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राजपाटः खतरे की आहट

दल बदल के बजाए अब तो विधायकों से इस्तीफे दिलाने की नई तरकीब अपनाई जाने लगी है। गुटबाजी से तो राजस्थान की कांग्रेस सरकार भी अछूती नहीं है। पर सियासत में आने से पहले जादूगरी करते रहे गहलोत असंतोष को मध्य प्रदेश की तरह सतह पर नहीं आने दे रहे।

Author Published on: March 14, 2020 3:34 AM
राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत। (एक्सप्रेस आर्काइव फोटोः रोहित जैन पारस)

अनिल बंसल

मध्य प्रदेश में हुई बगावत से राजस्थान में अशोक गहलोत चौकन्ने हुए हैं। भाजपा तो डंके की चोट पर कह रही है कि मध्य प्रदेश के बाद अगला नंबर राजस्थान का है। दोनों सूबों में फर्क बस बहुमत का है। मध्य प्रदेश में कांग्रेस के पास स्पष्ट बहुमत का अभाव है तो राजस्थान में अशोक गहलोत ने बसपा के छह विधायकों को पार्टी में शामिल कर भाजपा की तुलना में ताकत बढ़ा रखी है। पर इन दिनों तख्ता पलट का नया खेल तो किसी को भी पलट सकता है। दल बदल के बजाए अब तो विधायकों से इस्तीफे दिलाने की नई तरकीब अपनाई जाने लगी है। गुटबाजी से तो राजस्थान की कांग्रेस सरकार भी अछूती नहीं है। पर सियासत में आने से पहले जादूगरी करते रहे गहलोत असंतोष को मध्य प्रदेश की तरह सतह पर नहीं आने दे रहे। दूसरे उनके विरोधी सचिन पायलट ज्योतिरादित्य की तरह पैदल भी नहीं हैं। वे सूबे के उपमुख्यमंत्री यानी सरकार में नंबर दो तो हैं ही। भाजपा में जाना भी चाहेंगे तो मुख्यमंत्री की कुर्सी तो मिलने से रही। विधानसभा का बजट सत्र चल रहा है। सत्र में कुछ विधायकों की नाराजगी साफ दिख रही थी। बसपा से आए छह विधायकों के अलावा तेरह निर्दलीय भी गहलोत को राहत दे रहे हैं। यानी 200 के सदन में फिलहाल गहलोत को 118 का समर्थन है। सूबे की तीन राज्यसभा सीटों में से यहां कांग्रेस को दो मिल जाएंगी। भाजपा को एक सीट का घाटा होगा। गहलोत ने फिर पासा फेंका है कि वे जल्दी ही अपने मंत्रिमंडल का विस्तार भी करेंगे और मलाईदार पदों पर नियुक्तियां भी। भाजपा के लिए सूबे में एक बाधा अपनी गुटबाजी भी तो है। वसुंधरा राजे को आलाकमान ने हाशिए पर धकेल रखा है। कांग्रेस की सरकार गिरने की नौबत आई तो मुख्यमंत्री पद का दावा वसुंधरा ही ठोकेंगी। आलाकमान यह शायद ही चाहेगा।

वजूद पर संकट
कांग्रेस के भविष्य को लेकर अब हर तरफ चिंता जताई जा रही है। खासकर मध्य प्रदेश में ज्योतिरादित्य सिंधिया और उनके समर्थकों की बगावत के बाद तो कांग्रेसी भी हताश हुए हैं। पहली बार क्षत्रप इस हद तक स्वछंद आचरण और पार्टी को दबाव में लेने की फितरत दिखा पाए। कमलनाथ और दिग्विजय सिंह की जोड़ी जैसे इस युवा नेता का सियासी करिअर ही खत्म करने पर तुल गई थी। भाजपा ने वही दांव खेला जो सत्ता की सियासत करने वाली कोई भी पार्टी खेलती। गनीमत है कि तुरंत सोनिया गांधी ने कर्नाटक और दिल्ली के सूबेदार नियुक्त कर दिए। कर्नाटक में पार्टी के संकट मोचक डीके शिवकुमार और दिल्ली में युवा गुर्जर नेता अनिल चौधरी पार्टी को गुटबाजी से किस हद तक उबार पाएंगे, यह तो वक्त बताएगा। हालांकि पंजाब में सिद्धू और अमरिंदर सिंह के विवाद पर दस जनपथ अब भी मौन है। उधर कांग्रेस छोड़ने वालों को दूसरे दलों में तरजीह मिलेगी तो वे क्यों न अपना भविष्य संवारेंगे। प्रियंका चतुर्वेदी का उदाहरण सामने है। कांग्रेस की इस मुखर प्रवक्ता ने अपने अपमान से आहत होकर पार्टी छोड़ी थी। मुंबई से नाता है सो शिव सेना में चली गर्इं। अब राज्यसभा का टिकट मिल गया है। भले पार्टी के दूसरे दावेदार वरिष्ठ नेताओं ने इस फैसले पर बागी तेवर दिखाए हैं। असंतोष से तो खैर भाजपा भी कहां अछूती है। यह बात अलग है कि वहां खुलकर बोलने की हिम्मत नहीं फिलहाल किसी की। बिहार में रवींद्र किशोर सिन्हा को राज्यसभा के लिए दोबारा मौका नहीं मिला तो मध्य प्रदेश में भी प्रभात झा को मन मसोस कर रह जाना पड़ा है।

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