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कैसे मिले सबको रोजगार

देश में आर्थिक गतिविधियों में सुधार के साथ बढ़ती श्रम शक्ति के लिए नए रोजगार पैदा करना बड़ी चुनौती बना हुआ है।

कैसे मिले सबको रोजगार
सांकेतिक तस्वीर। (फाइल फोटो)

जयंतीलाल भंडारी

इस समय रोजगार चुनौतियों के मद्देनजर राष्ट्रीय एवं स्थानीय दोनों ही स्तरों पर लोक निर्माण कार्यक्रमों से रोजगार बढ़ाए जा सकते हैं। जिस तरह गांवों में मनरेगा योजना रोजगार का प्रमुख माध्यम बन गई है, उसी तरह शहरी बेरोजगारों के लिए भी योजनाएं बनाने की जरूरत बढ़ती जा है।

पिछले हफ्ते आई सेंटर फार मानिटरिंग इंडियन इकोनामी (सीएमआइई) की रिपोर्ट के मुताबिक जून 2022 में बेरोजगारी दर बढ़ कर 7.80 फीसद पर पहुंच गई। जबकि मई 2022 में यह 7.12 फीसद थी। इस संदर्भ में उल्लेखनीय है कि जनवरी से मार्च 2022 की अवधि पर आधारित सावधिक श्रम शक्ति सर्वे (पीएलएफएस) के मुताबिक इस समय देश में रोजगार सृजन की स्थिति सुधारना जरूरी है।

देश में आर्थिक गतिविधियों में सुधार के साथ बढ़ती श्रम शक्ति के लिए नए रोजगार पैदा करना बड़ी चुनौती बना हुआ है। इसके लिए जहां सरकारी क्षेत्र में नौकरियां बढ़ाना जरूरी है, वहीं निर्माण क्षेत्र सहित निजी क्षेत्र में काम करने वाले श्रमिकों की तादाद भी बढ़ानी होगी। इसके साथ-साथ अस्थायी या ठेके पर काम करने वाले श्रमिकों (गिग वर्कर्स) के काम की दशाएं सुधारने और उनकी सामाजिक सुरक्षा सुनिश्चित करने की भी जरूरत है।

गौरतलब है कि केंद्र सरकार भी अब सरकारी नौकरियां बढ़ाने की जरूरत को समझ रही है। हाल में केंद्र सरकार के मंत्रालयों और विभागों में डेढ़ साल के भीतर दस लाख नियुक्तियों का निर्देश भी दिया गया। पिछले साल दिसंबर में संसद में बताया गया था कि केंद्र सरकार के विभागों में एक मार्च, 2020 तक आठ लाख बहत्तर हजार पद खाली पड़े थे। यह बात महत्त्वपूर्ण है कि देश में बड़ी संख्या में युवा सरकारी नौकरियों को पहली पसंद मानते हैं। लेकिन केवल सरकारी नौकरियों से रोजगार की बढ़ी हुई चुनौतियों का हल संभव नहीं है।

इसके कई रणनीतिक कदमों की जरूरत है। इसमें कोई संदेह नहीं कि पिछले पांच-छह वर्षों से बेरोजगारी उच्चतम स्तर पर है। राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण कार्यालय की रिपोर्ट के मुताबिक 2017-18 में बेरोजगारी चार दशक के ऊंचे स्तर पर रही। हालांकि कोरोना काल में सरकार ने उद्योग-कारोबार से घटते हुए रोजगार को बचाने के लिए अनेक पहल कीं और स्वरोजगार को बढ़ावा देने के लिए विशेष वित्तीय योजनाएं भी शुरू की थीं।

वर्ष 2020 में आत्मनिर्भर भारत और मेक इन इंडिया अभियान से अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के साथ-साथ आमदनी, मांग, उत्पादन और उपभोग में वृद्धि से रोजगार की चुनौती कम करने की कोशिश की। फिर भी पूर्णबंदी और प्रतिबंधों से उपजी बेरोजगारी का असर अभी तक कायम है। अब रूस-यूक्रेन युद्ध के कारण उद्योग-व्यापार में मंदी की आहट के बीच रोजगार संकट और गहराता जा रहा है।

देश में वर्ष 1991 में शुरू हुए उदारीकरण के तीन दशक बाद अब निजी क्षेत्र रोजगार के मामले में निश्चित रूप से सरकारी क्षेत्र से काफी आगे निकल चुका है। अब देश ही नहीं पूरी दुनिया में सरकारी क्षेत्र में नौकरियों की बजाय निजी क्षेत्र, स्वरोजगार, उद्यमिता और नवाचारी उद्योगों में रोजगार के अवसर कई गुना अधिक हैं। लेकिन निर्माण और सेवा क्षेत्र में नौकरियों के अधिक नए मौके सृजित करने की जरूरत बनी हुई है। संगठित क्षेत्र में रोजगार बढ़ रहे हैं। वित्त मंत्रालय की मई 2022 की रिपोर्ट के मुताबिक पिछले वित्त वर्ष 2021-22 में कर्मचारी भविष्य निधि (ईपीएफ) में रेकार्ड एक करोड़ बीस लाख नए सदस्यों की बढ़ोतरी हुई।

लेकिन रोजगार परिदृश्य पर एक बड़ी चिंता अस्थायी और ठेके पर काम करने वाले कामगारों को लेकर भी सामने आई है। ऐसे श्रमिकों की संख्या तेजी से बढ़ रही है, खासतौर से सेवा क्षेत्र में। हाल में प्रकाशित नीति आयोग की रिपोर्ट ‘इंडियाज बूमिंग गिग एंड प्लेटफार्म रिपोर्ट 2022’ के मुताबिक इस समय देश में करीब सतहत्तर लाख कामगार हैं जो छोटे-मोटे कामों में लगे हैं और जिनके पास कोई सामाजिक सुरक्षा नहीं है।

