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राजपाट: समरथ को नहीं दोष

केजरीवाल की घेरेबंदी में भाजपा ने कोई कसर नहीं छोड़ी।

Author Published on: February 8, 2020 2:53 AM
दिल्ली विधानसभा चुनाव के प्रचार में इस बार सारी मर्यादाएं टूट गईं।

संघ परिवार की योजना अयोध्या में बनने वाले भव्य राममंदिर के लिए एक बार फिर बड़े पैमाने पर चंदा उगाहने की है। यों राममंदिर के लिए चंदा देने वालों की देश में कोई कमी नहीं। बड़े-बड़े उद्योगपति ही कर सकते हैं इस जरूरत की पूर्ति। पर संघ परिवार इस बहाने व्यापक स्तर पर फिर हिंदू जागरण करने की रणनीति बना चुका है। उसी तर्ज पर जैसे 1989-90 में रामजन्म भूमि आंदोलन के दौर में बनाई थी। तब मोरोपंत पिंगले ने अच्छा आइडिया दिया था। राम शिला पूजन के बहाने अयोध्या आंदोलन को गति देने का।

हर घर से मंदिर निर्माण के नाम पर सवा रुपए नकद और एक र्इंट के योगदान की दरकार थी। करोड़ों घरों से मिला था चंदा। पर उसका हिसाब-किताब लोगों के सामने कभी नहीं आया। न यह पता लग पाया कि पूजन की हुई शिलाओं (ईंटों) का क्या हुआ? हां, अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार के वक्त आयकर विभाग के एक अफसर विश्व बंधु गुप्ता ने परिषद को आमदनी के ब्यौरे की बाबत नोटिस भेजने की जुर्रत जरूर की थी। बदले में विहिप और संघ परिवार ने उनको अपनी सरकार से निलंबित करा दिया था।

पर चंदे का हिसाब नहीं दिया था। चंदे के बारे में सवाल कभी विरोधी दलों ने भी नहीं किया। हां, विहिप के इस नारे- राम लला हम आएंगे, मंदिर वहीं बनाएंगे का यह जोड़ कर मजाक जरूर उड़ाया कि तारीख नहीं बताएंगे। तीस साल हो गए उस चंदे को। सरकारी योजना में भी निवेश किया होता तो अब तक कम से कम पंद्रह गुना हो गया होता। खैर, उस रकम को भुला अब हर घर से सवा रुपए की जगह ग्यारह रुपए का चंदा लेने की योजना पर हो रहा है काम।

लखटकिया सवाल

दिल्ली विधानसभा चुनाव के प्रचार में इस बार सारी मर्यादाएं टूट गईं। भाषा की असहिष्णुता में कोई पीछे नहीं रहा। आम आदमी पार्टी और कांग्रेस संसाधनों के मामले में भले भाजपा के मुकाबले हल्के दिखे हों पर जुबानी जंग में टक्कर बराबरी की रही। मुद्दों के अभाव में भाजपा ने शाहीन बाग पर फोकस किया। उसने इसी मुद्दे से दिल्ली में अपना बाइस साल पुराना वनवास खत्म होने की आस लगाई है। जबकि अरविंद केजरीवाल को अपनी सरकार के कामकाज और बेदाग छवि के बूते सत्ता में वापसी का भरोसा है।

केजरीवाल की घेरेबंदी में भाजपा ने कोई कसर नहीं छोड़ी। अमित शाह ने तो हर दिन कई-कई नुक्कड़ सभाएं, रोड शो और रैलियां की। प्रधानमंत्री के हाथ मजबूत करने के नाम पर वोट मांगे। भाजपा के ग्यारह मुख्यमंत्रियों और दो सौ सांसदों के चक्रव्यूह से केजरीवाल को बचाने आई उनकी पत्नी सुनीता और बेटी हर्षिता। केजरीवाल की तरह उनकी पत्नी भी आयकर महकमे की बड़ी अफसर थीं। वक्त से पहले नौकरी छोड़ दी। बेटी हर्षिता इंजीनियर हैं और किसी साफ्टरवेयर कंपनी में काम करती हैं। उनके पिता को कोई आतंकवादी कहे, यह चौबीस साल की हर्षिता को अखरा।

पिता के बचाव में बोलीं कि उन्होंने हमें बचपन से एक ही गीत सिखाया- इंसान से इंसान का हो भाईचारा। क्या यह गीत आतंकवाद है? क्या मुफ्त चिकित्सा सुविधा देना आतंकवाद है? बच्चों को अच्छी शिक्षा मुहैया कराना क्या आतंकवाद है? गरीबों को मुफ्त बिजली-पानी देना क्या अपराध है? अपनी कंपनी से छुट्टी लेकर प्रचार के लिए आई हर्षिता ने फरमाया कि लाख टके के इन सवालों के जवाब दिल्ली की जनता दे देगी।

(प्रस्तुति : अनिल बंसल)

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