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विषमता की रूढ़ियां

मनुस्मृति व कुछ पौराणिक ग्रंथों में स्पष्ट रूप से महिलाओं को दोयम दर्जे का बताया गया है; उन पर विभिन्न रूपों में जुल्म व शोषण को उचित ठहराया गया है।

Author नई दिल्ली | April 19, 2016 2:23 AM
चित्र का इस्तेमाल सिर्फ प्रतीक के तौर पर किया गया है।

दुनिया विज्ञान व तकनीकी के क्षेत्र में काफी आगे निचल चुकी है और उसी के साथ हमारे देश ने भी काफी प्रगति की है। रेडियो क्या, अब तो टेलीविजन घर-घर दिखता है और मोबाइल तो हर वर्ग के लोगों के पास रोजमर्रा के संवाद तथा संपर्क का माध्यम बन चुका है। तकनीकी के निरंतर बढ़ते इस्तेमाल व सूचना क्रांति ने जैसे विश्व की सारी दूरियां मिटा दी हैं। इसी उपलब्धि को अक्सर ग्लोबल विलेज या वैश्विक ग्राम के मुहावरे में अभिव्यक्त किया जाता है। मगर अफसोस, जहां विज्ञान व तकनीकी ने सुविधाओं के लिहाज से जीवन को सरल बना दिया है, वहीं दूसरी ओर, अंधविश्वास आज भी विभिन्न रूपों में समाज में अपनी जड़ें जमाए हुए है। यह आज हमारे समाज का सबसे बड़ा अंतर्विरोध है। ऐसा घोर सामाजिक विरोधाभास शायद ही पहले कभी रहा हो। सवाल है कि अंधविश्वास की जकड़न से मुक्ति कैसे मिले।

शिक्षा हमें अज्ञान से बाहर निकलने की राह दिखाती है। जीवन को भटकने से बचाती है, दिशा देती है। इस तरह शिक्षा समाज को बदलने और उसे बेहतर बनाने की भूमिका निभाती है। सवाल है कि शिक्षा के प्रसार से यह उम्मीद कहां तक पूरी हुई है। हां बदला है समाज। पर अब भी बहुत सारी कमियां हैं। लोग शिक्षित तो होते जा रहे हैं, मगर जो शिक्षा दी जा रही है वह ज्ञान-विज्ञान, तार्किकता व मानवता की कम, तथाकथित धर्म की अधिक है। आस्तिकता या आस्था में कोई हर्ज नहीं, अगर वह स्वाभाविक व तार्किक लगे। नहीं तो आस्था जड़ता में बदल जाती है।

सामाजिक मापदंडों व मूल्य-व्यवस्थाओं को बनाए रखने के लिए लगभग हर धर्म के अपने अपने मानक ग्रंथ हैं। उनके धर्मावलंबी उनमें लिखी बातों पर भरोसा करते हैं। पूजा-पाठ से लेकर व्यक्ति के अधिकार क्षेत्र व जीवन कैसे जीना चाहिए, जैसी बातें भी इन पुस्तकों में शामिल हैं। ध्यान देने योग्य बात यह भी है कि इन पुस्तकों में कुछ परस्पर विरोधी व अतार्किक बातें भी मिलती हैं। इनमें से एक यह है कि करीब-करीब हर धर्म में महिलाओं को पुरुषों से कम आंका गया है।

मनुस्मृति व कुछ पौराणिक ग्रंथों में स्पष्ट रूप से महिलाओं को दोयम दर्जे का बताया गया है; उन पर विभिन्न रूपों में जुल्म व शोषण को उचित ठहराया गया है। बात अगर इतनी ही होती तो इसे इतिहास या अतीत के खाते में डाल कर हम छुट्टी पा लेते। मगर अफसोस इस बात का है कि आधुनिक काल में भी महिला के प्रति असमानता व अतार्किक सोच, जिसे अंधविश्वास कह सकते हैं, विभिन्न रूपों में जिंदा हैं। हालांकि अंधविश्वास कई रूपों में समाज को नुकसान पहुंचा रहा है, मगर अंधविश्वास का सबसे अधिक शिकार शायद महिलाओं को ही बनाया गया है। इस वजह से भी उनकी प्रगति धीमी है। अलबत्ता बहुत सारी महिलाओं ने अपनी क्षमताएं साबित करके दिखा दिया है कि अगर अवसर मिले तो वे पुरुष से कम नहीं। इसके बावजूद कन्याभ्रूण हत्या, बालिका पर जुल्म व स्त्री को दोयम माने जाने की सोच जारी है।

