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अंधी प्रतिस्पर्धा का फंदा

आखिर क्या कारण है कि सुपर-30 के बच्चे तनाव-मुक्त रहते हैं और अन्य कोचिंग संस्थानों के बच्चे तनाव से ग्रस्त?

Suicide Articles, Suicide Cases, Student Suicide, Swami Agniveshपिछले कुछ सालों से भारत में आत्महत्या की घटनाएं बढ़ी हैं।

पिछले कुछ सालों से भारत में आत्महत्या की घटनाएं बढ़ी हैं। उम्मीदें पूरी न हो पाना या असफलता इसकी प्रमुख वजह दिखती है। आत्महत्याएं जहां लोकलाज, कर्ज केदबाव तथा जिजीविषा के संघर्ष के समाप्त होने के कारण हो रही हैं तो ‘भविष्य की हत्याएं’ अज्ञान व अकर्मण्यता के कारण। आजकल ये दोनों प्रक्रियाएं इतनी अधिक संख्या में हो रही हैं कि समाज की संवेदना ग्रंथि सुप्त होने को है। असामयिक मृत्यु पर तो क्षणिक संवेदना प्रकट करने का रिवाज बनता जा रहा है। देश के अन्नदाता कहलाने वाले किसान की आत्महत्या के आंकड़े बीस ओवरों के क्रिकेट के रनों से भी तीव्र गति से बढ़ रहे हैं।

प्रतिक्रिया भी उसी शैली में व्यक्त की जा रही है। हमने आत्महत्याओं के आंकड़े पढ़े नहीं कि दूसरा पेज पढ़ना शुरू कर दिया। इन सभी तरह की आत्महत्याओं में ‘धर्म’ की महत्त्वपूर्ण भूमिका है। मान्यता यह है कि भाग्य से अधिक कुछ नहीं मिल सकता, और इसी का प्रवचन, प्रचार-प्रसार सभी धर्मों के ठेकेदार गरीबों, किसानों तथा मजदूरों के बीच करते हैं। फलत: इनमें से अधिकांश की सोचने की शैली इसी के अनुरूप ढल जाती है और धर्म व कर्मकांड का बाजार फलता-फूलता रहता है।

वास्तव में भाग्यवाद का सिद्धांत ही बुनियादी रूप से गलत है। हाल ही में देश की सबसे बड़ी सरकारी सेवा आइएएस के (संघ लोक सेवा आयोग की परीक्षा के) परिणाम को आपने देखा होगा। प्रथम स्थान पाने वाली टीना डाबी का सर्वोच्च स्थान हासिल करना अप्रत्याशित है, क्योंकि इतिहास में दलितों के भाग्य में दूसरों की सेवा ही बताया गया था। पर अवसर ने उसका भाग्य बदलने को विवश कर दिया। इस दलित की सफलता को पाखंडी कैसे व्याख्यायित करेंगे यह तो वही बता सकते हैं। पर एक बात स्पष्ट है, जहां चाह है वहीं राह भी है। सफलता और असफलता आपके प्रयास व परिवेश से निर्धारित होती है, न कि पूर्व निर्धारित भाग्य से।

कोटा शहर (राजस्थान) के विद्यार्थियों के संबंध में स्थिति दूसरी है। यह स्थान मुख्यत: इंजीनियरिंग व मेडिकल से संबंधित कोचिंग के लिए प्रसिद्ध है। कोचिंग बिजनेस दो हजार करोड़ का है। दिनोंदिन इसमें बढ़ोतरी होती जा रही है। इंजीनियरिंग की कुल निर्धारित सीटें दस हजार हैं, जबकि इसके उम्मीदवारों की संख्या बारह से पंद्रह लाख के बीच है, अर्थात सरकारी आवश्यकता से कई गुना अधिक बच्चे इंजीनियर बनना चाहते हैं। पर सरकार चाहती है कि इसे पाने के लिए विद्यार्थी गलाकाट प्रतिस्पर्धा के दौर से गुजरें। इसी प्रतिस्पर्धा में पिछड़ने के कारण होनहार विद्यार्थी आत्महत्या कर रहे हैं।

सवाल यह भी है कि कोटा शहर में ऐसा क्या है जो पूरे भारत से बच्चे वहां कोचिंग के लिए जाते हैं। इसका जवाब है कोचिंग संस्थानों की गुणवत्ता, अर्थात मान्यतानुसार देश भर के सरकारी अध्यापकों से बेहतर शिक्षा कोटा शहर के चालीस-पचास पेशेवर अध्यापक दे सकते हैं। उन्हीं अध्यापकों से पढ़ने के लिए यहां लाइन लगी रहती है। इंजीनियरिंग के क्षेत्र में एक और प्रसिद्ध अध्यापक हैं जिनके कोचिंग से शत-प्रतिशत परिणाम होता है और वहां कोई विद्यार्थी आत्महत्या भी नहीं करता, बिहार के अरविंद कुमार, जिनके सुपर-30 संस्थान से बच्चे शत-प्रतिशत सफल होते हैं।

