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राजनीतिः पश्चिम का स्त्रीवाची चेहरा

यूरोपीय संघ में राजनीति के क्षेत्र में महिला नेत्रियों की सूची में पोलैंड और जर्मनी के बाद ब्रिटेन का नाम भी जुड़ गया है। स्त्रियों को आगे बढ़ने से जो कांच की दीवार रोके हुए थी वह अब ध्वस्त हो चुकी है या विश्व इस प्रकार भयावह स्थिति में पहुंच चुका है कि उससे प्रभावित राष्ट्र महसूस करने लगे हैं कि स्थिति को संभालने के लिए किसी महिला की आवश्यकता है।

महेंद्र राजा जैन

ब्रिटेन में महत्त्वपूर्ण राजनीतिक पदों पर किसी महिला का होना इस प्रकार असामान्य बात है कि वहां की पहली महिला प्रधानमंत्री मारग्रेट थैचर अब भी आदर्श मानी जाती हैं। इस समय यूरोपीय राजनीतिक क्षेत्रों में चर्चा इस बात को लेकर है कि राजनीति में पुरुषों ने अभी तक जो ‘घालमेल’ कर रखा है, उसकी सफाई के लिए स्त्रियां आगे आ रही हैं। एंजेला मर्केल ऐसे समय जर्मनी की चांसलर बनीं, जब उनकी पार्टी ‘फंडिंग स्केंडल’ में बुरी तरह फंसी हुई थी। स्कॉटलैंड की प्रथम मंत्री निकोला स्तार्जिओन के साथ ही अन्य स्कॉटिश राजनेता भी मानते हैं कि मतदाताओं तक पहुंचने में पुरुषों की अपेक्षा स्त्रियां अधिक सफल रही हैं। कोई आश्चर्य नहीं कि यही स्थिति रही तो निकट भविष्य में ब्रिटेन की लेबर पार्टी की मुखिया भी कोई महिला ही हो।

कहा जा रहा है कि अगर कभी जेरेमी कोर्बिन का नाम ब्रिटेन की लेबर पार्टी के नेता की दौड़ से पीछे हटा, तो उनका स्थान एक महिला- एंजेला ईगल लेंगी। निश्चय ही ब्रिटेन और दुनिया भर की महिला राजनेताओं के लिए यह विशिष्ट और उत्कृष्ट उल्लेखनीय अवसर है। निकोला स्तार्जिओन ही नहीं, स्कॉटलैंड में टोरी और लेबर पार्टी की नेत्रियों के साथ ही उत्तरी आयरलैंड की मंत्री और प्लेड सिमरू पार्टी की नेता भी स्त्रियां हैं। ग्रीन पार्टी का नेतृत्व भी पिछले एक दशक से एक महिला के हाथों में है।

एक दशक पहले जब मर्केल ने पहली बार चांसलर का पद संभाला तो उनके प्रशंसक और आलोचक सोचते थे कि क्या वे ब्रिटेन की मारग्रेट थैचर के समान जर्मनी की ‘लौह महिला’ बनेंगी। अब इस प्रकार की तुलना कोई नहीं करता। अब जर्मनी में लोग सोचने लगे हैं कि क्या थेरेसा, चांसलर मर्केल की डुप्लीकेट बनेंगी, क्योंकि मर्केल के समान वे भी अलग रह कर संयमित ढंग से काम करने वाली हैं। वे जानती हैं कि वे क्या चाहती हैं और उसे प्राप्त करने के लिए क्या करना है।

अगले वर्ष के शुरू तक इस बात की पूरी संभावना है कि अमेरिका का राष्ट्रपति पद भी पहली बार एक महिला- हिलेरी क्लिंटन को मिलेगा और उपराष्ट्रपति उनकी अत्यंत निकट सहयोगी एलिजाबेथ वारेन होंगी। कहा जा रहा है कि इसी वर्ष के अंत में राष्ट्र संघ के सेक्रेटरी जनरल के लिए होने वाले चुनाव में न्यूजीलैंड की पूर्व प्रधानमंत्री हेलेन क्लार्क कमान संभालेंगी। जर्मनी में भी अगले वर्ष चुनाव होने वाले हैं। वहां की वर्तमान चांसलर एंजेला मर्केल पिछले दस वर्षों से यूरोपीय राजनीति में प्रभावशाली नेता के रूप में उभरी हैं और उनकी जीत की पूरी संभावना है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष की अध्यक्ष और अमेरिका की एटार्नी जनरल भी महिलाएं हैं और क्या इसे मात्र संयोग कहा जाए?

