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राजनीतिः सार्वजनिक दायरे में स्त्री

कल्पना करें कि अगर हमारे समाज में, चाहे वह शहर हो या गांव हो या कस्बा, यौन हिंसा का भय न हो तो कितना निर्भय होकर लड़कियां सार्वजनिक स्थानों पर घूम-फिर सकेंगी और और कितने सारे कामों को अंजाम दे पाएंगी। आखिर क्यों निरंतर भय के वातावरण में उनकी आवाजाही हो रही है? यह अघोषित कर्फ्यू कब समाप्त होगा?

Women, public realm, jansatta article, jansatta opinionपाकिस्तानी महिलाओं की एक फाइल फोटो

पाकिस्तान की एक खबर सोशल मीडिया पर भी छाई रही, जब पिछले दिनों लाहौर और कराची की लड़कियों ने सड़कों पर अपनी साइकिल रैली निकाली। रैली में साइकिलों पर लगे पोस्टरों पर नारे लिखे गए थे ‘साइकिल चलाओ, औरतों को हक दिलाओ/ पितृसत्ता दबाओ’। ‘हमारा शहर, हमारी सड़कें’। इस रैली का आयोजन ‘गर्ल्स ऐट ढाबाज’ अर्थात ढाबे पर लड़कियां और ‘क्रिटिकल मास’ की तरफ से किया गया था, जिसका मकसद था सड़कों पर लड़कियों को आए दिन जो प्रताड़ना झेलनी पड़ती है उसका विरोध करना।

दरअसल, कुछ वक्त पहले क्रिटिकल मास की सदस्या अनीका अली जब अपने अन्य साथियों से मिलने साइकिल से जा रही थीं तब कार में बैठे लड़कों ने उन्हें घेरा था और उनकी साइकिल को पीछे से टक्कर मारी थी। अनीका ने सोशल मीडिया पर यह बात साझा की, जिसके बाद महिलाओं की तरफ से इस कार्यक्रम की योजना बनी।

गलियों, सड़कों, चौराहों पर अपना हक जताने की सरहद पार की लड़कियों/महिलाओं की कोशिश ने बरबस डेढ़ दशक पहले की एक याद ताजा कर दी, जब इलाहाबाद की लल्ला चुंगी नामक नुक्कड़ पर जहां शाम और रात तो क्या दिन में भी लड़कियां अकेले जाने से कतराती थीं, जो एक तरह से शहर के आवारा लड़कों के जमावड़े की जगह थी, जो विश्वविद्यालय के कॉलेज में पढ़ते थे- रात के करीब ग्यारह-बारह बजे हम पच्चीस- तीस महिलाओं-लड़कियों ने बैठ कर चाय पी थी और उसके बाद यह समूह इलाहाबाद के संगम पर चला गया था, जहां से लौटते हुए हमें लगभग दो बजे थे।

मालूम हो कि लल्ला चुंगी के पास ही लड़कियों का होस्टल था और उनकी भी हसरत रहती कि कभी वहां बैठ कर चाय पीएं और गप लड़ाएं। निश्चित ही यह अकेले होना नहीं था। उस वक्त स्त्री मुक्ति संगठन का एक शिविर वहीं चल रहा था। दिन में इस बात पर चर्चा चली थी कि महिलाओं पर लादे गए कर्फ्यू किस किस्म के होते हैं, किस तरह पहनावों के माध्यम से, शहर की अवरचना के माध्यम से उनकी गतिशीलता को नियंत्रित करने की कोशिश होती है। बातचीत समाप्त होते वक्त यह तय हुआ कि आज हम सभी इस अघोषित कर्फ्यू को, जो महिलाओं पर बारहो महीने लगा रहता है, अपने दम पर तोड़ेंगे। और सभी लल्ला की चुंगी पहुंच गर्इं। चाय खत्म होते-होते छात्रावासों की लड़कियों की तरफ से प्रस्ताव आया कि अभी वापस न जाकर संगम पर चला जाए, और यह समूह- जिसमें लगभग साठ की उम्र की महिलाओं से लेकर अठारह-उन्नीस साल की किशोरियां तक थीं- हौले-हौले वहां पहुंच गया था।

