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राजपाट: राज्यपाल बेमिसाल

मलिक की बेबाकी बिहार के राज्यपाल के नाते तो ज्यादा नहीं दिखी थी। जम्मू कश्मीर में पिछले ढाई दशक से राज्यपाल का दायित्व नौकरशाहों या सेना के रिटायर अफसरों के पास रहा। लिहाजा जब बिहार से सत्यपाल मलिक को 2018 में राज्यपाल बनाकर वहां भेजा गया तो सबको हैरानी हुई।

राज्यपाल के रूप में सत्यपाल मलिक की काबिलियत और उत्तराखंड के पूर्व सीएम कांग्रेस नेता हरीश रावत।

सत्यपाल मलिक के तबादले पर हर कोई हैरान है। हैरान तो खुद मलिक भी जरूर होंगे पर राज्यपाल के पद की मर्यादा को कैसे लांघ सकते हैं। एक साल से भी पहले गोवा से मेघालय तबादले के बारे में पत्रकारों ने कुरेदना चाहा कि कहीं बेबाकी की सजा तो नहीं मिली तबादले के रूप में। सुलझे राजनेता के अंदाज में मलिक बोले कि मेघालय तो गोवा से बड़ा है। बहुत खूबसूरत जगह है। जम्मू कश्मीर में दिन रात मेहनत की। बहुत हो गया। अब आराम का समय है। पर इतना तय है कि भ्रष्टाचार और अनियमितता कहीं भी होगी तो मैं चुप नहीं रहूंगा। हो सकता है कि कुछ लोगों को मेरी बात अच्छी न लगे।

मलिक की बेबाकी बिहार के राज्यपाल के नाते तो ज्यादा नहीं दिखी थी। जम्मू कश्मीर में पिछले ढाई दशक से राज्यपाल का दायित्व नौकरशाहों या सेना के रिटायर अफसरों के पास रहा। लिहाजा जब बिहार से सत्यपाल मलिक को 2018 में राज्यपाल बनाकर वहां भेजा गया तो सबको हैरानी हुई। मलिक ने शुरू में तो यही कहा कि वे सूबे में शांति स्थापना के लिए सबके लिए राजभवन के दरवाजे खोलकर रखेंगे। आतंकवादियों से मलिक ने हिंसा का रास्ता छोड़ने की अपील तो की ही साथ ही नसीहत भी दे डाली कि वे सुरक्षा बलों पर हमले क्यों करते हैं। सुरक्षा बल तो कश्मीर की हिफाजत कर रहे हैं।

मारना ही हो तो उन नेताओं को मारो जिन्होंने कश्मीर को लूटा है। इस बयान की आलोचना भी हुई पर मलिक टस से मस न हुए। फिर अनुच्छेद 370 खत्म हुआ तो उन्होंने मुखर अंदाज में केंद्र के फैसले का बचाव किया। यह बात अलग है कि बीच-बीच में वे कुछ ज्यादा ही स्पष्टवादी भी हुए जब कहा कि वे आइबी की सूचनाओं पर भरोसा नहीं करते। जम्मू कश्मीर से पिछले साल गोवा गए तो वहां भी मूकदर्शक नहीं रहे।

कोविड से मुकाबले की प्रमोद सावंत सरकार की कार्यप्रणाली की आलोचना कर दी। पर्यावरण व महादयी नदी जल विवाद जैसे मुद्दों पर कड़ा रुख दिखाया। यही वजह है कि मेघालय हुए उनके तबादले को प्रमोद सावंत की नाराजगी का नतीजा माना जा रहा है। अभी तो मलिक के कार्यकाल के दो साल बचे हैं। देखना दिलचस्प होगा कि मेघालय में ही रहेंगे या इस दौरान किसी और राजभवन की बारी भी आ सकती है। पाठकों को बता दें कि मलिक बिहार में थे तो कुछ दिन ओड़ीशा के राज्यपाल का जिम्मा भी संभाला। तीन साल में पांच राजभवन देखने वाला शायद ही दूसरा कोई राज्यपाल हो देश में।

