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राजपाटः हर कोई पैंतरेबाज

इंदौर के मेयर रहे हैं और वहां की लंबे समय तक सांसद रहीं सुमित्रा महाजन उनसे सदैव त्रस्त रहीं। उत्तराखंड के पार्टी प्रभारी थे तो त्रिवेंद्र सिंह रावत की नींद उड़ा कर रखते थे।

लोक जनशक्ति पार्टी को लग रहा है कि नीतीश कुमार उसके विस्तार में बाधा बने हैं।

चुनाव का साल है तो सियासी उठापटक और गहमागहमी भी होगी ही। बात बिहार की कर रहे हैं। राजद की फूट बेशक सार्वजनिक है पर खटास तो सत्तारूढ़ राजग के घटक दलों में भी कम नहीं। लोक जनशक्ति पार्टी को लग रहा है कि नीतीश कुमार उसके विस्तार में बाधा बने हैं। कहीं न कहीं दोनों दलों के शिखर नेतृत्व का आपसी अहं और हितों का टकराव भी मनमुटाव की दरार को चौड़ा कर रहा है। ताजा विवाद चिराग पासवान द्वारा मुंगेर जिले के पार्टी अध्यक्ष की छुट्टी करने से उठा है। गुनाह बना एक बयान कि बिहार में राजग एकजुट है। चिराग ने इसे पार्टी लाइन के खिलाफ माना और कहा कि इस तरह के नीति संबंधी बयान सिर्फ पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष दे सकते हैं। चिराग की टीस कई हैं। बिहार विधानसभा में भले उनके दो ही विधायक हैं पर घटक दल के नाते उन्हें एक मंत्रिपद तो मिलना ही चाहिए था। विधान परिषद की राज्यपाल के द्वारा नामित होने वाली बारह सीटों में भी उन्हें हिस्सा चाहिए।

राजपाटः विषपान

लोकसभा चुनाव के फार्मूले की तर्ज पर कम से कम दो। पांच-जद (एकी) और पांच-भाजपा। पर नीतीश खुद सात सीट चाहते हैं। चिराग को लेनी हो तो वे भाजपा की पांच में से मांगें। नीतीश की शिकायत है कि चिराग हैसियत से ज्यादा पांव पसार रहे हैं। खुद को भाजपा का सहयोगी मानते हैं, जो है भी ठीक। आखिर केंद्र सरकार में उनके पिता मंत्री हैं, जद (एकी) तो शामिल है नहीं सरकार में। झंझट विधानसभा सीटों के बंटवारे को लेकर भी है। तभी तो सूबे के प्रभारी भाजपा महासचिव भूपेंद्र यादव शनिवार को दिल्ली में चिराग से मिले थे और मंगलवार को पटना आकर नीतीश से। प्रेस से तो यही कहा कि सब कुछ सहज और सामान्य तरीके से हो जाएगा। पर इस बार नीतीश चौकस हैं। उनकी कोशिश है कि वे आधी से ज्यादा सीटों पर लड़ें और लोक जनशक्ति पार्टी को भाजपा अपने हिस्से की सीटों में साझीदार बनाए।

चिराग भी पैंतरेबाजी में कम नहीं हैं। सारे विकल्प खुले रहने का बयान सोच-समझकर दबाव की राजनीति के दांव के तौर पर दिया होगा। ऊपर से तेजस्वी यादव ने यह कहकर आग में घी डाल दिया कि चिराग पासवान उनके गठबंधन में आना चाहेंगे तो उनका स्वागत है। नीतीश भाजपा से भी चौकन्ने हैं कि अगर चुनाव में भाजपा के ज्यादा विधायक जीत गए तो फिर यह पार्टी महाराष्टÑ की तर्ज पर बिहार में भी मुख्यमंत्री की कुर्सी पर दावा ठोकने से हिचकेगी नहीं।

सियासी उत्पात
कैलाश विजयवर्गीय बहुआयामी प्रतिभा के धनी हैं। गीत-संगीत में गहरी रुचि है और उनकी भजन गायन मंडली की मध्यप्रदेश में खासी पहचान रही है। पर असली कर्म तो सियासत का ठहरा। जहां रहेंगे, कुछ नया करने की बेचैनी नहीं छोड़ेंगे। पश्चिम बंगाल के प्रभारी के नाते ममता बनर्जी को खूब परेशान करते रहे हैं। सियासी कर्मभूमि मध्यप्रदेश ही है। अरसे तक सूबे की सरकार में मंत्री रहे। नजर मुख्यमंत्री की कुर्सी पर टिकी रहना स्वाभाविक ठहरा। लेकिन आलाकमान ने अपनी टीम में शामिल कर राष्ट्रीय राजनीति का स्वाद चखाया। फिर तो इंदौर की अपनी विधानसभा सीट भी अपने बेटे आकाश को थमा दी। हालांकि सूबे की सियासत में किसी न किसी विवाद में नाम आ ही जाता है।

इंदौर के मेयर रहे हैं और वहां की लंबे समय तक सांसद रहीं सुमित्रा महाजन उनसे सदैव त्रस्त रहीं। उत्तराखंड के पार्टी प्रभारी थे तो त्रिवेंद्र सिंह रावत की नींद उड़ा कर रखते थे। हरीश रावत का एक निजी टीवी चैनल ने उत्तराखंड का मुख्यमंत्री रहते स्टिंग ऑपरेशन किया था तो उसके पीछे भी विजयवर्गीय की भूमिका बताई गई थी। हरीश रावत की सरकार गिराने के मिशन में हालांकि मात खा गए थे। उनकी छत्र-छाया वाले टीवी चैनल मालिक को त्रिवेंद्र सिंह रावत की सरकार में जेल जाना पड़ा था। विजयवर्गीय का वरदहस्त न होता तो यह चैनल मालिक उत्तराखंड छोड़ पश्चिम बंगाल में अचानक सक्रिय कैसे हो जाता। त्रिवेंद्र सिंह रावत ने तो विजयवर्गीय की उत्तराखंड के पार्टी मामलों से छुट्टी हो जाने पर बाकायदा जश्न मनाया था करीबियों के साथ।

प्रस्तुतिः अनिल बंसल

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