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जनजातीय महिलाएं और बदहाल स्वास्थ्य सेवाएं

जनजातीय और कबीलाई स्त्रियों की स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं आर्थिक और सामाजिक कठिनाइयों से कहीं ज्यादा जटिल हैं। एक रिपोर्ट के अनुसार जनजातीय इलाकों में महिलाओं को समान जीवन स्थितियां मुहैया कराने के मामले में तेजी से गिरावट आई है। पिछले एक साल में महामारी की वजह से उपजे हालात में आर्थिक मोर्चे पर उन्हें व्यापक क्षति हुई है। नतीजतन, आधी आबादी को अपने जीवन स्तर से समझौता करना पड़ा है।

जनजातीय और कबीलाई स्त्रियों की स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं आर्थिक और सामाजिक कठिनाइयों से कहीं ज्यादा जटिल हैं। फाइल फोटो।

दर्शनी प्रिय

सृजन और जीवन चक्र के बीच की धुरी हैं स्त्रियां। केवल संतति नहीं, एक सेहतमंद समाज की वाहक भी हैं वे। ऐसे में उनका खुद का बदहाल स्वास्थ्य हताशा और कुंठा पैदा करता है। इस आबादी को सबसे ज्यादा स्वास्थ्य संबंधी देखभाल की जरूरत है। आश्चर्यजनक रूप से उन्हें स्वास्थ्य सुविधाओं से दूर रखा जा रहा है। सुदूर वन आच्छादित क्षेत्रों की स्त्रियां आज भी स्वास्थ्य संबंधी बुनियादी सुविधाओं से कोसों दूर हैं।

किसी भी समाज का मूल्यांकन इस बात से किया जाता है कि उसमें महिलाओं की स्थिति कैसी है। ये विचार डॉक्टर भीमराव अंबेडकर के हैं। इसे दुनिया भर में सामाजिक विकास के एक पैमाने के तौर पर देखा जा सकता है। संविधान निर्माताओं ने निश्चित ही आधी आबादी के स्वास्थ्य को विमर्श के केंद्र में रखा। परिणामस्वरूप राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति साकार हो सकी। मगर स्त्री केंद्रित स्वास्थ्य नीति की मौलिक अवधारणा कभी राष्ट्रीय अस्मिता का प्रश्न नहीं बन पाई।

जचगी के दौरान इन जनजातीय क्षेत्रों में होने वाली सबसे ज्यादा मौतें इस बात की तस्दीक करती हैं कि चिकित्सा सेवा और जीवन प्रत्याशा के बीच का तालमेल टूटने को है। न्यूनतम स्वास्थ्य सेवाओं के लिए भी उन्हें कबीलाई इलाकों से दूर कस्बों और नजदीकी ठिकानों की ओर दौड़ना पड़ता है। बदहाल स्वास्थ्य सेवाएं न केवल उनकी असमय मृत्यु का कारण बन रही हैं, बल्कि उन्हें मध्यम और हल्की बीमारियों से भी बचाने में नाकाम हैं। यह स्थिति तब है, जब हर साल औसतन 2.23 लाख करोड़ रुपए स्वास्थ्य और चिकित्सीय सुविधाओं पर व्यय किए जाते हैं। मगर इसका लाभ असल लाभार्थियों की पहुंच से लगभग बाहर है।

विकास के आरंभिक चरणों में शिक्षा, स्वास्थ्य और आजीविका को सार्वभौमिक रूप में अंगीकृत किया गया था। बदलते वक्त के साथ प्रगति के पैमाने में आर्थिक तरक्की तो फिट बैठ गई, पर सेहत का ढांचा भरभरा कर गिर गया। इसे केंद्रित करते हुए राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति बनी, ताकि न सिर्फ शहरी, बल्कि बीहड़ों में रहने वाली आदिम आबादी को भी सेहत की सौगात मयस्सर हो। विडंबना है कि सतत विकास प्रक्रिया के क्रमिक चरणों में आदिम स्वास्थ्य संबंधी मुद्दों की अनदेखी की गई।