कुछ साल पहले दिल्ली विश्वविद्यालय में यौन प्रताड़ना के खिलाफ चली मुहिम के दौरान इस अभियान के एक अहम हिस्से के तौर पर हम लोगों ने आवाह्न किया था कि शाम के वक्त जब अंधेरा होने को हो, तो लड़कियां और हमदर्द लड़के एकत्र होकर अलग-अलग इलाकों में सम्मिलित तरीके से जाएंगे और सार्वजनिक दायरे पर अपने हक को दोहराएंगे। इस कार्यक्रम को लेकर लड़कियों की स्वत:स्फूर्त अच्छी प्रतिक्रिया रही।
कल्पना करें कि अगर हमारे समाज में, चाहे वह शहर हो या गांव हो या कस्बा, यदि यौन हिंसा का भय न हो तो कितना निर्भय होकर लड़कियां सार्वजनिक स्थानों पर घूम-फिर सकेंगी और अपनी पढ़ाई-लिखाई, रात में साइंस लैब में प्रैक्टिकल, लाइब्रेरी में तैयारी और कितने सारे दूसरे कामों को अंजाम दे पाएंगी। वे बड़े शहरों में स्थित बहुराष्ट्रीय कंपनियों के कार्यालयों में या कॉल सेंटरों में रात में काम करने लगी हैं, मगर उन्हें कैब से घर आना होता है और अपहरण, बलात्कार आदि की खबरें पढ़ कर रोजाना की इस सफर के दौरान वे खौफजदा रहती हैं। आखिर क्यों निरंतर भय के वातावरण में उनकी आवाजाही हो रही है? यह अघोषित कर्फ्यू कब समाप्त होगा?

इस अघोषित कर्फ्यू के बहाने सत्तर के दशक की एक घटना को याद किया जा सकता है। सत्तर के दशक की शुरुआत में इजरायल की प्रधानमंत्री गोल्डा मायर के मंत्रिमंडल में स्त्रियों के खिलाफ हिंसा को लेकर विचार-विमर्श चल रहा था। मंत्रिमंडल के पुरुष सदस्यों में से किसी ने यह प्रस्ताव रखा कि ऐसी घटनाओं से बचने के लिए अंधेरा होने के बाद महिलाओं को अकेले घर से बाहर न जाने के लिए कहा जाए। गोल्डा मायर ने इस विचार का प्रतिवाद किया तथा कहा कि हमला महिला पर होता है और पुरुष हमला करता है, इसलिए बेहतर हो कि पुरुषों के रात में घर से बाहर निकलने पर पाबंदी लगाई जाए। हालांकि बात वहीं रह गई, लेकिन मुद््दे को समझने के लिए यह प्रतिक्रिया बिल्कुल सटीक थी, यानी हिंसा रोकने के लिए जो कदम उठाए जाएं वे पीड़ित को ही सजा देने वाले नहीं होने चाहिए।

वैसे महिलाओं पर होने वाली हिंसा को रोकने में नाकाम हमारे समाज में ऐसे नुस्खे पेश किए जाते हैं जो महिलाओं पर नई बंदिशें लगाने वाले होते हैं- उनकी गतिशीलता, उनके पहनावे को नियंत्रित करने वाले होते हैं। महिलाओं को खुद को कैसे ढंकना चाहिए तथा अंधेरा होने पर घर से बाहर नहीं निकलना चाहिए जैसी सलाहें दी जाती है। मसलन, एक बार एक फतवे में यह भी कहा गया कि मुसलिम महिलाओं को अपने नकाब से खुली आंखों से नहीं देखना चाहिए बल्कि सामने बनी जाली से देखना चाहिए ताकि उनका चेहरा न दिखे। दलील दी गई कि उनकी सुंदर आंखें देख पुरुषों का मन बहक जाता है। अलीगढ़ मुसलिम विश्वविद्यालय के पुस्तकालय में यह नियम लंबे समय से था कि छात्राएं वहां बैठ कर पढ़ नहीं सकतीं क्योंकि इससे छात्रों का ध्यान पढ़ाई में नहीं लगता है।