ब्राह्मण मोह
उत्तर प्रदेश में हर सियासी दल का ब्राह्मण मोह उमड़ पड़ा है। कांग्रेस कुछ ज्यादा ही लालायित है। तभी तो पार्टी के नेता जितिन प्रसाद ने अपने सारे विधायकों को खुली सलाह दे डाली कि वे ब्राह्मणों के उत्पीड़न का खुलकर विरोध करें। सूबे में ब्राह्मण आबादी कितनी है, इसका कोई अधिकृत आंकड़ा तो उपलब्ध है नहीं। ब्राह्मण संगठनों के दावों को देखें तो बारह से पंद्रह फीसद तक हैं ब्राह्मण। हालांकि हकीकत में तो इसके आधे ही होंगे। उपाध्याय, स्वामी, पांचाल, बढ़ई, अचारज और महापंडित जैसी जातियां ओबीसी में ठहरी। पर सियासी मोलतोल के वक्त उन्हें भी शामिल कर लेते हैं ब्राह्मण। हां, रोटी-बेटी के नाते की बात हो तो नाक-भौं सिकोड़ते हैं। कभी कांग्रेस का वोट बैंक थे ब्राह्मण। मंदिर आंदोलन ने भगवा पार्टी की तरफ मोड़ दिया।

फिर 2007 में मायावती ने ज्यादा ब्राह्मणों को टिकट दिए तो वे भूल गए कि ठाकुर, बामन, बनिया चोर का नारा इसी पार्टी का था। उल्टे खुद नारा लगाने लगे कि हाथी नहीं, गणेश है, ब्रह्मा, विष्णु महेश है। हाथी दिल्ली जाएगा, ब्राह्मण शंख बजाएगा। मायावती को 2007 में बहुमत मिला तो श्रेय दलित-ब्राह्मण भाईचारे को मिला। आम आदमी पार्टी के सांसद संजय सिंह लखनऊ पहुंचे तो उन्होंने भी दलितों-ब्राह्मणों से ही सरोकार जताया। बसपा तो अब भाजपा पर खुलेआम ब्राह्मणों की अनदेखी का आरोप लगा रही है। किसी भी प्रमुख राज्य में भाजपा ने ब्राह्मण को मुख्यमंत्री नहीं बना रखा। महाराष्टÑ में देवेंद्र फडणवीस थे पर वहां भी सत्ता जाती रही। विधानसभा चुनाव में अभी दो साल हैं, पर जातीय समीकरण फिट करने में अभी से जुट गए हैं सारे दल।

रिश्तों का घालमेल
कांग्रेस आलाकमान ने उत्तराखंड में पार्टी की अंदरूनी कलह रोकने के मकसद से हरीश रावत को राष्टÑीय महासचिव और असम का प्रभारी बनाया था। लेकिन सूबे की सियासत से उनका मोह फिर भी नहीं छूटा। सूबेदार प्रीतम सिंह और विधायक दल की नेता इंदिरा हृदेश दुखी हों तो रहें। सुर्खियों में रहने के हथकंडे हरीश रावत को आते हैं। तभी तो सूबे के एक स्थानीय फल काफल की पार्टी दी। कई भाजपाई तो दिखे पर प्रीतम और इंदिरा नहीं पहुंचे। भाजपा सरकार की पोल खोलने की गरज से बैलगाड़ी पर यात्रा भी निकाल चुके हैं। इस चक्कर में सरकार ने कोरोना की बंदिश तोड़ने के आरोप में कई मुकदमे भी उनके खिलाफ दर्ज कर दिए। असली शोहरत उनके साथ जुबानी जंग कर भाजपा के सूबेदार बंशीधर भगत ने दिलाई। पिछले साल हुई हरीश रावत की काफल पार्टी में तो मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत भी पहुंचे थे। कमाल का घालमेल है सूबे के नेताओं के रिश्तों में। (प्रस्तुति : अनिल बंसल)

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