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प्रदूषण से मुक्ति का हक मांगती दुनिया

बड़े देशों ने वादा किया था कि जलवायु परिवर्तन रोकने के लिए वे सौ अरब डालर का कोष बनाएंगे, लेकिन इस वादे को दस साल हो गए, पूरा नहीं हुआ।

प्रदूषण से मुक्ति का हक मांगती दुनिया
सांकेतिक फोटो।

सुरेश सेठ

जर्मनी ने जोखिम वाले अट्ठावन देशों में जी-20 समूह के तौर पर इसीलिए पर्यावरण प्रदूषण से जूझने के लिए एक वैश्विक कवच की शुरुआत की थी। इसके लिए बीमा और आपदा सुरक्षा वित्त को मजबूत करने पर जोर दिया गया था। मगर इस दिशा में कदम बढ़ते नजर नहीं आ रहे। इस साल जलवायु परिवर्तन का सत्ताईसवां शिखर सम्मेलन मिस्र में हुआ।

इस बार उठे सवालों में कुछ और तीखापन था। विकासशील और गरीब देश अपने ऊपर पर्यावरण प्रदूषण के कारण जो आपात घट रहा है, उसका हर्जाना मांग रहे थे। पर्यावरण कोष बनाने पर सहमति भी बनी। पर्यावरण प्रदूषण ने जलवायु में असाधारण परिवर्तन कर दिए हैं। धारासार बारिश और सूखे की स्थिति एक साथ, एक ही देश के दो हिस्सों में पैदा हो जाती है। बरसात की जगह बादल फटने लगते हैं और भारत जैसे देशों में खेती, जो पहले ही मानसून का जुआ कहलाती थी, और भी अनिश्चित हो गई है।

देश में बीता वर्ष साक्षी है कि इस बार जलवायु में जो असाधारण परिवर्तन हुए, जैसे सावन की विदाई के बावजूद अक्तूबर में धारासार बारिश लौट आई और धान की पैदावार को कम कर दिया, किसानों की जिंदगी बिगाड़ दी। लगता है, अगर पर्यावरण प्रदूषण और ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को खत्म न किया जा सका तो इस सदी के आखिर में यह धरती धधकने लगेगी। इस पर रहना मुश्किल हो जाएगा।

इस नरक से बचने का एक ही समाधान है कि इस दुनिया के सभी देश, वे महाशक्तियां, जिन्होंने ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन किया और अब उसका सामना करने के दायित्व से मुक्त हो जाना चाहती हैं और विकासशील देश, जो आर्थिक असमर्थता के बावजूद इस स्थिति को सहन करने की स्थिति में नहीं हैं, संयुक्त रूप से आगे बढ़ कर अपने सीमित आर्थिक संसाधनों को जोड़ कर इस पर्यावरण प्रदूषण की बढ़ती विकरालता को कम करें।

पिछले दिनों पर्यावरण प्रदूषण की वजह से हर साल की तरह दिल्ली की जिंदगी रुक गई। स्कूल बंद हो गए। धुंध का प्रसार दिल्ली ही नहीं, पूरे उत्तर भारत में फैल गया। लोगों का दम इस प्रकार घुटने लगा कि सुबह की सैर भी गुनाह लगने लगी। ऐसी हालत में इस आसन्न आपात मृत्यु से बचने के लिए एक ही रास्ता रह जाता है कि बिना कोई राजनीति किए, अपना दायित्व दूसरे पर धकेलने की चेष्टा किए बगैर पर्यावरण प्रदूषण का मुकाबला किया जाए, नहीं तो जैसा कि संयुक्त राष्ट्र प्रमुख ने जलवायु परिवर्तन शिखर सम्मेलन में चेतावनी दी है, हम नरक के हाईवे पर बढ़ रहे हैं। भारत सहित सभी देश इसको खत्म करने के लिए सहयोग करें या मरें।

दुनिया में सबसे ज्यादा प्रदूषण फैलाने वाले चीन और अमेरिका से भी कहा जा रहा है कि वे कार्बन उत्सर्जन में कमी लाएं और सबके साथ मिलकर मानवता को नष्ट होने से बचाएं। भारत में पर्यावरण प्रदूषण ने ऐसे गुल खिलाए हैं कि हमारी फसलों की गुणवत्ता कम हो रही है। इस साल के शुरू में जब गेहूं पका तो असाधारण, अकल्पनीय जलवायु परिवर्तन ने दाने को इस प्रकार जीरे के दाने जितना कम कर दिया कि उसकी नियमित खरीद ही संकट में पड़ गई।

जब धान कट रहा था, तो उसमें भी धारासार बारिश से असाधारण नमी पैदा होने लगी, जो उसकी गुणवत्ता को कम घोषित करके उसकी नियमित खरीद संकट में डालेगी। यह वह चुनौती है जिसका सामना करने का भारत सरकार ने पूरा मन बना लिया है। इसके लिए वह अपने सीमित साधनों के साथ जल्दी से जल्दी ग्रीन हाऊस गैसों के उत्सर्जन से लेकर पर्यावरण प्रदूषण के शून्य स्तर तक पहुंच जाना चाहती है।

