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राजपाट- खतरे की घंटी

शिवराज के साथ नर्मदा परिक्रमा में जिस तरह उनकी पत्नी साधना सिंह साथ थीं उसी तरह दिग्गी को भी अपनी पत्नी अमृता राय को साथ रखना चाहिए।

Author July 24, 2017 05:33 am
कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह (तस्वीर का इस्तेमाल केवल प्रतिकात्मक रूप से किया गया है)

 

मायावती का राज्यसभा से इस्तीफा आकस्मिक फैसला नहीं हो सकता। यह एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है। भाजपा को 2019 के लोकसभा चुनाव से भी पहले ही चुनौती देने की रणनीति। भाजपाई लाख दावे करें कि बसपा का दलित वोट बैंक दरक कर इस साल हुए उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में उनकी झोली में आ गया, यह कतई विश्वसनीय नहीं है। अगर दलित ही खिसक जाते तो बीस फीसद से ज्यादा वोट कहां से पा जातीं मायावती। हां, यह सही है कि मुसलमानों का वोट उन्हें इस बार भी अपेक्षा के मुताबिक नहीं मिल पाया। अगड़ी जातियां तो खैर 2012 में ही छोड़ गई थी उनका साथ। चिंता अगर मायावती को होगी तो सहारनपुर में सामने आई चंद्रशेखर की भील सेना की भले हो। फिलहाल तो कांग्रेस और लालू यादव मिलकर विपक्ष की एकता के प्रयास में जुटे हैं। फूलपुर से केशव मौर्य और गोरखपुर से योगी आदित्यनाथ को लोकसभा सीट छोड़नी है। दोनों को छह महीने के भीतर विधानसभा या विधान परिषद में आना ही होगा। यह अटकल महज चंडूखाना नहीं हो सकती कि मायावती फूलपुर से लोकसभा उपचुनाव लड़ने के मूड में हैं। कांग्रेस और सपा के समर्थन से। बदले में गोरखपुर में बसपा अपना उम्मीदवार उतारने के बजाए सपा के लिए सीट छोड़ेगी।

भाजपाई गणित में कमजोर नहीं हो सकते। वे जानते हैं कि लोकसभा चुनाव में सूबे की 80 में से 73 सीटें उन्होंने महज 41 फीसद वोट पाकर झटकी थीं। विधानसभा में तो इस जनाधार में एक फीसद की कमी ही हुई। यानी बहुकोणीय मुकाबलों ने जीत की राह आसान बनाई थी। विपक्ष एकजुट हुआ तो यूपी में भी बिहार दोहराया जा सकता है। याद कीजिए 1978 को। राम नरेश यादव आजमगढ़ के सांसद के नाते सूबे के मुख्यमंत्री बने थे। फिर एटा से विधानसभा उपचुनाव लड़कर सदन के सदस्य बने तो आजमगढ़ लोकसभा से इस्तीफा दिया था। कांग्रेस की हालत बेहद पस्त होने और खुद का मनोबल भी कमजोर होने के बावजूद इंदिरा गांधी ने मोहसिना किदवई को इस उपचुनाव में उतारा था। नतीजा आया तो हर कोई हैरान था। मोहसिना किदवई जीती थीं और जनता पार्टी का तिलिस्म यहीं से टूट गया था। उसके बाद जब दलित नरसंहार के कारण हाथी पर सवार इंदिरा गांधी बिहार के बेलछी पहुंचीं थीं तो उन्हें देखने के लिए जनसैलाब उमड़ा था। उसी से हौसला बढ़ा और इंदिरा गांधी कर्नाटक के चिकमंगलूर से लोकसभा उपचुनाव जीत कर दो साल से भी पहले ही संसद में पहुंच गई थीं। फिर तो उन्होंने अपनी तिकड़मों से मोरारजी की सरकार गिरवाई और चरणसिंह को प्रधानमंत्री बनवा कर 28 महीने के भीतर ही लोकसभा का मध्यावधि चुनाव करा दिया था। केंद्र और यूपी दोनों जगह कांग्रेस की सत्ता में वापसी हुई थी। मोदी भक्तों को यह नहीं भूलना चाहिए कि सियासत में कुछ भी निश्चित नहीं होता। राजीव गांधी तो 1984 में मोदी से बड़ा जनादेश लेकर प्रधानमंत्री बने थे। शुरू में सभी ने कहा था कि वे लंबे चलेंगे। छवि भी साफ-सुथरी थी। नौजवान तो थे ही। पर तीन साल में ही चमक उतर गई और 1989 के चुनाव में सत्ता से बेदखल हो गए। वाजपेयी सरकार की मिसाल भी दी जा सकती है। जिस तरह आज मोदी का विकल्प नहीं होने का राग अलापा जा रहा है, कुछ वैसा ही 2004 में प्रमोद महाजन ने शाइनिंग इंडिया के बूते उजागर किया था कि वाजपेयी का कोई विकल्प नहीं है। पर नतीजों ने उनके अति आत्मविश्वास को चकनाचूर ही किया था। साफ है कि विपक्षी एकता की खिचड़ी पकी तो भाजपा के लिए संकट हो सकता है। यों भी भारत में जनादेश अतीत में सत्तारूढ़ पार्टी को बेदखल करने के लिए ही आए हैं। बेहतर विकल्प चुनने के लिए नहीं।
दिग्गी की हसरत
दिग्विजय सिंह अब भी मध्य प्रदेश की सत्ता का मोह छोड़ नहीं पा रहे। मुख्यमंत्री शिवराज चौहान की तर्ज पर नर्मदा परिक्रमा करेंगे। योजना 30 सितंबर से शुरुआत की बताई जा रही है। लेकिन कांग्रेस आलाकमान की अनुमति मिलने पर ही। अनुमति के लिए आवेदन कर दिया है। छह महीने तक चलाना चाहते हैं वे अपनी इस यात्रा को। करीबियों ने सुझाव दिया है कि शिवराज के साथ नर्मदा परिक्रमा में जिस तरह उनकी पत्नी साधना सिंह साथ थीं उसी तरह दिग्गी को भी अपनी पत्नी अमृता राय को साथ रखना चाहिए। फिर तो आयोजन सियासी न होकर पारिवारिक कहलाएगा। अभी तो योजना ही बन रही है पर सियासी निहितार्थ तलाशे जाने लगे हैं। तीन हजार किलोमीटर से लंबी परिक्रमा केवल मध्यप्रदेश तक ही सीमित नहीं रहेगी।गुजरात के नर्मदा अंचल का फेरा भी लगाएंगे पूर्व मुख्यमंत्री। मध्यप्रदेश में तो चुनाव अगले साल होंगे पर गुजरात में तो इसी साल होने हैं। परिक्रमा के बहाने दिग्गी अपनी पार्टी के छह करोड़ पौधे लगाने के दावे की पड़ताल भी कर पाएंगे। नर्मदा में होने वाले अवैध खनन की सही तस्वीर आंखों से देख लेंगे तो सरकार पर हमले का हथियार भी मिल जाएगा। दिग्गी को यह नहीं भूलना चाहिए कि शिवराज जब नर्मदा सेवा यात्रा कर रहे थे तो ज्योतिरादित्य सिंधिया ने उन्हें सर्वेयर बता कर उनकी खिल्ली उड़ाई थी। अपनी यात्रा को किस नजरिए से देखेंगे सिंधिया, यह जानना भी कम दिलचस्प नहीं होगा। पर पहले आलाकमान हरी झंडी तो दिखाए।

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