विचारणीय यह भी है कि रीति-रीवाज के नाम पर महिलाओं के खिलाफ यह तंत्र इस तरह से कायम है कि अनपढ़ ही नहीं, कई पढ़े-लिखे लोग व विज्ञान तक के जानकार पुरूष उसमें शामिल देखे जाते हैं। ऐसा क्यों? मुझे तो लगता है कि पुरूषवादी समाज इस दिखावे का नाटक जान-बूझ कर करता है, ताकि महिलाएं पढ़-लिख कर भी मूर्ख बनी रहें और अपना वर्चस्व कायम रखने का लाभ पुरुषवादी समाज को मिलता रहे।

वजह चाहे जो हो, पर यह सच है कि कुछ प्रमुख अंधविश्वास या कुछ खास तरह की कुरीतियां महिलाओं के ऊपर थोपी गई हैं; इनका पालन करना उनके लिए जरूरी बताया गया है। जैसे, शादीशुदा स्त्री सिंदूर नहीं लगाएगी, चूड़ी नहीं पहनेगी तो पति मर जाएगा या उसकी आयु कम हो जाएगी, मानो कि सिंदूर लगाने वाली महिला का पति अजर-अमर हो जाता हो। जबकि इसके द्वारा शादीशुदा महिला की आजादी छीनने की कोशिश है ताकि इस सिंदूर व चूड़ी के साथ दूर से ही वह शादीशुदा के रूप में पहचानी जाए।

ऐसी निशानियों को अंधविश्वास से जोड़ दिया गया है ताकि कोई महिला इन बंधनों से आजाद होने की कोशिश न करे। जबकि सिंदूर या किसी भी रासायनिक तत्त्व का नियमित इस्तेमाल शायद शरीर व बालों के लिए ठीक नहीं। चूड़ी तो बजाप्ता शीशा है जो शरीर के लिए काफी खतरनाक है, मगर जानबूझकर इसे बनाया गया है ताकि शादीशुदा महिला की पहचान हो सके व उसके आने की आहट भी चूड़ियों व पायल की झनकार के साथ जानी जा सके। उसे हमेशा बंधनों के दायरे में रख कर स्वतंत्र जीवन जीने न दिया जाए।

विचारणीय यह भी है कि अगर ये रीति-रिवाज इतने ही जरूरी होते तो शादीशुदा पुरुष के लिए भी कुछ होते। मगर नहीं, शादीशुदा पुरुष बिना पहचान के रहते हैं, बल्कि इस रीति-रीवाज का अंधा अनुसरण महिला करे, इसकी बड़ी कोशिश उनकी रहती है। एक बार सिंदूर के उपयोग के विरोध पर चर्चा के दौरान कुछ पुरुषों ने कहा कि सिंदूर की कीमत मैं नहीं जानती। सोचने वाली बात है कि अगर सिंदूर की कीमत पुरुष महाशय ही जानते हैं तो वे खुद क्यों नहीं इस्तेमाल करते, सिर्फ महिला ही क्यों। मतलब साफ है, इस बहाने महिलाओं को दकियानूसी बनाए रखने की कोशिश है।

अन्य रिवाजों के अंतर्गत शादी में कराए जाने वाले ‘कन्यादान’ से भी मुझे आपत्ति है, इस शब्द से भी और इसकी विधि से भी। जबकि जोर-शोर से इसकी महत्ता बताई जाती है व इसे धर्म तथा स्वर्ग से जोड़ा जाता है। सोचने वाली बात है कि जब बेटा-बेटी दोनों ही मां-बाप की संतान, तो बेटी को दान किया ही क्यों जाय? क्या लड़की इंसान नहीं है? क्यों शादी के बाद उसकी जिम्मेवारी मां-बाप की खत्म मान ली जाए? अगर शादी के बाद जिम्मेवारी खत्म होने की बात है, तो बेटा का भी वर-दान क्यों न हो?

