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असंगठित क्षेत्र का संकट

आर्थिक मंदी और आपदा की स्थिति में बेरोजगारी की पहली और सबसे बड़ी मार असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों को झेलनी पड़ती है। महामारी की दूसरी लहर ने इस क्षेत्र पर एक बार फिर से ताले लगा दिए हैं। सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी (सीएमआइई) के अनुसार, अलग-अलग राज्यों में लागू सख्त पाबंदियों के कारण अकेले अप्रैल महीने में पचहत्तर लाख लोग बेरोजगार हो गए हैं। इसमें तीन चौथाई हिस्सा असंगठित क्षेत्र का है।

कोरोना महामारी के कारण बेरोजगारी बढ़ी (फाइल, प्रतीकात्मक तस्वीर, इंडियन एक्सप्रेस)

सरोज कुमार
राजनीति, समाजनीति और अर्थनीति में सफलता का मूल तत्व संगठन शक्ति ही है। राजनीतिक सत्ता संगठन के बल पर हासिल की जाती है, सामाजिक वर्चस्व एकजुटता से बनता है और आर्थिक समृद्धि संगठित व्यवस्था के जरिए सोपान चढ़ती है। संगठन शक्ति का ही परिणाम है कि दस फीसद से भी कम श्रमशक्ति वाला अर्थव्यवस्था का संगठित क्षेत्र सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में पचास फीसद का योगदान करता है। जबकि बाकी पचास फीसद की भरपाई करने में असंगठित क्षेत्र के नब्बे फीसद से अधिक श्रमिक पसीना बहाते हैं। अर्थव्यवस्था में संगठित और असंगठित का अर्थ औपचारिक और अनौपचारिक भी है।

सवाल यह कि इतनी बड़ी श्रमशक्ति वाला अर्थव्यवस्था का आधा हिस्सा असंगठित क्यों है? संगठन शक्ति के जरिए बनने वाली सत्ता पूरी अर्थव्यवस्था को संगठित करने के बारे में क्यों नहीं सोचती, ताकि पूरी श्रमशक्ति समान रूप से लाभान्वित हो सके और अर्थव्यवस्था भी नई ऊंचाई छू सके? या संगठित क्षेत्र की सत्ता के लिए इतने बड़े असंगठित क्षेत्र का होना क्यों आवश्यक है? सच यही है कि संगठित क्षेत्र की बुलंद इमारत असंगठित क्षेत्र के र्इंट-गारे से खड़ी होती है।

फिर दस फीसद क्यों चाहेंगे कि बाकी नब्बे फीसद भी इस इमारत में हिस्सेदार बन जाएं। यही कारण है कि असंगठित क्षेत्र के पक्ष में बातें तो होती हैं, लेकिन ये व्यवहार में नहीं उतरतीं। असंगठित क्षेत्र का सीधा-सा अर्थ है असुविधाओं और अभावों वाला क्षेत्र, जहां जीवन के मौलिक अधिकार भी अक्सर बेमानी होते हैं। बाकी सुविधाएं तो दूर की बात हैं।

किसी तरह जिंदगी कट गई तो सौभाग्य, वरना दुर्घटना, आपदा, आर्थिक मंदी जैसी परिस्थितियां वक्त से पहले और सबसे पहले इस क्षेत्र के उद्यमों और श्रमिकों को निवाला बनाती हैं। असंगठित क्षेत्र में श्रमिक सबसे दयनीय हालत में हैं। यह सोचने की बात है कि जिस देश की लगभग तिरानवे फीसद श्रमशक्ति दयनीयता के अंधेरे में जीवन बसर करती हो, वह देश किस उजाले की बात कर सकता है! और यदि करता भी है तो उसके मायने क्या हैं? जब संगठन ही मजबूती का पैमाना है तो आर्थिक रूप से वही देश मजबूत होगा, जहां की अर्थव्यवस्था अधिकतम व्यवस्थित और संगठित हो।

अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (आइएलओ) की 2018 की एक रपट के अनुसार असंगठित क्षेत्र में कार्यरत श्रमशक्ति का वैश्विक औसत साठ फीसद से अधिक है। इसमें अफ्रीका का औसत सबसे ज्यादा 85.8 फीसद, एशिया और प्रशांत क्षेत्र का 68.2 फीसद, अरब देशों का 68.8 फीसद, अमेरिका का चालीस फीसद, जबकि यूरोप और मध्य एशिया का औसत सबसे कम 25.1 फीसद है।

रपट कहती है कि दुनिया में तिरानवे फीसद असंगठित रोजगार उभरते और विकासशील देशों में हैं। असंगठित श्रमशक्ति के मामले में भारत की स्थिति अफ्रीकी देश युगांडा जैसी है, जहां श्रमशक्ति का चौरानवे फीसद हिस्सा असंगठित क्षेत्र में कार्यरत है। जबकि भारत जैसी मांग आधारित अर्थव्यवस्था में लगभग तिरानवे फीसद श्रमशक्ति का असंगठित होना, अर्थव्यवस्था के असली रूप का दर्शन कराता है।

ऐसा नहीं कि असंगठित क्षेत्र नीति-नियंताओं के एजेंडे में नहीं है या इस क्षेत्र के नाम पर कुछ किया नहीं गया है। दिक्कत यह है कि इस क्षेत्र के नाम पर अब तक जो कुछ किया गया है, वह या तो नाम मात्र का रहा है या फिर संगठित क्षेत्र के काम का साबित हुआ है। अलबत्ता असंगठित क्षेत्र कमजोर ही हुआ है। देश की मौजूदा सरकार ने अनौपचारिक अर्थव्यवस्था को औपचारिक बनाने के लिए दो बड़े कदम उठाए। लेकिन नोटबंदी और जीएसटी के रूप में उठाए गए दोनों कदम अनौपचारिक क्षेत्र के लिए अन-उपचारिक ही साबित हुए।

द आॅल इंडिया मैन्यूफैक्चरर्स आॅर्गनाइजेशन के एक सर्वे के मुताबिक आठ नवंबर, 2016 की रात लागू की गई नोटबंदी के कारण 31 दिसंबर, 2016 तक ही असंगठित क्षेत्र में साठ फीसद श्रमिक बेरोजगार हो गए थे, और छोटे कारोबारों, दुकानों और सूक्ष्म उद्यमों के राजस्व में सैंतालीस फीसद की गिरावट आ गई थी। अनौपचारिक क्षेत्र को औपचारिक बनाने का सरकार का दूसरा बड़ा कदम वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) था। जुलाई 2017 में जीएसटी लागू होने के परिणामस्वरूप पंजीकृत करदाताओं की संख्या चौसठ लाख से बढ़ कर एक करोड़ बारह लाख हो गई थी।

सरकार ने अपनी पीठ भी थपथपाई कि करदाताओं की संख्या में चालीस फीसद की यह वृद्धि अनौपचारिक क्षेत्र के औपचारिक होने का परिणाम और प्रमाण है। लेकिन इसके बाद जो हुआ, वह अपने आप में डरावना है। तमाम छोटे उद्यम अनुपालन की जटिलताओं के कारण खुद को संभाल नहीं पाए और बंद हो गए। सरकार हालांकि इसे खारिज करती है, क्योंकि इसके पक्ष में कोई अध्ययन और आंकड़ा नहीं है। लेकिन उस दौरान सामने आई बेरोजगारी दर छोटे उद्यमों की बर्बादी का अपने आप में एक आंकड़ा है।

