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राजनीतिः क्यों धधक रहे हैं जंगल

यों जंगलों में आग अमूमन हर साल लगती है। पर आग बुझाने की एहतियाती रणनीति बना ली जाए तो आग से होने वाली क्षति कम की जा सकती है। जब तक वन संरक्षण अधिनियम में संशोधन कर वनों के प्रबंधन में आमजनों की भागीदारी नहीं बढ़ाई जाएगी, तब तक कोई भी इंतजाम वनों को आग से नहीं बचा सकता है।

Author May 7, 2016 1:59 AM
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ममता सिंह

वनाग्नि से उत्तराखंड के जंगल ही नहीं धधक रहे हैं, बल्कि भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संस्थान (इसरो) और आर्यभट््ट प्रेक्षण शोध संस्थान (एरीज) के अध्ययनों से पता चलता है कि जम्मू-कश्मीर से लेकर पूर्वोत्तर राज्यों तक देश के उत्तरी हिस्सों के जंगल आग की चपेट में हैं। इसरो ने तो केंद्र व उन राज्यों की पोल खोल दी है जो जंगलों में लगी आग की असलियत छिपाने का प्रयास कर रहे हैं। उपग्रह और वन विभाग के आंकड़ों में काफी फर्क दिखा है।

दरअसल, चौबीस घंटों के भीतर उपग्रह से दो बार लिये गए चित्रों ने प्रमाणित कर दिया है कि आग बुझाने में न तो केंद्र और न ही राज्य की एजेंसियां कारगर हो पाई हैं। वहीं, एरीज के शोध ने उपग्रह चित्रों के हवाले से साफ कर दिया है कि केवल उत्तराखंड के जंगल नहीं, बल्कि उत्तर भारत के तेरह राज्यों में आग की लपटें और वायुमंडल में धुंध व धुएं की गहरी चादर साफ दिख रही है, जो अपने आप में खतरनाक संकेत है। आग का दुष्प्रभाव ग्लेशियरों पर भी दिखने लगा है। ब्लैक कार्बन ग्लेशियरों तक पहुंच चुका है। हिमनद विशेषज्ञ बताते हैं कि इससे ग्लेशियरों के पिघलने की गति बढ़ेगी और पूरा जल-चक्र प्रभावित होगा।

गोविंद वल्लभ पंत इंस्टीट्यूट आॅफ हिमालयन इन्वायर्नमेंट ऐंड डेवलपमेंट की मानें तो वनाग्नि के कारण उत्तर भारत के तापमान में करीब 0.2 डिग्री सेल्सियस की बढ़ोतरी हुई है जिसका असर अगले मानसून पर भी पड़ने का अंदेशा है। जंगलों में आग के असर से वायुमंडल में 1 से 12 फीसद तक प्रदूषण बढ़ा है। यह असर उत्तराखंड तक सीमित नहीं है, बल्कि इसकी चपेट में पूर्वी उत्तर प्रदेश, दिल्ली, हिमाचल प्रदेश व जम्मू कश्मीर जैसे राज्य भी शामिल हैं। वैज्ञानिक मानते हैं कि इन राज्यों के बाशिंदों के स्वास्थ्य पर भी इसका असर पड़ेगा। आग की वजह से धुआं व धुंध छा गई है जिससे सांस लेने में परेशानी हो सकती है। सांस के मरीजों की संख्या में इजाफा हो सकता है। इसके अतिरिक्त केंद्रीय भूजल बोर्ड के वैज्ञानिकों की मानें तो भूजल का स्तर प्रभावित होगा। आग से जमीन में दरारें बंद हो जाती हैं। बारिश के पानी को सोखने की क्षमता वाली वनस्पतियां व घास जलने से पानी जमीन के भीतर नहीं जा पाता है।

इससे जल-स्रोत के सूखने का खतरा बढ़ जाता है। देश में हर साल लगभग पैंतीस टन जैविक र्इंधन यानी बायोग्राफ जलाया जाता है। केवल उत्तराखंड की बात की जाए तो फिलहाल चालीस किलोमीटर फायर लाइन निष्क्रिय हैं, जबकि जरूरत केवल उत्तराखंड में नब्बे किलोमीटर फायर लाइन की है। बमुश्किल डेढ़ हजार फायर लाइन ठीक-ठाक स्थिति में हैं। वैसे आग पर अंकुश लगाने के लिए फायर लाइन का सशक्त होना जरूरी होता है। असल में, यह लाइन नालियों की तरह वनक्षेत्रों में फैली रहती है। जब भी जंगलों में आग लगती है तो ये लाइनें उस पर अंकुश लगाने का काम करती हैं।

उत्तराखंड ही नहीं, देश के अन्य राज्यों के जंगलों में भी अमूमन आग के मामलों में कुदरत के बजाय इंसानी हरकतें ज्यादा देखी गई हैं। बीते दस वर्षों में उत्तराखंड, झारखंड, मध्यप्रदेश, हिमाचल प्रदेश के जंगलों में लगी आग पर किए गए अध्ययनों से पता चलता है कि हर साल औसतन छह हजार से नौ हजार हेक्टेअर वन जले हैं। इससे उपजाऊ मिट््टी का कटाव तेजी से होता है, साथ ही जल संभरण का काम भी प्रभावित होता है।
मार्च से लेकर जून के अंतिम सप्ताह तक का समय वनाग्नि काल कहलाता है। विशेषकर पर्वतीय राज्यों में साठ से सत्तर फीसद हिस्से में वन हैं। लेकिन अब तक किसी भी राज्य में स्वत: सूचना प्रणाली विकसित नहीं हो पाई है, ताकि उपग्रह के जरिये सूचना ‘फॉरेस्ट सर्वे आॅफ इंडिया’ के साथ ही वन विभाग तक पहुंचाई जा सके। हालांकि हाल के दिनों में मध्यप्रदेश व हिमाचल प्रदेश की सरकारों ने स्वत: सूचना प्रणाली विकसित करने का दावा जरूर किया है।