यूरोपीय संघ में राजनीति के क्षेत्र में महिला नेत्रियों की सूची में पोलैंड और जर्मनी के बाद ब्रिटेन का नाम भी जुड़ गया है। नार्वे में भी वहां की संसद की नेता एरना सोलबर्ग हैं। स्त्रियों को आगे बढ़ने के लिए जो कांच की दीवार रोके हुए थी वह अब ध्वस्त हो चुकी है या विश्व ही इस प्रकार भयावह स्थिति में पहुंच चुका है कि उससे प्रभावित राष्ट्र महसूस करने लगे हैं कि स्थिति को संभालने के लिए किसी महिला की आवश्यकता है। ब्रिटेन में ब्रेक्जिट के नतीजे के बाद यह मात्र संयोग नहीं था कि डेविड कैमरन के इस्तीफे के बाद जो दो नाम कंजर्वेटिव पार्टी के अगले नेता के लिए आगे आए वे दोनों स्त्रियां थीं।

एलीनर रूजवेल्ट और मर्लिन मनरो का मानना था कि अच्छे स्वभाव वाली स्त्रियां शायद ही कभी इतिहास बनाती हैं। पर सभी स्त्रियां एक समान नहीं होतीं। ज्यों-ज्यों अधिकाधिक महिलाएं राजनीति में आगे आएंगी, उनकी विविधताओं के साथ ही उनकी समानताएं भी नजर आने लगेंगी। बीबीसी के एक पत्रकार के कुछ कहने पर एक दर्शक ने कहा था- मे और लीडसम दोनों भले स्त्रियां हैं, पर दोनों अलग-अलग विचारों की हैं। इस पर स्कॉटलैंड की प्रथम मंत्री निकोला ने ट्वीट किया था- ‘महिलाओं के प्रति लोगों के विचार अब तक काफी बदल चुके हैं।’
राजनीति में महिलाओं का नेतृत्व अभी सामान्य भले न हो, पर इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि सामान्य होता जा रहा है। यह बहुत महत्त्वपूर्ण है। मुख्य बात प्रतिनिधित्व की है। ब्रिटेन में पहली महिला प्रधानमंत्री के रूप में मारग्रेट थैचर का इसमें महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है, पर उनकी अपेक्षा 1997 के चुनाव में विजयी हुई सौ महिला लेबर सांसदों ने वेस्टमिन्स्टर (ब्रिटेन की संसद) की संस्कृति में बदलाव लाने में बहुत कुछ किया। उन्होंने महिलाओं, बच्चों और परिवार के हितार्थ कई नई योजनाएं शुरू कीं और कई क्षेत्रों में महिलाओं की असमानता दूर करने के प्रयास किए।

अब भी जो महिलाएं राजनीति में आती हैं उन्हें अपने स्त्री होने का ध्यान रखते हुए बहुत कुछ ऐसा करना पड़ता है, जो पुरुषों को बड़ा बेतुका लगता है। मतदाता के मन में यह बात बैठी रहती है कि स्त्री होने के नाते वे क्या करेंगी। अमेरिका में हिलेरी क्लिंटन की सबसे बड़ी और अप्रत्याशित समस्या अनुभव की कमी या उसका वैषम्य- उच्च पद पर रहना नहीं है। उन्होंने महिला अभ्यर्थियों के प्रति मध्यवर्गीय नौकरी पेशा लोगों की अरुचि पर तो विजय पा ली है, पर युवा महिला मतदाता अब भी उन्हें पसंद नहीं करतीं। लैंगिक समानता के क्षेत्र में उनके कार्यों को वे कोई महत्त्व नहीं देतीं, बल्कि वे उन्हें कॉरपोरेट सरकार की कठपुतली के रूप में देखती हैं।

