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चुनाव सुधार और आशंकाएं

भारत के ग्रामीण मतदाता भी अब बहुत समझदार हो चुके हैं। वे हित-अहित समझते हैं। वे विकास कार्यों को निरंतर जारी रखना चाहते हैं। अस्थिर सरकारों के नतीजे वे देख चुके हैं। फिर केंद्र और राज्यों की सरकारों में टकराव से दिल्ली ही नहीं, पश्चिम बंगाल, आंध्र प्रदेश जैसे राज्य की जनता विकास तथा कल्याण कार्यों के गड़बड़ाने से परेशान रहती है। संघीय ढांचे से लाभ भी तो होना चाहिए।

एक देश एक चुनाव के आलोचकों का एक तर्क पश्चिमी देशों के लोकतंत्र और संघीय ढांचे को लेकर है।

आलोक मेहता

करगिल की ऊंची हिम शृंखलाओं पर या साठ डिग्री की आग जैसे रेगिस्तान में तैनात सिपाही क्या किसी भय से सुरक्षा की मांग करते हैं? गुर्दे, लीवर या दिल का अति संवेदनशील आपरेशन करने वाले अनुभवी डॉक्टर के हाथ क्या भय से कांपते हैं? हजारों फीट ऊंचाई पर विमान उड़ाने वाले क्या हवा-पानी, बादल के झटकों से घबराते हैं? विशालकाय पुल बनाने वाले इंजीनियर पुल के गिर सकने की संभावनाएं सोचकर क्या काम बंद कर देते हैं? नहीं, कभी नहीं। फिर सार्वजनिक जीवन में अपने कर्म-वचन पर भरोसा कर सकने वाले कई नेताओं की दुनिया के आदर्श लोकतांत्रिक भारत में लोकसभा और विधान सभाओं के चुनाव एक साथ होने के प्रस्ताव मात्र पर घबराहट क्यों हो रही है? संविधान निर्माताओं में अग्रणी डा. भीमराव आंबेडकर, जेबी कृपलानी, डा. राममनोहर लोहिया, पंडित दीनदयाल उपाध्याय, पंडित जवाहरलाल नेहरू, इंदिरा गांधी, चंद्रशेखर, कामरेड होमी दाजी, ज्योति बसु जैसे शीर्षस्थ नेताओं की तरह विभिन्न राजनीतिक दलों के नेताओं ने 1952, 1957, 1962, 1967 में लोकसभा और विधान सभाओं के चुनाव में हार-जीत की परवाह किए बिना चुनाव लड़े। विजय से सत्ता मिली या पराजय से फिर संघर्ष और सफलता के अनुभव मिले। लेकिन किसी ने कभी कोई आपत्ति नहीं की। फिर अब ‘एक देश, एक चुनाव’ के लिए व्यापक सहमति और चुनाव व्यवस्था में आवश्यक सुधार-संशोधन पर आशंकाएं-आपत्तियां क्यों उठनी चाहिए? राष्ट्रपति ने संसद की संयुक्त बैठक को संबोधित करते हुए खर्चीली और लगातार चुनावी तूफान की व्यवस्था से निजात पाकर एक साथ चुनाव के प्रस्ताव पर विस्तृत विचार-विमर्श और निर्णय की सलाह दी।