आखिर क्या कारण है कि सुपर-30 के बच्चे तनाव-मुक्त रहते हैं और अन्य कोचिंग संस्थानों के बच्चे तनाव से ग्रस्त? तनाव इतना कि पिछले दिनों कीर्ति नामक जिस छात्रा ने आत्महत्या की, उसने मानव संसाधन विकास मंत्रालय से देश के सभी कोचिंग संस्थानों को बंद करने की मार्मिक अपील की थी। कोटा थाने में जनवरी से अब तक नौ बच्चों के आत्महत्या करने की रिपोर्ट दर्ज हो चुकी है। सबसे अधिक आत्महत्याएं मई से जुलाई के दौरान होती हैं, क्योंकि इसी अवधि में विभिन्न परीक्षाओं के परिणाम आते हैं और नए सत्र की शुरुआत होती है। एक विद्यार्थी ने बताया कि असफल होने पर या एक ही फीस में बार-बार कोचिंग में आने पर अध्यापक सरेआम जलील करते हैं, जिससे बच्चों में तनाव व कुंठा की भावना घर करने लगती है। दूसरे, घर-परिवार की उम्मीदों का पहाड़ भी बच्चों को तनाव-मुक्त होने नहीं देता। अगर आसपास के गांव का कोई विद्यार्थी सफल हो गया हो तो और भी ताने सुनने पड़ते हैं।

आत्महत्या कोई नई समस्या नहीं है, पर पहले इसकी बारम्बारता इतनी अधिक नहीं थी। पश्चिम में अवश्य औद्योगीकरण, बाजारीकरण व नगरीकरण से उपजी समस्याओं ने आत्महत्या को बढ़ावा दिया था। इसीलिए 1987 में फ्रेंच समाजशास्त्री इमाईल दुर्खीम ने अपनी पुस्तक ‘आत्महत्या’ में इसके कारणों की विस्तार से व्याख्या की थी। उन्होंने बताया कि सामाजिक संबंधों में बिखराव आत्महत्या का प्रमुख कारण है। अर्थात सामाजिक तथा मनोवैज्ञानिक सहारा न मिलना, व्यक्ति का अलग-थलग रहना तथा सफलता के लिए सामाजिक दबाव अधिक होना ही व्यक्ति को आत्महत्या के लिए उकसाता है।

विद्यार्थियों के संदर्भ में देखें तो अलगाव तथा सामाजिक दबाव, आत्महत्या के दो प्रमुख कारण दिखते हैं। अधिकतर विद्यार्थी बारहवीं तक पारिवारिक माहौल में रह कर पढ़ाई करते हैं। पर प्रतियोगी परीक्षाएं पास करने के लिए उन्हें अपना घर सोलह से अठारह वर्ष की उम्र में छोड़ना पड़ता है। विद्यार्थियों के लिए जीवन का यह दौर मनोवैज्ञानिक तौर से उथल-पुथल का दौर होता है। कुछ विद्यार्थियों के अभिभावक तो बच्चों को दसवीं के बाद से ही कोचिंग के लिए भेज देते हैं। गरीब, किसान, मध्यवर्गीय परिवारों के बच्चे दूसरे शहरों में रहने तो लगते हैं, पर सामंजस्य बैठाने में उनको दिक्कत होती है। दो से तीन लाख रुपए प्रतिवर्ष का खर्च भी उनको हमेशा याद रखना पड़ता है और नातेदार-रिश्तेदार भी अक्सर उन्हें इसकी याद दिलाते रहते हैं। अन्य समस्याओं में अंग्रेजी माध्यम से पढ़ाई में पीछे होना तथा उसमें बराबरी के लिए जद्दोदजहद करना, रहने-खाने आदि को व्यवस्थित करना, भावनात्मक रूप से सबसे जुड़े रहना, आदि-आदि, अर्थात एक झटके में ही उन पर तरह-तरह के दबाव का पहाड़ टूट पड़ता है।