बाहर की असुरक्षा का सामना करने के लिए कैसे पीड़ित को ही सजा दी जाती है इसके अनेक उदाहरण हमारे समाज में मौजूद हैं। आजकल शौचालय पर खूब चर्चा हो रही है। शहर में कोई भी घूम कर इस तथ्य से रूबरू हो सकता है कि महिला शौचालयों पर अक्सर ताले लटके होते हैं और इसका कारण भी यही बताया जाता है कि वहां असामाजिक तत्त्वों के घुसने तथा महिलाओं को निशाना बनाए जाने का खतरा होता है। नगर निगम के शौचालय वैसे ही महिलाओं के लिए कम होते हैं और जो होते हैं वे भी चलती हालत में नहीं होते। जब शीला दीक्षित दिल्ली की मुख्यमंत्री थीं तब किसी पत्रकार का ध्यान सचिवालय के महिला शौचालयों पर गया और उसने पूछा कि शाम छह बजे तक यहां के शौचालय क्यों बंद हो जाते हैं, जबकि महिलाएं वहां देर रात तक काम करती हैं। वहां भी असुरक्षा व असामाजिक तत्त्वों की तरफ से खतरे जैसी बातें बताई गई थीं।

कई अस्पतालों तथा अन्य सार्वजनिक स्थानों में भी ऐसी स्थिति अक्सर देखने को मिलती है, लेकिन रोज महिलाएं कहां कितनी शिकायत करती फिरें। इसी तरह रात की पाली में काम पर जाना हो तो आतंक के माहौल में जाना होता है और यही सलाह घर-परिवार तथा कंपनी मालिकों से मिलती है कि सुरक्षा कारणों से महिलाओं से रात में काम नहीं कराया जाता है। यों तो हर श्रमिक को रात में आराम मिले तो अच्छा है, लेकिन काम करना ही पड़े तो महिलाओं को यह ‘छूट’ सिर्फ सुरक्षा कारणों से मिले जिसके लिए वे जिम्मेदार नहीं हैं तो यह गलत है।
इस स्थिति को बदलने की जरूरत है ताकि महिलाएं बेरोकटोक किसी भी समय कहीं भी आ-जा सकें। अभी पिछले साल कोलंबिया के शहर बुकारामांगा के मेयर ने इस मसले पर लोगों में जागरूकता पैदा करने के लिए एक नायाब प्रयोग किया। रात में पुरुषों के लिए ‘कर्फ्यू’ लगा दिया गया, पुरुषों को घर से बाहर निकलने पर स्थानीय प्रशासन द्वारा प्रतिबंध लगाया गया।

यह अनोखा प्रस्ताव यौन हिंसा के खिलाफ चलाए जा रहे अभियान का हिस्सा था। साठ हजार की आबादी वाले बुकारामांगा में यौन हिंसा की घटनाओं में बढ़ोतरी दर्ज की गई थी। राज्य के गवर्नर के कार्यालय ने मुद््दे के प्रति जागरूकता बढ़ाने के उद््देश्य से एक रात सिर्फ महिलाओं के लिए घोषित की। इस समय यदि किसी पुरुष को अपने जरूरी काम से सड़क पर निकलना हुआ तो उसे मेयर से विशेष अनुमति लेने के लिए कहा गया था। सभी दुकानदारों, क्लबों आदि से अपील की गई कि वे महिलाओं के लिए विशेष कार्यक्रमों का आयोजन करें तथा इसके लिए उन्हें प्रोत्साहन राशि भी दी जाएगी। यदि पुरुष बिना अनुमति के सड़क पर आए तो उसे जुर्माना देने के लिए कहा गया था। निश्चित ही यह एक प्रतीकात्मक कार्रवाई थी।

यह कोई पहली दफा नहीं था कि कोलंबिया में पुरुषों के लिए रात का कर्फ्यू लगाया गया हो। वर्ष 2001 में कोलंबिया की राजधानी बोगोटा में- जिसकी आबादी सत्तर लाख के करीब है- तत्कालीन मेयर मोकस की पहल पर ‘पुरुषों के बिना रात’ का प्रस्ताव रखा गया और उस पर अमल किया गया। उस रात सिर्फ महिलाओं के कन्सर्ट हुए, पार्कों में सिर्फ महिलाओं ने पार्टियां आयोजित कीं; फायर स्टेशनों और पुलिस स्टेशनों पर सिर्फ महिला कर्मचारी दिखाई दीं। लगभग पचास लाख महिलाओं ने उस रात के आयोजन में हिस्सेदारी की। दरअसल, उसके पहले पांच सालों में पुरुषों के हाथों साढ़े अठारह हजार महिलाएं मारी गई थीं और मेयर अनतानास मोकस को लगा कि कोलंबियाई पुरुषों को सुधार का पाठ पढ़ाना जरूरी है।

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