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राजनीति: वैश्विक स्वास्थ्य की साझा धरोहर

भारत 2017 में दक्षिण कोरिया स्थित अंतरराष्ट्रीय टीका संस्थान का सदस्य बना था। यह संस्थान कई बड़ी बीमारियों के उपचार के लिए सस्ते दर पर टीके विकसित करने का काम करता है। इसका सदस्य बनने और बने रहने के लिए किसी देश को हर साल इसमें पचास लाख डॉलर का वित्तीय योगदान करना होता है। भारत भी इसी शर्त के साथ इसका सदस्य बना हुआ है। यह भारत की वैश्विक स्वास्थ्य संरक्षण की धारणा को दर्शाता है।

Author Updated: January 21, 2021 5:24 AM
world Healthसांकेतिक फोटो।

विवेक ओझा

हम जिस विश्व में रहते हैं वह एक अन्योन्याश्रित व्यवस्था को धारण किए हुए है, जिसमें दुनिया के देश तमाम मामलों में एक दूसरे पर निर्भर हैं। यह निर्भरता ही राष्ट्रों को साझा सरोकारों, मूल्यों और मानवतावादी सहायता के लिए आधार प्रदान करती है। एक राष्ट्र अपने राष्ट्रीय हितों के ऊपर उठ कर अन्य राष्ट्रों और उनके लोगों के लिए बेहतरी के भाव प्रदर्शित करता है।

ऐसा ही हाल में पश्चिम एशियाई देश जॉर्डन के संदर्भ में देखने को मिला। संयुक्त राष्ट्र के शरणार्थी मामलों के सबसे बड़े संगठन- संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी उच्चायुक्त कार्यालय (यूएनएचसीआर) ने बताया है कि जॉर्डन दुनिया के उन कुछ देशों में पहला देश बन गया है जिसने अपने यहां शरणार्थियों को भी कोविड टीका देना शुरू किया है।

जॉर्डन स्थित इरबिद वैक्सीनेशन क्लीनिक में इराकी शरणार्थी दंपति को कोविड टीका लगाने के साथ ही मानवतावादी सहायता के इतिहास में एक नए अध्याय की शुरुआत हो गई। इराकी दंपत्ति के लिए टीका लगवाने का क्षण उस वक्त एक भावुक पल में बदल गया जब इराकी महिला ने कहा- मैं आशा करती हूं कि जिंदगी अब अधिक सुकून भरी हो पाएगी और मैं अपने बच्चे को खुद को पहले सैनिटाइज किए बगैर चूम सकूंगी।

ऐसे वक्त में जब दुनिया में शरणार्थियों को आंतरिक सुरक्षा के लिए खतरा बताया जा रहा है और कहा जा रहा है कि शरणार्थी राष्ट्रीय संगठित अपराधों को बढ़ावा देने वाले हो सकते हैं और आंतरिक अशांति का कारण बन सकते हैं। ऐसे में भी शरणार्थियों की स्थिति का मानवीय आकलन कर उन्हें मदद देना प्रशंसनीय तो है ही। जॉर्डन ने अपनी जन स्वास्थ्य सेवा के प्रत्येक आयाम में शरणार्थियों को शामिल कर अपने उन्हें अपने टीकाकरण अभियान का हिस्सा बनाया। इसी आधार पर यूएनएचसीआर ने दुनिया के अन्य देशों से अपील की है कि जॉर्डन की तरह वे भी ऐसी ही मिसाल कायम करें।

गौरतलब है कि यूएनएचसीआर अपने कोवैक्स आवंटन सिद्धांत और कोवैक्स फैसिलिटी के तहत दुनिया भर के देशों से अपील कर रहा है कि वे शरणार्थियों, विस्थापितों और आंतरिक रूप से विस्थापितों (आइडीपी) और राज्यविहीन लोगों का अपने राष्ट्रीय टीकाकरण अभियान में समतामूलक समावेशन करें। कोवैक्स फैसिलिटी एक वैश्विक सुविधा है जिसका जोर इस बात पर है कि दुनिया के अल्प और मध्यम आय वाले देशों में सरकारें और कोविड टीका विनिर्माता आपसी सहयोग के जरिए सर्वाधिक जरूरतमंद लोगों तक टीका आपूर्ति सुनिश्चित करें।

यहां यह उल्लेखनीय है कि इस दौर में शरणार्थी, आंतरिक रूप से विस्थापित और राज्यविहीन लोग अकल्पनीय संकटों का सामना कर रहे हैं और ऐसे में अगर दुनिया इनका साथ नहीं देगी तो इनसे दुनिया के हित में काम करने की अपेक्षा कैसे रखी जा सकती है। यूएनएचसीआर का कहना है कि इन सबके लिए साढ़े पैंतालीस करोड़ डॉलर के वित्तीय राशि की जरूरत है।

अगर बात भारत में रहने वाले शरणार्थियों की किया जाए तो अलग ही भारतीय दृष्टिकोण सामने आता है। यूएनएचसीआर के मुताबिक भारत में म्यांमा, अफगानिस्तान और सोमालिया जैसे कई देशों के करीब ढाई लाख शरणार्थी रहते हैं। इनमें से दो लाख से ज्यादा शरणार्थी तो श्रीलंका और तिब्बत से ही हैं। रोहिंग्या शरणार्थियों की संख्या चालीस हजार के आसपास है।