पिछले दो दशक में लैंगिक असमानता के क्षेत्र में बहुत कुछ किया जा चुका है, पर समान कार्य के लिए समान वेतन, मातृत्व का ‘दंड’, घरेलू हिंसा आदि के क्षेत्र में अब भी बहुत-कुछ किया जाना बाकी है। इसके अलावा जाति, वर्ण, रंग- जिनके आधार पर भेदभाव किया जाता है और जिनके अपने नुकसान हैं। इनका सबसे अधिक असर महिलाओं पर होता है। इसलिए कहा जा सकता है कि महिलाओं का राजनीति में उच्च पदों पर पहुंचना काफी लंबे रास्ते में मील का एक पत्थर ही है, गंतव्य नहीं। वैसे देखा जाए तो अभी यूरोप में बहुत से देश हैं, जहां कोई महिला प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति नहीं रही। इनमें स्पेन, इटली, स्वीडन और हॉलैंड के नाम सहसा ध्यान में आते हैं। इस मील के पत्थर से आगे निकलने में सबसे पहले ब्रिटेन ही पहला देश था जब 1979 में मारग्रेट थैचर वहां की प्रधानमंत्री बनीं। फिर भी अभी ब्रिटिश संसद में एक तिहाई से भी कम सदस्य महिलाएं हैं यानी संसद में लिंगानुपात की दृष्टि से ब्रिटेन अब भी यूरोपीय देशों में काफी नीचे- बारहवें स्थान पर है, जबकि स्पेन, इटली, स्वीडन और नीदरलैंड्स में महिला सांसदों का अनुपात काफी अधिक है।

अभी तक राजनीति में आगे आने वाली महिलाओं में गुयाना की पहली महिला राष्ट्रपति और पीपुल्स प्रोग्रेसिव पार्टी की पहली महिला प्रधानमंत्री जेनेट जगन, इजरायल की प्रधानमंत्री गोल्डा मीर, भारत की पहली महिला प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी, फिलिपीन की राष्ट्रपति ग्लोरिया मकापगाल आरोयो, पाकिस्तान की प्रधानमंत्री बेनजीर भुट्टो, म्यांमा की आंग सान सू की, विश्व की पहली महिला राष्ट्रपति लाइबीरिया की एलेन जानसन सिरलीफ के नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। मारग्रेट थैचर यूरोप के किसी भी देश की पहली महिला प्रधानमंत्री थीं। ब्रिटेन में अब भले दूसरी महिला प्रधानमंत्री है, पर वह अब भी यूरोप की राजनीति में आगे आई महिलाओं की सूची में काफी नीचे हैं। संसद में नेता होने के संबंध में अलग-अलग देशों में अलग-अलग जिम्मेदारियां हैं। ब्रिटेन में मे और जर्मनी में मर्केल सबसे अधिक शक्तिशाली नेता होने जा रही हैं। पिछली सदी के आखिरी दशक में फ्रांस की प्रधानमंत्री एडिथ के्रसों के हाथों में वहां के राष्ट्रपति की अपेक्षा कम जिम्मेदारियां थीं।

सभी भाषाओं में स्त्रियों के लिए अपमानजनक शब्दों की लंबी सूची है और जो स्त्रियां किसी राजनीतिक या प्रशासनिक पद की दावेदारी में भाग लेने का निर्णय करती हैं उनके लिए तो अपमानजनक यौनिक शब्दों की कोई कमी नहीं है। जब कभी राजनीतिक मामलों में स्त्रियों ने अपनी आवाज उठानी चाही है, पुरुषों ने उन्हें लांछित कर उनकी आवाज दबाने की कोशिश की है। जब महिलाओं ने वोट के अधिकार की बात शुरू की तो उन्हें कुरूप और बंध्या आदि कह कर कई दशक तक महिला-विरोधी सांचों में ढाल दिया गया। जहां तक हिलेरी क्लिंटन की बात है, कहा जाता है कि उनके लिए अब तक जितने और जिस प्रकार के दुर्वचन कहे जा चुके हैं उतने किसी अन्य के लिए नहीं। मीडिया में उनके बालों की स्टाइल, उनके कपड़ों और उनके बुढ़ाते चेहरे को लेकर तरह-तरह की व्यंग्यात्मक टिप्पणियां की जाती रही हैं।

जो स्त्रियां चुनाव में किसी पद के लिए खड़ी नहीं होतीं, पर राजनीति में आगे रहती हैं वे भी इस प्रकार की टिप्पणियों से बची नहीं रहतीं। वर्तमान अमेरिकी राष्ट्रपति ओबामा की पत्नी मिशेल ओबामा भी लैंगिक, यौनिक और जातिवादी लांछनों से बची नहीं रह सकी हैं। 2010 में किए गए एक सर्वे से पता चलता है कि राजनीति में आने वाली महिलाओं के प्रति मतदान के अवसर पर यौनिक व्यंग्यों का प्रयोग उनके लिए विपरीत कार्य करता है। पर अब वैसी बात नहीं रही। 2008 में यौनिक आक्षेप जो सामान्य बात थी अब नहीं रह गई है। पहले पुरुष जिस प्रकार पदों पर आरूढ़ स्त्रियों से डरते थे उसी प्रकार अब भी, बल्कि और भी अधिक डरते हैं।

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