फिर भी कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी, तृणमूल कांग्रेस, द्रमुक और कम्युनिस्ट पार्टियों के नेताओं के साथ प्रगतिशील कहलाने वाले गैर-राजनीतिक वर्ग ने भी गंभीर आशंकाएं और आपत्तियां व्यक्त की हैं। बहस में शामिल होकर सकारात्मक सुझाव-सिफारिशें रखने के बजाय वे ऐसे किसी लोकतांत्रिक कदम से संविधान की मूल संघीय भावना, क्षेत्रीय स्वायत्तता और अस्तित्व के खत्म होने, दो-तीन दलीय व्यवस्था या एक दलीय और एक नेतृत्व वाली तानाशाली तक के खतरे बताने लगे हैं। यह क्या उनकी विचारधारा, सुविधा या कमजोरी है? राष्ट्रीय राजनीतिक दल हों अथवा क्षेत्रीय पार्टियां, क्या बार-बार के चुनाव के लिए हजारों करोड़ रुपए बहाने में सुख और संतोष का अनुभव करती हैं? पिछले चुनाव इस बात के प्रमाण हैं कि सरकारी खजाने से चुनाव आयोग के लगभग दस हजार करोड़ रुपए के अधिकृत खर्च के अलावा राजनीतिक पार्टियां और उम्मीदवार चुनावों में कुल मिला कर दो से पांच लाख करोड़ रुपए तक खर्च कर देते हैं। कुछ पार्टियों में तो केवल उम्मीदवार बनने के लिए बीस से पचास करोड़ रुपए वसूल लिए जाते हैं, फिर भले ही वह चुनाव हार जाए। इससे पार्टी के शीर्ष नेताओं का खजाना अवश्य भर जाता है। राजनीतिक दल सत्ता में हों या विपक्ष में, उनके कार्यकर्ताओं, पदाधिकारियों को पूरे साल किसी न किसी प्रदेश के चुनाव के लिए भागते-दौड़ते रहना पड़ता है। केंद्र या प्रदेशों के मंत्री पार्टी नेतृत्व के आदेशानुसार चुनावों के लिए अधिक सक्रिय रह कर अपने मंत्रालयों और विभागों के कामकाज पर कम समय दे पाते हैं। अर्धसैनिक बल तो निरंतर चुनावी ड्यूटी में लगे रहते हैं।

असली समस्या आचार संहिता की है। चुनाव से करीब तीन महीने पहले आचार संहिता लागू हो जाती है। इस कारण कुछ सरकारी निर्णय या तो जल्दबाजी में होते हैं या फिर महीनों के लिए लटक जाते हैं। फिर चुनाव के बाद नई सरकार, नए मंत्री, अधिकारियों के विभागों में परिवर्तनों से प्रशासनिक कामकाज ढर्रे पर लाने में तीन महीने लग जाते हैं। ताजा उदाहरण पिछले वर्ष के अंत में हुए मध्यप्रदेश विधान सभा के चुनाव और फिर इस वर्ष मई महीने तक हुए लोकसभा चुनाव के कारण स्कूली बच्चों की ई-लर्निंग योजना में रुकावट आने का है। इस योजना के लिए कुछ जिलों में धनराशि भी जुटाई गई, लेकिन सरकारी स्कूलों के लिए सरकारी अनुमति और भागीदारी चाहिए थी। दो वर्षों के प्रयास के बाद अंतिम चरण में क्रियान्वयन से पहले आचार संहिता लागू हो गई। नतीजा यह हुआ कि क्रियान्वयन लगभग आठ महीने बाद जून-जुलाई में हो पाएगा। इससे भी अधिक महत्त्वपूर्ण अस्पताल, सड़क, स्कूल, पुस्तकालय, आवास संबंधी पचासों प्रस्ताव और निर्णय राज्यों से लेकर केंद्र सरकार तक में अटके रहे। सरकार को सेवा देने वाले गैर सरकारी संस्थानों, छोटे उद्यमियों द्वारा दी गई सेवाओं के भुगतान महीनों के लिए लटक गए। इससे उनकी ही नहीं, अर्थ व्यवस्था की गाड़ी भी अटक गई। राजनीतिक दलों की एक चिंता समय से पहले लोकसभा और विधान सभा में बहुमत नहीं रहने, बड़े दलबदल और सरकारें गिरने के बाद की स्थिति को लेकर है। इसका उत्तर यह है कि कार्यकाल निश्चित होगा। यदि सांसद या विधायक स्वयं दुबारा चुनाव थोपेंगे, तो बचे हुए कार्यकाल के लिए चुनाव होंगे। वैसे इस संभावना को देखकर स्थिरता बने रहने के स्थिति अधिक रहेगी। इसमें कोई शक नहीं कि ‘एक देश एक चुनाव’ के नए बदलाव के साथ चुनाव सुधार के कुछ अन्य महत्त्वपूर्ण प्रस्तावों पर भी संसद व सुप्रीम कोर्ट से स्वीकृति ले ली जाए, ताकि अपराधी तत्वों और भारी चुनावी खर्चों पर भी अंकुश लग सके।

