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राजपाट: नई मुसीबत

हाई कोर्ट ने इस मामले में 27 अगस्त को सिंधिया को नोटिस भी भेज दिया। यों कांग्रेस ने पहले भी इस मामले को उठाया था पर विधानसभा सचिवालय ने शिकायत तब खारिज कर दी थी। भाजपा बेशक अनुशासित और दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी होने का दावा करती है पर असंतोष तो यहां भी कम नहीं है।

Rajpat, special page on politisमध्यृप्रदेश में बीजेपी के वरिष्ठ नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार।

ज्योतिरादित्य सिंधिया की मुश्किलें बढ़ भी सकती हैं। मध्यप्रदेश के पूर्व मंत्री गोविंद सिंह ने राज्यसभा के सिंधिया के चुनाव को हाई कोर्ट में चुनौती दी है। उनका आरोप है कि सिंधिया ने अपने नामांकन में अपने खिलाफ चल रहे आपराधिक मुकदमे की जानकारी छिपाई थी।

हाई कोर्ट ने इस मामले में 27 अगस्त को सिंधिया को नोटिस भी भेज दिया। यों कांग्रेस ने पहले भी इस मामले को उठाया था पर विधानसभा सचिवालय ने शिकायत तब खारिज कर दी थी। गोविंद सिंह ने सिंधिया के राज्यसभा निर्वाचन को रद्द करने की फरियाद की है। सिंधिया ही नहीं चुनाव आयोग को भी भेजा है हाई कोर्ट ने नोटिस। सिंधिया को चार हफ्ते के भीतर जवाब देना होगा। एक तरफ हाई कोर्ट का डर है तो दूसरी तरफ केंद्र में मंत्री पद मिलने में लगातार देरी हो रही है। उम्मीद थी कि पितृपक्ष से पहले ही प्रधानमंत्री अपने मंत्रिमंडल का विस्तार करेंगे।

साथ ही भाजपा अध्यक्ष जगत प्रकाश नड्डा द्वारा भी अपनी टीम बनाया जाना बाकी है। पहले तो मंत्रिमंडल विस्तार कोरोना संक्रमण के कारण लटकना बताया गया। अब चर्चा है कि बिहार विधानसभा चुनाव की घोषणा से पहले हो सकता है विस्तार। जो भी हो ज्योतिरादित्य की मुराद तो पूरी हो नहीं पाई है।

हां, मध्यप्रदेश सरकार में जरूर अपने समर्थक विधायकों को ज्यादा मंत्री पद और अहम विभाग दिलाने में सफल हुए थे। वह भी मुख्यमंत्री शिवराज चौहान की आनाकानी के बावजूद। अब सूबे में विधानसभा की 27 सीटों का चुनाव उनके लिए अग्निपरीक्षा सरीखा होगा। एक तो उनके समर्थक विधायक अगर छह महीने के भीतर सदन में निर्वाचित होकर न आए तो मंत्री पद से हाथ धो बैठेंगे।

दूसरे जो उप चुनाव में नहीं जीत पाएंगे वे भी मंत्री नहीं रह पाएंगे। पर फिलहाल तो सिंधिया सरकार की तरह संगठन में भी करीबियों को अहम पद दिलाने की लाबिंग कर रहे हैं। भाजपा के छह महीने पहले नियुक्त हुए सूबेदार विष्णु दत्त शर्मा अपनी टीम के चयन की कवायद में जो उलझे हैं।

अंतर कलह
भाजपा बेशक अनुशासित और दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी होने का दावा करती है पर असंतोष तो यहां भी कम नहीं है। उत्तराखंड को ही लीजिए। पार्टी विधायकों में मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत की कार्यशैली को लेकर नाराजगी किसी से छिपी नहीं है।

बिशन सिंह चुफाल पूर्व में मंत्री रह चुके हैं। वरिष्ठता के बावजूद वे तीन साल में अपनी सरकार होने का अहसास कभी कर ही नहीं पाए। तभी तो दर्जन भर पार्टी विधायकों को लेकर दिल्ली दरबार में दस्तक देने देने की नौबत आई। पार्टी के मुखिया जगत प्रकाश नड्डा को दो टूक कह आए कि मुख्यमंत्री ने कार्यशैली नहीं बदली तो 2022 के चुनाव में पार्टी की जीत मुश्किल होगी।

सांसदों-विधायकों की शासन में सुनवाई नहीं होने से लेकर भाजपा की तुलना में कांग्रेस के विधायकों को ज्यादा अहमियत दिए जाने जैसे दुखड़े रोए। विधायक उमेश शर्मा ने तो नड्डा को चिट्ठी ही लिख मारी। अपने विधानसभा क्षेत्र रायपुर में विकास नहीं होने की शिकायत की है।

उमेश शर्मा पूर्व मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा के खास माने जाते हैं। अपनी अनदेखी से दुखी तो बहुगुणा भी कम नहीं हैं। कांग्रेस छोड़ भाजपा में आए थे तो मुख्यमंत्री पद की हसरत पाली थी। जो अधूरी ही रह गई। अब राज्यसभा का ख्वाब देख रहे हैं। इसी साल खत्म होगा कांग्रेस के राज बब्बर का कार्यकाल। पर करीबियों से बहुगुणा ने यही कहा बताते हैं कि स्तर इतना नहीं गिरा है कि राज्यसभा सीट के लिए आलाकमान से गिड़गिड़ाएं। जहां तक त्रिवेंद्र सिंह रावत का सवाल है, उनका खेमा चुफाल और उमेश शर्मा की बगावत के पीछे केंद्रीय मंत्री रमेश पोखरियाल निशंक और सांसद अजय भट्ट की परोक्ष भूमिका मान रहा है।

शह और मात

जीतन राम मांझी को साथ लेकर नीतीश कुमार ने महादलितों पर दांव खेला है। अभी तक बिहार में दलित राजनीति की धुरी रामविलास पासवान को माना जाता था। दो साल पहले तक तो पासवान और नीतीश का आपस में अच्छा सदभाव था। राजद के साथ नाता तोड़ नीतीश ने जब भाजपा के साथ मिलकर सरकार बनाई तो पासवान के छोटे भाई पशुपति कुमार पारस को भी पहले मंत्रिपद दिया और फिर एमएलसी बनाया था। खटपट लोजपा पर चिराग का प्रभाव बढ़ने के बाद शुरू हुई। चिराग ने अपनी दूरगामी सियासत के बरक्स जद (एकी) के मुकाबले भाजपा को तरजीह देना बेहतर समझा और नीतीश सरकार के कामकाज पर नुक्ताचीनी चालू की तो नीतीश ने भी कह दिया कि लोजपा का वास्ता भाजपा से है, जद (एकी) से नहीं। नीतीश अब लोजपा को चुनाव में ज्यादा सीटें देने के मूड में नहीं लग रहे। ऐसे में चिराग को घाटा सहना होगा या फिर कोई और राह तलाशनी पड़ेगी। (प्रस्तुति : अनिल बंसल)

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