। गए थे बिहार में बाढ़ पीड़ितों का हालचाल जानने। बोल दिया कि गंगा मैय्या घर तक चली आई हैं न। इ त आप लोगन का सौभाग्य है। पराथना करिए बाढ़ खतम हो जाए। लालू का यह कटाक्ष बाढ़ पीड़ितों को चुभा नहीं। वे तो खुद भी मान कर चल रहे हैं कि गंगा मैय्या का प्रकोप है। पाप त बढ़ ही रहा है। गंगा मइया ही हम सबन को बचाएंगी। पर लालू के विरोधियों को मुद्दा मिल गया। भाजपा और लोजपा दोनों के नेताओं ने एक ही सांस में कर दी राजद सुप्रीमो की लानत-मलानत। पासवान बोले कि लालू तो बाढ़ पीड़ितों के जले पर नमक छिड़क रहे हैं। मजबूरी में लालू को सफाई देनी पड़ रही है। वे कह रहे हैं कि उनके शब्दों पर न जाकर भाव को समझने की जरूरत है। बड़े भाई को संकट में देखा तो छोटे भाई यानी मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भी मैदान में कूद पड़े। बचाव की मुद्रा में फरमाया कि लालू जी का यह अपना अलग स्टाइल है, अपनी बात रखने का। मौका ताड़ केसी त्यागी ने भी बहती गंगा में डुबकी लगा दी। फरमाया कि लालू तो धार्मिक व्यक्ति हैं। वे विरोधियों की परवाह नहीं करते। वे तो आम आदमी की तरह सोचते और बोलते हैं। जो उन्हें बखूबी जानते हैं वे उनकी मंशा को भी अच्छी तरह समझते हैं।

शह और मात
सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस और भाजपा के बीच फिर शुरू हो गई है तू-तू, मैं-मैं। एक केंद्र की सत्ता पर काबिज है तो दूसरा पश्चिम बंगाल में। ममता बनर्जी अब खुल कर नरेंद्र मोदी के खिलाफ मैदान में कूद पड़ी हैं। उन पर देश के संघीय ढांचे को ध्वस्त करने का आरोप लगा दिया है। राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी से सलाह लेने की बात कही है। ममता ने संविधान के उल्लंघन तक का आरोप जड़ा है मोदी सरकार पर। इतना ही नहीं सूबे की सरकार के कामकाज में भी हस्तक्षेप की शिकायत है ममता को मोदी से। तानाशाही का रवैया और देश के लोगों की आजादी छीनने का भी तीखा आरोप है ममता का। नाराजगी केंद्र की योजनाओं के पुनर्गठन को लेकर उभरी है। उन्हें लगता है कि केंद्र सरकार की मंशा सूबे के खजाने की निगरानी करना है। लेकिन भाजपा भी कम नहीं। ममता के वार पर पलटवार करते हुए तृणमूल सरकार को पारदर्शिता का विरोधी बता दिया। भाजपा के सूबेदार दिलीप घोष ने दलील दी है कि योजनाओं के लिए अगर पैसा केंद्र सरकार दे रही है तो योजनाओं के प्रभावी ढंग से लागू होने की निगरानी और धन के दुरुपयोग को रोकने का जिम्मा कौन निभाएगा। मुख्यमंत्री अगर विरोध कर रही हैं तो साफ है कि उन्हें पारदर्शिता पसंद नहीं। अगर वे खफा हैं तो कानूनी रास्ता क्यों नहीं अपनातीं। उनके सांसद इस मुद्दे को संसद में भी तो उठा सकते हैं। फिर सार्वजनिक रूप से प्रधानमंत्री पर हमला करने की मंशा क्या है? सियासी रंग देना चाहती हैं वे हर मुद्दे को। मोदी के नेतृत्व में भारत ममता को आजाद नहीं लगता तो वे बताएं कि क्या तृणमूल कांग्रेस के राज में पश्चिम बंगाल वाकई आजाद है। जिस सूबे में अपराधी और आतंकी सरकार के फैसलों को प्रभावित करें और प्रशासन मूक दर्शक बन जाए, उसे कौन मानेगा आजाद।