जीएसटी लागू होने के बाद 2017-18 में बेरोजगारी दर पैंतालीस साल के सर्वोच्च स्तर 6.1 फीसद पर पहुंच गई और इसमें लगभग पचहत्तर फीसद योगदान असंगठित क्षेत्र का था। राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण की फरवरी 2019 में लीक हुई एक रपट ने तो इस बेरोजगारी दर को 8.9 फीसद बताया था। नोटबंदी और जीएसटी के बाद ऊपर गई बेरोजगारी दर फिर नीचे नहीं लौटी। कोरोना महामारी ने कोढ़ में खाज का काम किया, जब बेरोजगारी दर चौबीस फीसद तक पहुंच गई।

असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों की किस्मत बदलने के नाम पर कई सारे श्रम कानूनों को खत्म कर चार नई श्रम संहिताएं बनाई गर्इं। मजदूरी पर श्रम संहिता 2019 में ही संसद में पारित हो गई थी। जबकि व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य एवं कामकाजी स्थिति संहिता, सामाजिक सुरक्षा संहिता और औद्योगिक संबंध संहिता कोरोना काल के दौरान सितंबर 2020 में पारित हुर्इं। ये अप्रैल, 2021 से लागू हो चुकी हैं। लेकिन ये असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों की सेहत सुधारने में कहीं से सहायक नहीं हैं। हां, इनसे व्यापार की आसानी सूचकांक और प्रत्यक्ष विदेशी निवेश में देश का दर्जा जरूर सुधर सकता है और इससे संगठित क्षेत्र को लाभ होगा।

वर्ष 2002 से श्रम सुधारों की चल रही कवायद का यह हाल तब है, जब कोरोना महामारी के कारण मार्च 2020 में लागू की गई देशव्यापी बंदी के दौरान बेरोजगार हुए लगभग बारह करोड़ लोगों में से पचहत्तर से अस्सी फीसद असंगठित क्षेत्र से थे। बंदी के दौरान असंगठित श्रमिकों के साथ ही सरकारी नीतियों की दबी-छिपी वास्तविक तस्वीर खुल कर सामने आ गई थी। लेकिन उस तस्वीर को बदलने के लिए बनाए गए चारों कानून उसे कहीं स्पर्श तक नहीं करते।

प्रवासी मजदूरों, खेतिहर मजदूरों, स्वरोजगारी, दिहाड़ी मजदूरों सहित असंगठित क्षेत्र के अधिकांश श्रमिक इन कानूनों के दायरे से ही बाहर हैं। संविधान ने हर श्रमिक को सामाजिक सुरक्षा का अधिकार दे रखा है। लेकिन सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020 के दायरे में सिर्फ वही इकाइयां, कार्यस्थल या संस्थाएं हैं, जहां दस या इससे अधिक मजदूर काम कर रहे हों। हैरान करने वाली बात यह है कि सामाजिक सुरक्षा संहिता के तहत जिस कोष का प्रावधान किया गया है, 2021 के बजट में उसके लिए कोई आबंटन ही नहीं किया गया।

आर्थिक मंदी और आपदा की स्थिति में बेरोजगारी की पहली और सबसे बड़ी मार असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों को झेलनी पड़ती है। महामारी की दूसरी लहर ने इस क्षेत्र पर एक बार फिर से ताले लगा दिए हैं। सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी (सीएमआइई) के अनुसार, अलग-अलग राज्यों में लागू सख्त पाबंदियों के कारण अकेले अप्रैल महीने में पचहत्तर लाख लोग बेरोजगार हो गए हैं। इसमें तीन चौथाई हिस्सा असंगठित क्षेत्र का है। इस साल अप्रैल में बेरोजगारी दर आठ फीसद पर पहुंच गई। यह संकट और गहराने की आशंका है। रोजगार के अभाव में असंगठित श्रमिकों के भूख से भी मरने की नौबत आ पहुंची है। ऐसे में हर गरीब को दो महीने पांच किलोग्राम मुफ्त अनाज, संगठित क्षेत्र के राज में असंगठित क्षेत्र का एक ऐसा प्रजारूप है, जो अत्यंत पीड़ादायक है।

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