एक देश एक चुनाव के आलोचकों का एक तर्क पश्चिमी देशों के लोकतंत्र और संघीय ढांचे को लेकर है। जब वे अमेरिका का नाम लेते हैं, जहां राज्यों के चुनाव अलग-अलग होते हैं, तब उन्हें यह मानना चाहिए कि वहां प्रमुख राजनीतिक दल दो ही हैं। वे भारत में पचीसों राजनीतिक दलों की आवश्यकता बताते हैं। वे यह नहीं समझते कि वहां दलों, उम्मीदवारों और राष्ट्रपति तक के चुनावी खर्च की पारदर्शिता होती है। वहां औसतन मतदाता समान आय वर्ग के होते हैं। यदि वे यूरोपीय देशों की बात करें, तो जर्मनी, ब्रिटेन और फ्रांस में भी राजनीतिक दलों की संख्या सीमित है। जहां तक क्षेत्रीय दलों की बात है, जर्मनी के बवेरिया जैसे राज्यों में दशकों तक क्षेत्रीय दल का अस्तित्व भी बना रहा और राष्ट्रीय पार्टियों का महत्त्व बरकरार रहा। भारत के हाल के चुनावों ने भी साबित किया कि ओड़िशा, तमिलनाडु, केरल, पश्चिम बंगाल, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान और पूर्वोत्तर क्षेत्र के राज्यों में मतदाताओं ने विधान सभाओं और लोकसभा में अलग-अलग दलों को वोट दिए। क्षेत्रीय हितों की रक्षा यदि राष्ट्रीय राजनीतिक दल करते रहें और प्रादेशिक क्षत्रपों का महत्त्व बनाए रखें, तो उनकी महत्ता बनी रह सकती है। भारत के ग्रामीण मतदाता भी अब बहुत समझदार हो चुके हैं। वे हित-अहित समझते हैं। वे विकास कार्यों को निरंतर जारी रखना चाहते हैं। अस्थिर सरकारों के नतीजे वे देख चुके हैं। फिर केंद्र और राज्यों की सरकारों में टकराव से दिल्ली ही नहीं, पश्चिम बंगाल, आंध्र प्रदेश जैसे राज्य की जनता विकास तथा कल्याण कार्यों के गड़बड़ाने से परेशान रहती है। संघीय ढांचे से लाभ भी तो होना चाहिए। साठ के दशक से लेकर आज तक वही राजनीतिक दल अच्छी सफलता पाते आए हैं, जिनका संगठन मजबूत रहा है। किसी समय कांग्रेस पार्टी या कम्युनिस्ट पार्टियों का संगठनात्मक ढांचा सुदृढ़ होता था। प्रादेशिक नेतृत्व और समर्पित कार्यकर्ताओं के बल पर वे चुनावी सफलता पाती रही। भारतीय जनता पार्टी ने पिछले वर्षों के दौरान विभिन्न प्रदेशों में संगठन मजबूत किया। लेकिन अब क्षेत्रीय अथवा जातीय हितों के नाम पर चलने वाली पार्टियां धीरे-धीरे आधार खो चुकी हैं। जातीय समीकरण से चुनाव परिणामों का आकलन करने वाले गलत साबित हो रहे हैं। इसलिए चुनावी सुधार के साथ जनता से जीवित संपर्क ही लोकतंत्र को मजबूत करेगा।

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