भारत शरणार्थियों की सुरक्षा के मुद्दे को लेकर किसी अंतरराष्ट्रीय या क्षेत्रीय कानून से बंधा नहीं है। भारत ने संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी संधि, 1951 पर न तो हस्ताक्षर किए हैं, न ही उसका समर्थन। दक्षिण एशिया अथवा भारतीय उपमहाद्वीप में भी शरणार्थी सुरक्षा या अधिकार को लेकर क्षेत्रीय विधिक रूपरेखा का अभाव है। इसलिए भारत शरणार्थियों की सुरक्षा के किसी भी प्रकार के दायित्व से बच जाता है।

इस मामले में केंद्र सरकार को पता है कि किसे सुरक्षा देनी है और किसे अपनी असुरक्षा का कारक बता कर राष्ट्रीय सुरक्षा को प्राथमिकता देते हुए चलना है। ऐसे में यहां सवाल उठता है कि क्या भारत में ढाई लाख शरणार्थियों को कोविड महामारी के मद्देनजर मदद करनी चाहिए या नहीं? क्या भारत को अपने यहां रहने वाले शरणार्थियों को जॉर्डन की भांति अपने कोविड टीकाकरण अभियान का हिस्सा नहीं बनाया जाना चाहिए?

भारत अगर संशोधित नागरिकता संशोधन कानून के जरिए पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से 31 दिसंबर 2014 तक धार्मिक उत्पीड़न के चलते भारत आने वाले हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, ईसाई और पारसी समुदाय के लोगों को भारतीय नागरिकता देने पर मानवतावादी दृष्टिकोण से विचार कर सकता है, तो क्या मानवतावादी दृष्टिकोण के आधार पर महामारी के इस दौर में शरणार्थियों को भी स्वास्थ्य सुविधा मुहैया कराने पर विचार नहीं होना चाहिए? सीमित स्तर पर ही सही, ऐसे वर्गों के लिए कुछ उपाय कर दक्षिण एशिया में भारत नए प्रतिमान स्थापित कर सकता है। पारंपरिक रूप से देखें तो भारत का दृष्टिकोण यह रहा है कि वह जेनेरिक दवाओं और टीका के निर्माण में राष्ट्रों से गठजोड़ कर इनकी वैश्विक आपूर्ति को सुनिश्चित करने में अपना योगदान निभाए और वैश्विक संस्थाएं और संयुक्त राष्ट्र इसे शरणार्थियों के हित में प्रयोग में लाए।

कोविड-19 टीका बनाने के प्रयासों में राष्ट्रों के मध्य आई तेजी के साथ जेनेरिक टीका और दवाओं की उपलब्धता का प्रश्न भी महत्त्वपूर्ण हो गया है। एक ऐसे समय में जब विभिन्न राष्ट्रों के नागरिक आर्थिक चुनौतियों का सामना कर रहे हैं तो जेनेरिक टीके की आपूर्ति जरूरी हो जाती है। सवाल उठता है कि भारत जेनेरिक टीके की दिशा में क्या सोच रहा है और उसकी इस दिशा में प्रतिबद्धता कहां तक है।

यहां यह विचारणीय है कि भारत 2017 में दक्षिण कोरिया स्थित अंतरराष्ट्रीय टीका संस्थान का सदस्य बना था। यह संस्थान कई बड़ी बीमारियों के उपचार के लिए सस्ते दर पर टीके विकसित करने का काम करता है। इसका सदस्य बनने और बने रहने के लिए किसी देश को हर साल इसमें पचास लाख डॉलर का वित्तीय योगदान करना होता है। भारत भी इसी शर्त के साथ इसका सदस्य बना हुआ है। यह भारत की वैश्विक स्वास्थ्य संरक्षण की धारणा को दर्शाता है।

टीके विकसित करने के लिए शोध और विकास के लिए अंतरराष्ट्रीय टीका संस्थान की पहल का भारत समर्थन करता है। इसके लिए भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (आइसीएमआर) और इस संस्थान के बीच एमओयू पर हस्ताक्षर किए गए थे। गौरतलब है कि तब चिकित्सा क्षेत्र के विशेषज्ञों ने कहा था कि यह साझेदारी टीकों के विकास की दिशा में अनुसंधान गतिविधियों और प्रशिक्षण कार्यक्रमों के सार्थक गठजोड़ को बढ़ावा देगी और इससे विश्व के निर्धन देशों की टीकों तक पहुंच में सुधार होगा।

साथ ही ऐसी साझेदारी विकसित और विकासशील दोनों ही देशों को वैश्विक स्वास्थ्य सुविधा के बुनियादी ढांचे को मजबूत करेगी। इससे वैश्विक स्तर पर टीकों के विकास, निर्माण और उत्पादन की दिशा में कदम बढ़ेंगे जिसकी आज दुनिया भर के देशों को जरूरत है। भारत के टीका निर्माण उद्योग, प्रतिरक्षण कार्यक्रमों और लोक स्वास्थ्य नीतियों के लिहाज से ऐसा गठजोड़ आवश्यक था और भारत ने इस आवश्यकता की पहचान भी सही समय पर की।

मानव सभ्यता के आधुनिक और समसामयिक रूप को प्राप्त करने के बाद से दुनिया की कई चीजों को संपूर्ण मानवता की साझा धरोहर के रूप में माना गया है। बाह्य अंतरिक्ष, अंटार्कटिका और आर्कटिक को इसका बड़ा उदाहरण माना जा सकता है। इसी तरह वैश्विक स्वास्थ्य भी मानवता की साझा धरोहर के रूप में होना चाहिए, ऐसा भारत का मानना रहा है। भारत ने दुनिया को योग दिया, लेकिन योग पर अपना एकाधिकार कभी प्रदर्शित नहीं किया। कोरोना विषाणु जनित समस्याओं के दौर में वैश्विक स्वास्थ्य को साझा धरोहर के रूप में विकसित करने का समय आ गया है।

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