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राजपाट- कंपकंपी

एक भी सीट हाथ से गई तो इसे वसुंधरा के चार साल के कामकाज के खिलाफ लोगों का रोष बताएंगे उनके विरोधी। लोकसभा के अलावा मांडलगढ़ विधानसभा सीट का भी उपचुनाव है। उधर गुरदासपुर को फतह करने के बाद कांग्रेसी फूले नहीं समा रहे।

Author October 23, 2017 4:54 AM
उपचुनाव के लिए नामांकन पत्र दाखिल करने की आज (बुधवार) अंतिम तिथि है।

गुरदासपुर लोकसभा सीट के उपचुनाव में मिली करारी शिकस्त से भाजपा के रणनीतिकार संभले हैं। कम से कम राजस्थान को लेकर। अलवर और अजमेर की लोकसभा सीटों का उपचुनाव होगा यहां। 2014 में भाजपा ने जीती थी ये सीटें। दोनों जगह पार्टी ने मतदाताओं से संपर्क का रास्ता चुना है। खुद मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने झोंक दी है अपनी सारी ताकत। आखिर प्रतिष्ठा भी तो दांव पर उन्हीं की है। एक भी सीट हाथ से गई तो इसे वसुंधरा के चार साल के कामकाज के खिलाफ लोगों का रोष बताएंगे उनके विरोधी। लोकसभा के अलावा मांडलगढ़ विधानसभा सीट का भी उपचुनाव है। उधर गुरदासपुर को फतह करने के बाद कांग्रेसी फूले नहीं समा रहे।

अजमेर में कांग्रेस के सूबेदार सचिन पायलट और अलवर में पूर्व केंद्रीय मंत्री जितेंद्र सिंह के मैदान में उतरने की अटकलों ने भी भाजपा के होश उड़ाए हैं। सो, अलवर में किसी बाबा के सहारे ही जीत का ताना-बाना बुना जा रहा है। महंत चांदनाथ के निधन से आई है यहां उपचुनाव की नौबत। उन्हीं के उत्तराधिकारी बाबा बालकनाथ को मैदान में उतारने की योजना है। लाबिंग स्वामी रामदेव भी उन्हीं के लिए कर रहे हैं। यादव बहुल हरियाणा से सटी है अलवर की सीट। बालकनाथ को उम्मीदवार बनाने की खबर ने अलवर के भाजपाई दावेदारों का पारा सातवें आसमान पर पहुंचा दिया है। वे आलाकमान को आगाह कर रहे हैं कि बाहरी का हारना तय है। खासकर इस नाते कि कांग्रेस के जितेंद्र सिंह न केवल स्थानीय हैं बल्कि लगातार काम भी कर रहे हैं अपने इलाके में। वसुंधरा राजे के दावे के हिसाब से भी स्थानीय को ही उतारना रहेगा न्यायोचित। उनकी सरकार ने बेहतर कामकाज का दावा किया है। अजमेर में भी कमोबेश यही हालत है। कार्यकर्ताओं की बगावत के अंदेशे से मुख्यमंत्री और दूसरे बड़े नेता अजमेर और अलवर के चक्कर लगा रहे हैं। रही कार्यकर्ताओं की बात तो सरकार में अपनी कोई पूछ नहीं होने से उपजे गुस्से को वे उपचुनाव में पार्टी को हरा कर जताने के फेर में हैं।

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