जनजातीय और कबीलाई स्त्रियों की स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं आर्थिक और सामाजिक कठिनाइयों से कहीं ज्यादा दुरूह हैं। एक रिपोर्ट के अनुसार जनजातीय इलाकों में महिलाओं को समान जीवन स्थितियां मुहैया कराने के मामले में तेजी से गिरावट आई है। पिछले एक साल में महामारी की वजह से उपजे हालात में आर्थिक मोर्चे पर उन्हें व्यापक क्षति हुई है। नतीजतन, आधी आबादी को अपने जीवन स्तर से समझौता करना पड़ा है। पुरुषों के मुकाबले कबीलाई महिलाओं का स्वास्थ्य बुरी तरह प्रभावित हुआ है।

विभिन्न जनजातीय क्षेत्रों, खासकर पश्चिम बंगाल और उससे सटे इलाकों की सेहत संबंधी विस्तृत रिपोर्ट से पता चलता है की 64.2 प्रतशित से अधिक जनजातीय महिलाओं में बीएमआई 18.5 से भी कम है। झारखंड जैसे जनजातीय इलाकों में तो 73 फीसद औसत के मुकाबले 82 प्रतिशत महिलाएं रक्ताल्पता की शिकार हैं। झारखंड और पश्चिम बंगाल में 43 फीसद जनजातीय महिलाएं प्रजनन संबंधी समस्याएं झेल रही हैं। उन्हें न तो उपचार मिल रहा है और न ही परामर्श। मां की खराब सेहत के चलते ज्यादातर बच्चे समय पूर्व पैदा हो रहे हैं।

अधिकतर जनजातीय इलाकों में तीन साल से कम उम्र के सत्तावन फीसद बच्चे कम वजन के हैं। सिर्फ अठारह प्रतिशत गर्भवती जनजातीय महिलाएं टिटनेस का टीका ले पाती हैं। सिर्फ बारह फीसद को फोलिक आयरन की गोलियां मिल पाती हैं। उनहत्तर प्रतिशत प्रसव पारंपरिक तरीके से घर पर, चौबीस प्रतिशत रिश्तेदारों और दोस्तों और सात प्रतिशत डॉक्टर या आशा कार्यकर्ता द्वारा कराया जाता है। जल्दी-जल्दी बच्चे होने से मां की सेहत पर भी बुरा प्रभाव पड़ता है। बच्चे भी खतरे में होते हैं। इन इलाकों में ज्यादातर मौतें डायरिया और सांस संबंधी समस्याओं से होती हैं।

फिलहाल देश में स्वास्थ्य देखभाल का तीन स्तरीय ढांचा है। इसमें निचले स्तर पर गांव या समुदाय स्तर के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र हैं। उसके बाद जिला अस्पतालों के रूप में जिला स्तरीय माध्यमिक स्वास्थ्य सुविधाएं हैं। उसके बाद अत्याधुनिक देखभाल सेवा वाले मुख्य चिकित्सा संस्थानों का स्थान आता है। अगर अस्पतालों में उपलब्ध आधारभूत सुविधाओं की बात करें, तो जिला अस्पतालों में से अधिकांश में सौ से पांच सौ बिस्तर हैं, जो प्रत्येक जिले में एक लाख से दस लाख नागरिकों के बीच सेवा प्रदान करते हैं। जिला अस्पतालों के लिए भारतीय जनस्वास्थ्य मानक दिशानिर्देश पहली बार 2007 में जारी किए गए थे। फिर 2012 में संशोधित किए गए। स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय ने 2017 में मल्टी स्पेशियलिटी देखभाल के लिए जिला अस्पतालों को मजबूत करने की कोशिश शुरू की, लेकिन यह भी परवान न चढ़ सकी।