फिलहाल यह आंकड़ा गैर कृषि कार्यों से जुड़े कामगारों का लगभग 2.4 फीसद है और भारत में मौजूद कुल श्रम बल का 1.3 फीसद। दरअसल ये (गिग वर्कर) वे लोग होते हैं जो परंपरागत कामगारों से अलग तरीके से काम करते हैं। हर कारोबार में कुछ काम ऐसे होते हैं जिनको स्थायी कर्मचारी के बजाय अस्थायी कर्मचारी से कराया जा सकता है। ऐसे काम के लिए कंपनियां कर्मचारियों को काम के आधार पर भुगतान करती हैं। पर उनकी सामाजिक सुरक्षा को लेकर कोई प्रावधान या बंदोबस्त नहीं है।

नीति आयोग की रिपोर्ट के अनुसार ऐसे ज्यादातर कामगार खुदरा कारोबार, व्यापार, बिक्री, परिवहन, निर्माण, विनिर्माण, बीमा और वित्त क्षेत्र से जुड़े हैं। वर्तमान में ऐसे सैंतालीस फीसद कामगार मध्यम दर्जे के कौशल वाले कामों में लगे हैं, जबकि बाईस फीसद उच्च कौशल और इकतीस फीसद कम कौशल वाले कामों में। रिपोर्ट के अनुसार भारत में साल 2029-30 तक लगभग दो करोड़ पैंतीस लाख नए कामगार अर्थव्यवस्था से जुड़ जाएंगे। साल 2029-30 तक भारत में गैर कृषि कार्यों से जुड़े कामगारों के 6.7 फीसद लोग छोटे-मोटे काम वाली अर्थव्यवस्था से जुड़ जाएंगे। यह देश के कुल श्रम बल का लगभग 4.1 फीसद होगा। सामाजिक सुरक्षा की बड़ी चिंताओं के मद्देनजर नीति आयोग की रिपोर्ट में इन कामगारों और उनके परिजनों की समाजिक सुरक्षा सुनिश्चित करने के सुझाव भी दिए हैं।

अब देश और दुनिया में परंपरागत रोजगारों के समक्ष चुनौतियां बढ़ गई हैं। डिजिटल रोजगार के क्षेत्र में विकास तेजी से हो रहा है। कोविड-19 ने नए डिजिटल अवसर पैदा किए हैं, क्योंकि देश और दुनिया की ज्यादातर कारोबार गतिविधियां अब आनलाइन हो गई हैं। घर से काम करने का चलन तेजी से बढ़ा है और इसे व्यापक तौर पर स्वीकार्यता भी मिली है। यह काम करने वालों और कंपनियों दोनों को रास आ रहा है। यह स्पष्ट दिखाई दे रहा है कि जैसे-जैसे वैश्विक अर्थव्यवस्था डिजिटल होती जा रही है, वैसे-वैसे अब एक ओर कई रोजगार ऐसे भी दिख रहे हैं, जिनके नाम पहले सुने भी नहीं गए। जाहिर है, ऐसे में रोजगार के लिए लगातार नए-नए कौशल सीखना जरूरी होता जा रहा है।

इस समय भारत में ही नहीं, दुनिया के ज्यादातर देशों में रोजगार संकट चरम पर है। इसके लिए सरकारों को व्यापक स्तर पर रोजगार पैदा करने वाली परियोजनाओं के बारे में नए सिरे से सोचने की जरूरत है। 1930 की महाआर्थिक मंदी के समय अर्थशास्त्री किंस ने मंदी का अर्थशास्त्र प्रस्तुत करते हुए लोक निर्माण कार्यों को रोजगार और आय को बढ़ाने का महत्त्वपूर्ण आधार बताया था। ऐसे में इस समय रोजगार चुनौतियों के मद्देनजर राष्ट्रीय एवं स्थानीय दोनों ही स्तरों पर लोक निर्माण कार्यक्रमों से रोजगार बढ़ाए जा सकते हैं।

जिस तरह गांवों में मनरेगा योजना रोजगार का प्रमुख माध्यम बन गई है, उसी तरह शहरी बेरोजगारों के लिए भी योजनाएं बनाने की जरूरत बढ़ती जा है। केंद्र सरकार ने आगामी डेढ़ वर्ष में दस लाख नई नौकरियां देने की जो बात कही है, उस पर गंभीरता से कदम बढ़ाने की जरूरत है। इसके लिए केंद्र और राज्यों को मिल कर काम करना होगा। निर्माण और सेवा क्षेत्र को तेज रफ्तार देने की नीतियां बनानी होंगी। नई प्रतिभाओं और श्रमिकों को नई तकनीक से जोड़ने के लिए प्रशिक्षण पर जोर देना होगा।

इसी तरह नई डिजिटल अर्थव्यवस्था में रोजगार के मौकों को भुनाना होगा। इसके लिए कृत्रिम मेधा (एआइ), क्लाउड कंप्यूटिंग, मशीन लर्निंग और अन्य डिजिटल कौशल के साथ अच्छी अंग्रेजी, कंप्यूटर दक्षता और संवाद कौशल की योग्यताओं से भी नई पीढ़ी को तैयार करना होगा। नीति आयोग ने सेवा क्षेत्र में अस्थायी तौर पर काम करने वाले जिन लाखों अस्थायी कामगारों के लिए बेहतर सामाजिक सुरक्षा की जरूरत बताई है, उसके लिए भी तेजी से प्रयास करने की जरूरत है। कामगार स्वस्थ और सुरक्षित होंगे, तभी उद्योगों को भी उनका पूरा लाभ मिल सकेगा।

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