अधिकतर बच्चे इन सभी में सामंजस्य न बैठा पाने के कारण असफल हो जाते हैं। कुछ तो अपने सपने पूरे न होने पर वापस चले जाते हैं, जबकि कुछ के लिए असफलता नासूर बन जाती है। लोक-लाज, समाज की मान-मर्यादा, परिवार की उम्मीद, आदि तमाम कारणों का हवाला देकर आत्महत्या ही उन्हेंएकमात्र रास्ता सूझता है। कुछ तो इसलिए भी आत्महत्या कर लेते हैं कि उनकी इच्छा के विपरीत परिवार वाले अपनी इच्छाएं थोप देते हैं। आमिर खान की ‘3 इडियट’ फिल्म भी इन्ही मुद््दों को लेकर बनी थी, खूब देखी व सराही गई, पर समाज ने उससे बहुत कम सीखा और एक मनोरंजक फिल्म की तरह ही उसे देखा और भुला दिया।
यह विडंबना ही है कि मीडिया में किसानों व छात्रों की आत्महत्या की घटनाओं की चर्चा तो होती है, लेकिन इस पर कोई जन-आंदोलन खड़ा नहीं हो रहा, जबकि रोहित वेमुला की आत्महत्या ने हैदराबाद, जेएनयू से लेकर कश्मीर तक आंदोलन खड़ा कर दिया; क्यों? यह प्रश्न फिर भी रह जाता है कि चाहे किसान हों, या छात्र, उन्हें आत्महत्या के बदले व्यवस्था परिवर्तन के लिए आखिरी सांस तक अहिंसात्मक तरीके से क्या नहीं लड़ना चाहिए? ईमानदारी से देखा जाय तो चाहे किसानों की आत्महत्या हो या छात्रों की, यह आत्महत्या नहीं बल्कि व्यवस्था द्वारा की गई सुनियोजित हत्या है। भारत में सबकुछ तो ठीक नहीं है, पर प्रजातंत्र तो है, और मीडिया भी इतना व्यापक है कि किसी गांव के कोने से भी इस तरह के आंदोलन की शुरुआत की जाए तो वह निश्चित ही एक बड़ा मुद््दा बनकर उभरता है, और यदि लोग एक के बाद एक संघर्षात्मक आहुति दें तो जनमानस को उद्वेलित किया जा सकता है।

हमें यह भी ध्यान रखना चाहिए कि शरीर हमें परमात्मा एक अमानत के रूप में सौंपता है और इसको समाप्त करना या आत्महत्या करके नष्ट कर देना क्या ईश्वर की अमानत में खयानत नहीं है? यह दुर्भाग्य है कि हमारा ईश्वर के प्रति विश्वास इतना विकृत कर दिया गया है कि या तो हम छोटे-बड़े कामों के हिसाब से ईश्वर-भक्ति के नाम पर रिश्वत देते हैं अथवा कतिपय चुनौतियों से लड़ने के बदले और उस लड़ाई को ईश्वर उपासना का हिस्सा मानने के बदले आत्महत्या रूपी पलायन का रास्ता अपनाते हैं। जबकि हमारे सामने ईसा मसीह से लेकर महर्षि दयानंद व महात्मा गांधी के ईश्वर-विश्वास पर आधारित ढेर सारे प्रेरक प्रसंग हैं। तो क्यों न हम उनकी जय के बदले उनकी शिक्षाओं को जीवन में उतारें। व्यवस्था परिवर्तन के लिए स्वयं पहल करें, न कि आत्महत्या-रूपी कायरता का कदम उठाएं।

समय रहते आत्महत्या की बढ़ती प्रवृत्ति को रोकने के प्रयास नहीं किए गए तो वह दिन दूर नहीं जब भारत को व्यापक सामाजिक विघटन का सामना करना होगा। आत्महत्या की प्रवृत्ति को हतोत्साहित किया जाए तथा विद्यार्थियों को आत्मिक व मानसिक रूप से मजबूत बनाया जाए। सभी विद्यार्थियों को हर परिस्थिति से जूझने वाली शिक्षा दी जाए। पूरे देश में समतामूलक शिक्षा प्रणाली अपनाई जाए ताकि भाषागत और क्षेत्रगत आधार पर कोई विद्यार्थी खुद को ठगा हुआ महसूस न करे। मेडिकल व इंजीनियरिंग की सीटें बढ़ाई जाएं, साथ ही अन्य सेवाओं को भी सम्मान दिया जाए, जिससे एक ही क्षेत्र में अंधी दौड़ से बचा जा सके। सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण सुधार मुद्रा के महत्त्व को घटाना है। मुद्रा आधारित व्यवस्था से अलग हमें मूल्य, आत्मिक शांति व सेवा-भाव का महत्त्व बढ़ाना होगा, जिससे व्यक्ति अध्यापक, क्लर्क या स्वरोजगारी बन कर भी संतोष महसूस कर सकें।

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