अगर अस्सी के दशक की बात करें तो कई जिला अस्पतालों को विशेषज्ञता केंद्र माना जाता था, लेकिन बाद के वर्षों में इनकी स्थिति बिगड़ी, क्योंकि वे तकनीकी तरक्की के साथ तालमेल बिठाने में नाकाम रहे। 1990 के दशक के मध्य से स्वास्थ्य सेवाओं के मोर्चे पर सबका ध्यान निजी क्षेत्र में लग गया। इसका सार्वजनिक व्यवस्था पर हानिकारक प्रभाव पड़ा और कई धर्मार्थ अस्पताल अव्यावहारिक हो गए, उन्हें बंद करना पड़ा। मुख्य इलाकों से कटे जनजातीय क्षेत्रों की हालत तो और बिगड़ गई। ज्यादातर जनजातीय महिलाएं झाड़-फूंक या देसी इलाज का सहारा लेती हैं। उनके पास इसके सिवा कोई दूसरा विकल्प नहीं है।

राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति में साफ तौर पर जनजातीय समूह की महिलाओं की बुनियादी सेवा की अनिवार्यता की बात कही गई है। उसके बाद बारह राज्यों के सुदूर जनजातीय इलाकों की महिलाओं की सेहत को लेकर एक केंद्रीय योजना समिति गठित की गई। लेकिन नतीजा सिफर रहा। ज्यादातर महिलाएं वनौषधियों पर निर्भर हैं। शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार के क्षेत्र में इन महिलाओं का प्रदर्शन काफी पीछे है। जाहिर है, यहां चिकित्सा संसाधनों के विस्तार की आवश्यकता है।

उनकी स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं के हल के लिए चिकित्सालय, चिकित्सक और आधुनिक दवाइयों का प्रबंधन भी जरूरी है। उनके लिए पौष्टिक आहार तथा विटामिन की गोलियों की व्यवस्था की जाए, ताकि उनमें कुपोषण से होने वाली बीमारियों को समाप्त किया जा सके। अमूमन प्रकृति के पूजक ये लोग सामाजिक संपर्क स्थापित करने में खुद को असहज महसूस करते हैं, लिहाजा सामाजिक-सांस्कृतिक अलगाव और अस्पृश्यता की भावना उन्हें पोषण संबंधी सुविधाओं से भी वंचित रखती है।

आज भी इन समुदायों का एक बहुत बड़ा वर्ग निरक्षर है। खासकर महिलाएं घोर उपेक्षा, पिछड़ेपन, लैंगिक भेदभाव की शिकार हैं। पितृसत्तात्मक प्रभाव के चलते उनकी शिक्षा को खासा महत्त्व नहीं दिया जाता। समाज में पुरुष वर्ग के मतानुसार स्त्रियां सिर्फ घर का कार्य कर सकती हैं, इसलिए उन्हें केवल बच्चों के लालन-पालन, लकड़ियां बीनने, जानवरों का चारा एकत्रित करने और पशुपालन आदि से जुड़े कामों से ही जोड़े रखा जाता है। निम्नतर सामाजिक स्तर और घोर गरीबी ने उन्हे अंधविश्वास और जादू-टोने की गिरफ्त में ले रखा है।

डायन, बिसाही, हिंसा, विस्थापन के सवाल उनके विकास को लगातार प्रभावित कर रहे हैं। महामारी के एक लंबे दौर ने उनकी स्वास्थ्य चिंताओं को और बढ़ा दिया है। चिकित्सीय सुविधाओं से जुड़े समेकित और त्वरित प्रयासों की जरूरत है। आदिवासी महिलाओं में जागृति बढ़ने से उनमें स्वास्थ्य सतर्कता बढ़ेगी। इससे मृत्यु दर में अपेक्षाकृत कमी आएगी। खाकर गर्भवती महिलाओं को बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराने में सरकार और संस्थाएं मदद करें। उनकी स्थिति में उल्लेखनीय परिवर्तन हो, इसके लिए जनजातीय महिलाओं में गैर-सरकारी संस्थाओं द्वारा सेहत जनजागरण अभियान चलाया जाए। तभी आदिम महिलाएं अपनी स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं से निजात पा सकेंगी।

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