गौरतलब है कि दुनिया में ग्रीनहाउस गैसों के उत्सजर्न से धरती को धधका कर तबाही की तरफ ले जाने वाले देशों की सूची में सबसे ऊपर चीन है, जो पंद्रह गीगाटन का उत्सर्जन करता है। चीन अकेला भारत, अमेरिका और यूरोपीय संघ के सताईस देशों से ज्यादा उत्सर्जन करता है। इसलिए चीन क्या धरती को एक धधकते हुए नरक की ओर ले जाने का खलनायक भी बनेगा? भारत भी बेगुनाह नहीं, वह साढ़े तीन गीगाटन गैस उत्सर्जन करता है और तीसरे स्थान पर है।

चाहे भारत के बचाव में कहा जा सकता है कि हमारा देश आबादी अधिक होने से प्रति व्यक्ति केवल 2.4 टन उत्सर्जन करता है, जबकि दुनिया का औसत उत्सर्जन 6.3 टन प्रति व्यक्ति है। अमेरिका भी बड़ा गुनहगार है, क्योंकि वहां पंद्रह टन प्रति व्यक्ति औसत उत्सर्जन होता है, जो दुनिया में सबसे अधिक है। इसके बाद चीन और रूस आते हैं। तो क्या इन बड़े देशों पर यह दायित्व नहीं कि वे इस गैस उत्सर्जन को शून्य तक लेकर आएं?

संकट कम नहीं है। यूएनईपी की गैस उत्सर्जन रिपोर्ट बताती है कि अगर ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन यों ही होता रहा तो इस सदी के आखिरी साल या 2100 में धरती का तापमान 2.8 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ जाएगा, जबकि यह 1.50 डिग्री से ज्यादा नहीं बढ़ना चाहिए, नहीं तो यह धरती रहने के काबिल नहीं रह जाएगी। इस समय भी जो जलवायु का स्तर हमारे सामने है, उसने इस तरह के अनिश्चित परिवर्तन कर दिए हैं कि आम लोगों का जीना दूभर हो गया है। गर्मी के दिनों में भयानक सर्दी पड़ती है।

सर्दी के दिनों में गर्मी हो जाती है। बारिश के दिनों में बारिश नहीं होती और जब बारिश का मौसम बीतता है तो धारासार बारिश होती है। कैसे रोकेंगे इसे? बड़े देशों ने वादा किया था कि जलवायु परिवर्तन रोकने के लिए वे सौ अरब डालर का कोष बनाएंगे, लेकिन इस वादे को दस साल हो गए, पूरा नहीं हुआ। जर्मनी ने जोखिम वाले अट्ठावन देशों में जी-20 समूह के तौर पर इसीलिए पर्यावरण प्रदूषण से जूझने के लिए एक वैश्विक कवच की शुरुआत की थी। इसके लिए बीमा और आपदा सुरक्षा वित्त को मजबूत करने पर जोर दिया गया था। मगर इस दिशा में कदम बढ़ते नजर नहीं आ रहे।

इसके साथ ही एक और बहस चल रही है कि कच्चे तेल का उत्पादन, जिसे जीवाश्म र्इंधन कहा जाता है, की अप्रसार संधि भी कर दी जाए, लेकिन वैकल्पिक ऊर्जा के उत्पादन और आपूर्ति में विफल रहने वाली यह दुनिया और उसमें सबसे आगे भारत, जो पचासी फीसद कच्चे तेल का आयात स्वयं करता है, इस संधि के लिए कैसे सहमत हो सकता है? तो पर्यावरण प्रदूषण से बचने का मार्ग यही है कि 2040 तक हर हाल में कोयले का इस्तेमाल खत्म कर दिया जाए।

अगर इस सम्मेलन से उठती पर्यावरण प्रदूषण को खत्म करने की आवाज नाकाम रह जाती है और वैश्विक कवच सामने नहीं आएगा, तो जलवायु परिवर्तन और पर्यावरण प्रदूषण से पैदा होने वाले नरक से बचा नहीं जा सकेगा। यह संभावना परेशान करती है। इस प्रदूषण ने तो जरूरत से ज्यादा धधकती हुई धरती और अनिश्चित जलवायु परिवर्तन के साथ ऐसी घुटन, धुंध और अस्वस्थ जलवायु परिवर्तन पैदा कर दिया है कि भारत में औसत आयु बढ़ने के बजाय घट रही है। जो नौनिहाल हमारी धरती पर जन्म ले रहे हैं, वे कुपोषित और नाटे हैं। इसीलिए आने वाली बीमारियों का सही ढंग से मुकाबला नहीं कर पाते।

अगर पर्यावरण प्रदूषण जलवायु में इसी प्रकार अनिश्चित और प्रलयंकर परिवर्तन लाता रहेगा, तो बाद में जीवन का कोई अर्थ नहीं रहेगा। प्रेम गीतों का कोई अर्थ नहीं रहेगा। जिंदगी से रोमांस गायब हो जाएगा। उसकी जगह चली आएगी एक अजब धुकधुकी, जो किसी भी समय इस अप्रत्याशित मौत से सहमी रहेगी। इस सहम से बचने के लिए जिंदगी को सहज ढंग से जीने के लिए आवश्यक है कि पर्यावरण प्रदूषण से जूझने की इस चुनौती का मुकाबला दृढ़ता के साथ किया जाए।

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First published on: 23-11-2022 at 03:59:24 am
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