शेर की सवारी 

अपने ही पसंदीदा मुद्दों के बोझ तले दब गई है राजस्थान में भाजपा। मंदिर, गाय और भ्रष्टाचार जैसे मसलों को जोर-शोर से उठाती रही है भगवा पार्टी। लेकिन अब विपक्षी कांग्रेस ने भाजपा को उसी के हथियार से घेरा है। कम से कम राजस्थान में तो ये मुद्दे भाजपा के गले की फांस ही बन गए हैं। यहां तक कि पार्टी की बैठकों में भी अपने ही नेता इन मसलों पर बागी सुर दिखा रहे। वसुंधरा की सरकार के रहते ही जयपुर में अनेक मंदिरों को तोड़ दिया गया। इसी तरह सरकारी गऊशाला में सैकड़ों गाय बेमौत मरीं तो पसीने छूट गए भाजपाइयों के। ढाई साल के राज में भ्रष्टाचार के मामले भी कम नहीं उभरे। यहां तक कि सरकार के पसंदीदा आइएएस अफसरों तक को जेल जाना पड़ गया। पहले खनिज घूसकांड सामने आया तो फिर एनआरएचएम की घूसखोरी। जलदाय महकमे के भी बड़े इंजीनियर रंगे हाथ पकड़े गए। लिहाजा शक की सुई महकमे की मंत्री किरण महेश्वरी के दफ्तर तक जा पहुंची। मुख्यमंत्री ने सफाई मांगी तो महेश्वरी को अपने ओएसडी की छुट्टी करनी पड़ गई। गऊशाला में हुई गायों की मौत का मुद्दा तो प्रदेश भाजपा की कोर कमेटी की बैठक में भी तूल पकड़ गया। खांटी संघी विधायक घनश्याम तिवाड़ी खुलकर सरकार पर वार कर रहे हैं। वसुंधरा का बस चलता तो अब तक पार्टी से बाहर निकाल देतीं उन्हें। लेकिन तिवाड़ी ने भी कच्ची गोलियां तो खेली नहीं। लंबे अरसे तक सरकारों में मंत्री रह चुके हैं। जो भी कहा है, पार्टी की विचारधारा के अनुरूप ही कहा है। रही पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व की बात तो अभी तो वह जुबानी चिंता जताने तक ही बेबस दिखता है।

चस्का सत्ता का
मोदी सरकार पर बस नहीं चलता तो क्या? आरएसएस राज्यों की भाजपा सरकारों के कान तो खींच ही रहा है। भोपाल में हुई इस बार समन्वय बैठक। भाजपा घोषित तौर पर तो नहीं पर अघोषित तौर पर तो अनुषांगिक संगठन है ही आरएसएस का। हर दो साल बाद होती है ऐसी समन्वय बैठक। गुरुवार को भोपाल में शुरू हुई बैठक के मुखिया थे संघ के सरकार्यवाह सुरेश भैयाजी जोशी। अपने कार्यकर्ताओं को सूबे की भाजपा सरकार के खिलाफ पनप रहे व्यवस्था विरोधी रूझान से अवगत कराया। भाजपा के सांसद और विधायक ही नहीं पदाधिकारी और मंत्री तक नौकरशाही के असहयोग का रोना रोते रहे। बाद में शिवराज चौहान सरकार के मंत्रियों से भी संघ के प्रचारकों ने विस्तार से चर्चा की। भाजपा का जिम्मा संभालने वाले सहसरकार्यवाह कृष्ण गोपाल के सत्र में तो भाईलोग आपा खो बैठे। दमोह के सांसद प्रह्लाद पटेल ने प्रभारी मंत्री पर भड़ास निकाली तो किसी ने दलबदलुओं को तरजीह मिलने का दुखड़ा रोया। आखिर में अमित शाह ने हाजिरी बजाई। भैयाजी जोशी और अमित शाह दोनों बाद में शिवराज चौहान के मेहमान बने।

सदन या अखाड़ा
हंगामों के लिए हो रही है अब हिमाचल विधानसभा की चर्चा। अध्यक्ष बृजबिहारी लाल बुटेल ने पूर्व मंत्री और भाजपा के विधायक रवींद्र रवि को बोलने का मौका नहीं दिया तो वे उखड़ गए। दरअसल अपने खिलाफ आय से ज्यादा संपत्ति के मामले को मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह ने अरुण जेटली और धूमल परिवार की साजिश बता दिया। फिर तो रवि आपा खो बैठे। अपना ही नहीं एक और विधायक की सीट पर लगी माइक भी तोड़ दी। अध्यक्ष को यह हरकत सदन की अवमानना नजर आई। लिहाजा अगले दिन कोपभाजन बन गए रवि। सत्र की बची तीन दिन की अवधि के लिए उन्हें निलंबित करने का फरमान सुना दिया। उनकी बहाली के लिए भाजपाई देर तक अध्यक्ष ही नहीं मुख्यमंत्री की भी चिरौरी करते रहे। पर फैसला नहीं बदला। आखिर में रवि के माफी मांगने पर ही रद्द हुआ उनका निलंबन। यानी वीरभद्र ने भाजपा के घुटने टिकवा दिए। माफी तो मांग ली पर दिल पर ले गए इस अध्याय को रवि। नतीजतन पहले शिमला के और फिर चंडीगढ़ के अस्पताल जाना पड़ गया।

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