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वर्चस्व की जंग

जयललिता के निधन के बाद उनकी सहेली वीके शशिकला पार्टी की सर्वेसर्वा बन गईं।

शशिकला। फाइल फोटो।

तमिलनाडु का प्रमुख विपक्षी दल एआइएडीएमके पिछले कुछ दिनों से जबर्दस्त गुटबाजी और नेताओं की आपसी फूट का शिकार हो गया है। कभी अम्मा यानी जयललिता इस पार्टी की अकेली सिरमौर थी। बेशक पार्टी उनके राजनीतिक गुरु और फिल्मी दुनिया से राजनीति में आए एमजी रामचंद्रन ने बनाई थी। पर रामचंद्रन के निधन के बाद जयललिता ने उनकी पत्नी जानकी रामचंद्रन को चुनावी शिकस्त देकर साबित किया था कि रामचंद्रन की राजनीतिक उत्तराधिकारी जानकी नहीं बल्कि वे हैं।

जयललिता के निधन के बाद उनकी सहेली वीके शशिकला पार्टी की सर्वेसर्वा बन गईं। मुख्यमंत्री की कुर्सी पर उन्होंने जयललिता के पूर्व में भरोसेमंद साबित हो चुके ओ पनीरसेल्वम को बैठाया। बाद में पनीरसेल्वम से विवाद हुआ तो 2017 में उनकी जगह ओ पलानीस्वामी को मुख्यमंत्री बना दिया। शशिकला खुद मुख्यमंत्री बनने की ताक में थीं कि आय से ज्यादा संपत्ति जमा करने के मामले में उन्हें जेल जाना पड़ा।

उनके जेल जाते ही ओ पनीरसेल्वम यानी ओपीएस और ई पलानीस्वामी यानी ईपीएस ने हाथ मिला लिए। ईपीएस मुख्यमंत्री के साथ पार्टी के सहसंयोजक भी बन गए। उप मुख्यमंत्री ओपीएस को पार्टी का संयोजक बना दिया। शशिकला को पार्टी से बाहर कर दिया। यह भी सहमति बनी कि स्थायी महासचिव बतौर सम्मान जयललिता ही रहेंगी।

एकल नेतृत्व के बजाए ओपीएस और ईपीएस का युगल नेतृत्व पार्टी को चलाएगा। लेकिन पिछले साल विधानसभा चुनाव में पार्टी को हार का मुंह देखना पड़ा। 234 सदस्यों की विधानसभा में द्रमुक गठबंधन को 159 और अन्ना द्रमुक-भाजपा गठबंधन को 75 सीटें मिली। उधर शशिकला जेल से तो विधानसभा चुनाव से पहले ही बाहर आ गई थी पर माहौल प्रतिकूल देख उन्होंने खुद को चुनाव से अलग ही रखा।

पार्टी की हार के बाद ओपीएस और ईपीएस खेमों में वर्चस्व की जंग छिड़ गई। राजनीति में कोई किसी का स्थायी सगा नहीं होता। शशिकला ने भी अब ईपीएस की जगह ओपीएस से हाथ मिलाया है। अन्नाद्रमुक की इस गुटबाजी ने नींद भाजपा की उड़ा दी है। अन्नाद्रमुक बिखर गई तो सूबे में किसके कंधे पर सवार होकर अपना प्रभाव बढ़ाएगी भाजपा?

ओहदे की आस

हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर ने बीते दिनों मुख्य सूचना आयुक्त और सूचना आयुक्तों की नियुक्ति को लेकर बैठक बुलाई थी। सेवानिवृत्त अधिकारी एसएस गुलेरिया को सूचना आयुक्त बना दिया गया है। मुख्य सूचना आयुक्त की दौड़ में मुख्य तौर पर दो लोग सबसे आगे हैं। इनमें से एक मुख्यमंत्री के सलाहकार व प्रधान निजी सचिव आर एन बत्ता हैं जबकि दूसरे अधिकारी अतिरिक्त मुख्य सचिव आरडी धीमान हैं।

धीमान दिसंबर में सेवानिवृत्त होने वाले हैं जबकि बत्ता सेवानिवृत्त हो चुके हैं। दोनों ही अधिकारी दिसंबर में सरकारी ओहदों से बाहर हो जाएंगे। ऐसे में दोनों ही अपनी ओर से जोर लगा रहे हैं। सचिवालय में चर्चा है कि सरकार ने धीमान को कुछ काम करने का लक्ष्य दिया है। अगर वह इन लक्ष्यों को पूरा करने में कामयाब हो जाते हैं तो मुख्य सूचना आयुक्त की कुर्सी उनके हवाले हो सकती है। अब चुनावी साल है तो जाहिर है टारगेट भी चुनावी ही होंगे।

लेकिन कहा जा रहा है कि वह मुख्यत: कायदे कानूनों के हिसाब से चलने वाले आइएएस अधिकारी रहे हैं। इन्हीं वजहों से वह एक अरसा पहले चोट भी खा चुके हैं। अब नया मौका मिला है। वह कितना कुछ कर पाते हैं देखना है। दूसरी ओर बत्ता की दलीलें है कि उन्हें शिमला में मकान की जरूरत है। अगर उन्हें कोई ओहदा मिल जाता है तो कुछ और सालों के लिए सरकारी मकान में रहने के हकदार हो जाएंगे। बत्ता का मुख्यमंत्री जयराम के साथ पुराना नाता रहा है। ऐसे में अब सब कुछ मुख्यमंत्री पर है कि वह इन दो में से किस को मुख्य सूचना आयुक्त की कुर्सी पर बिठाते हैं या कोई तीसरा ही बाजी मार ले जाता है।

हार के जिम्मेदार

आजमगढ़ और रामपुर की जीत से उत्तर प्रदेश में भाजपाई बेहद गदगद हैं। भाजपा के नेता लक्ष्मीकांत वाजपेयी ने फरमाया कि भाजपा ने आजमगढ़ ही नहीं आजम के गढ़ को भी फतह किया है। इसमें कोई संदेह कर भी नहीं सकता कि पिछले दो दशक से तो रामपुर वाकई आजम खान का गढ़ बन गया था। इसी तरह आजमगढ़ भी जातीय समीकरण के हिसाब से सपा की सुरक्षित सीट बन गई थी।

लेकिन भाजपा की जीत के श्रेय के असली हकदार भाजपाई नहीं खुद अखिलेश यादव और मायावती हैं। मायावती ने सपा का खेल बिगाड़ने में अहम भूमिका निभाई। आजमगढ़ में मुसलमान उम्मीदवार उतार कर सपा के मुसलमान वोट बैंक में सेंध लगाई तो रामपुर में उम्मीदवार नहीं उतार कर दलित वोट भाजपा के पाले में खिसका दिए। रामपुर में भाजपा ने मुसलमान उम्मीदवार भी जानबूझकर नहीं उतारा। घनश्याम लोधी की मौजूदगी से यहां सांप्रदायिक धु्रवीकरण हुआ। ऊपर से आजम खान ने अपनी पत्नी को नहीं लड़ाया। बची-खुची कसर अखिलेश ने पूरी कर दी, जो चुनाव प्रचार के लिए गए ही नहीं। विधानसभा की हार से पस्त मनोबल ने जैसे उन्हें भाजपा के प्रति समर्पण भाव में ला दिया है।
(संकलन : मृणाल वल्लरी)

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