चाहे महिला कामकाजी हो या घरेलू, मगर भोजन, कपड़े या बच्चों से जुड़े सारे काम वही करेगी। जैसे पुरुष की इस सब में कोई जिम्मेवारी नहीं। पति की यौन कामना की पूर्ति उसे करनी ही है, चाहे समय या मूड हो या न हो। अगर पति की कामना पूरी नहीं करेगी तो उसे पाप लग जाएगा या उसका दिन खराब हो जाएगा। जैसे पुरुष को अपने सामर्थ्य या कायल कर पाने की अपनी शक्ति पर भरोसा न हो, इसलिए यहां भी वह अंधविश्वास का सहारा लेता है।

धर्म व निष्ठा से जोड़ते हुए यह भी एक अंधविश्वास है कि महिला पति-पुत्र के लिए व्रत-त्योहार नहीं करेगी तो उसका भला नहीं होगा। यह कुरीति भी जोर-शोर से चालू है। अगर पुरुष के लिए स्त्री व्रत रखती है, तो स्त्री के लिए पुरुष व्रत क्यों नहीं रखता? अपनी श्रेष्ठता या वर्चस्व थोपने की पुरुष की फितरत का कोई अंत नहीं। महिला के मन में धार्मिक जड़ता कूट-कूट कर डाल दी गई है ताकि ईश्वर से वह पुरुष के हित की कामना करे। जैसे खुद पर भरोसा न हो पुरुष को। वह महिला के जरिये भी अपने लिए पूजा करवाना चाहता हो।

श्राद्ध बेटा ही करे या वंश बेटे से ही चलेगा, यह पुरुषवादी सोच भी महिला की स्थिति को और दोयम बनाने में प्रमुख भूमिका निभा रही है। शायद बेटे को अनिवार्य बताने वाली इस सोच की वजह से प्राय: लड़की को मां-बाप की संपत्ति में हिस्सा नहीं दिया जाता। फलस्वरूप दहेज प्रथा कायम है। दहेज प्रथा के खिलाफ समय-समय पर छिटपुट तरीके से पहल होती है। स्थानीय स्तर पर कुछ समय के लिए इसका असर दिखता होगा। मगर ऐसी पहल दूर तक असर नहीं डाल पाती, न लंबे समय तक कायम रह पाती है, क्योंकि दहेज की जड़ में जो चीज है उसे मिटाने की कोई कोशिश नहीं की जाती।

पता नहीं ऐसे कितने अंधविश्वास महिलाओं के अंदर पुरुषों ने भर रखे हैं ताकि वे तार्किक न बनें और इस झोल में पड़ कर अपना तन-मन व दिमाग पुरुषों के लिए इस्तेमाल करती रहें; कमजोर तथा गुलाम बनी रहें। अफसोस कि अधिकतर महिलाएं इस सोच की शिकार हैं। अधिकतर महिलाओं का पुरुषवादी सोच और इस सोच को बल देने के लिए बनाए गए रिवाजों का अनुसरण करना, पुरुषों के इशारे पर जीना इसी बात का सबूत हैं।

हालांकि भारतीय संविधान बनने के बाद व बाबा साहेब द्वारा उसमें दिए लैंगिक समानता के सिद्धांत ने रास्ता कुछ आसान कर दिया। महिलाओं को शिक्षा सहित विभिन्न क्षेत्रों में आगे बढ़ने का अवसर मिला व फलस्वरूप अंधविश्वास के बंधन जरा ढीले हुए। मगर समाज में अब भी बहुत-सी कुप्रथाएं जारी हैं और इस मोर्चे पर बहुत कुछ करने की जरूरत है। हाल ही में एक महिला समाजिक कार्यकर्ता ने कहा कि कानून कितना भी महिला हितैषी हो, जब तक उसका लाभ लेना महिला को खुद नहीं आएगा, उसकी निर्बलता कैसे दूर होगी?

हां, महिलाओं को अपनी लड़ाई खुद लड़नी पड़ेगी। उन्हें शैक्षिक, आर्थिक, मानसिक हर लिहाज से सशक्त होना होगा। गलत के विरोध व सही के समर्थन में खड़ा होना पड़ेगा। जो भी धर्मग्रंथ, परंपरा, रीति-रीवाज महिलाओं को कमजोर बताए, उसे मानने से इनकार करना पड़ेगा। हर जड़तापूर्ण व कमजोर बनाने वाली सोच से उबरने की कोशिश करनी पड़ेगी। तभी महिलाएं अपनी खुशी के लिए सोच पाएंगी; तार्किक और प्रगतिशील बन पाएंगी।

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