चौंकाने वाली बात यह है कि पर्वतीय राज्यों के वनक्षेत्रों के तीस फीसद हिस्से में आग बुझाने की कोई ठोस व्यवस्था नहीं है। उत्तराखंड में कुल वनक्षेत्र का सत्तर फीसद रिजर्व वनक्षेत्र ही वन विभाग के अधिकार व नियंत्रण में है। बाकी बचे तीस फीसद वन सिविल फॉरेस्ट के रूप में हैं। असल में आग को फैलाने में चीड़ के पेड़ काफी मददगार होते हैं। अकेले उत्तराखंड की बात की जाए तो यहां पर पैंतालीस हजार हेक्टेयर भूमि पर अकेले चीड़ के जंगल हैं। मार्च से लेकर जून तक चीड़ के पेड़ से नुकीली गुच्छेदार पत्तियां (पिरुल) गिरती हैं। भारतीय वन संस्थान के अध्ययन के मुताबिक, एक हेक्टेअर क्षेत्र में फैले चीड़ के पेड़ों से साल भर में सात टन पिरुल गिरती हैं। चीड़ के जंगलों में मिश्रित वनों की तुलना में बहुत कम नमी होती है। इसलिए भी इन जंगलों में आग तेजी से फैलती है। चीड़ से हो रहे लगातार नुकसान के चलते उत्तराखंड समेत कई राज्यों ने चीड़ के पेड़ों के कटान की अनुमति मांगी है लेकिन अब तक भारत सरकार की हरी झंडी नहीं मिली है।

गरमी के दिनों में पूर्वोत्तर राज्यों तथा झारखंड, उत्तराखंड, छत्तीसगढ़, ओड़िशा व महाराष्ट्र समेत देश के अन्य राज्यों में जंगलों में आग लगने की घटनाएं बढ़ जाती हैं। जंगलों में आग लगने से पेड़-पौधों समेत जीव-जंतु व पशु-पक्षी सर्वाधिक प्रभावित होते हैं। उत्तराखंड व असम जैसे राज्यों में नए कृषिक्षेत्रों के निर्माण, नई घास उगने, पेड़ काट कर उसके निशान मिटाने के मकसद से लोग जंगलों में आग लगा देते हैं। वहीं झारखंड और छत्तीसगढ़ में तेंदूपत्ता तोड़ने व महुआ चुनने के चक्कर में जंगलों में आग लगाई जाती है जिसका असर जंगली वृक्षों के साथ ही विभिन्न प्रकार की औषधीय पौधों तथा जड़ी-बूटियों पर भी पड़ता है।

जंगल में भयंकर आग से पक्षियों के जान गंवाने के साथ ही साथ उनके अंडों को भी क्षति पहुंचती है। देश में बानवे फीसद से अधिक वनक्षेत्र सरकार के नियंत्रण में हैं इसलिए वन आग प्रबंधन योजना शुरू करने की जरूरत है। राष्ट्रीय वन नीति में भी इस बात का जिक्र है कि वनों की सुरक्षा के लिए अत्याधुनिक उपकरण लगाए जाएं। इसके अलावा जंगल में आग लगने की घटनाओं का ब्योरा व अन्य आकलन स्पष्ट होना चाहिए। इसके बावजूद वन विभाग आंकड़ा छिपाता है।

उत्तराखंड में लगी आग को बुझाने के लिए हेलिकॉप्टर का इस्तेमाल किया गया। दो एमआई-17 बरेली से मंगाये गए, लेकिन र्इंधन न होने की वजह से ये सात घंटे तक उड़ान नहीं भर पाए। वैसे भी वन एवं पर्यावरण विशेषज्ञ मानते हैं कि आग बुझाने के लिए हेलिकॉप्टर ही अंतिम विकल्प नहीं है, क्योंकि यह खर्चीला होने के साथ-साथ मौसम की दृश्यता (विजिबिलिटी) पर निर्भर करता है। क्योंकि जब बड़े पैमाने पर आग लगी होती है तो गहरा काला धुआं और धुंध अभियान में बाधक बनता है। वहीं, प्रचुर मात्रा में पानी की बर्बादी भी होती है। वैसे भी दो तिहाई देश आजकल सूखे की चपेट में है और पेयजल संकट से त्राहिमाम मचा हुआ है। फिर, हेलिकॉप्टर से पानी की बौछार कम ऊंचाई से की जाती है जिससे विशेषकर पर्वतीय क्षेत्रों में दुर्घटना की आशंका बनी रहती है।

वर्ष 1995 में उत्तर प्रदेश व हिमाचल प्रदेश में भयंकर आग लगी। उसके बाद केंद्र सरकार ने आरपी खोसला समिति गठित की। समिति ने कई महत्त्वपूर्ण सुझाव दिए, जिनमें जंगलों में पर्याप्त कर्मचारियों की नियुक्ति, धन की कमी को कम करना, चीड़ की सुई जैसी पत्तियों के वैकल्पिक प्रयोग का बढ़ावा दिया जाना, वनक्षेत्र के इर्दगिर्द कम से कम पचास हजार लीटर की क्षमता वाले टैंकों का निर्माण, अत्याधुनिक उपकरणों की व्यवस्था, सेटेलाइट फोन की व्यवस्था, वाहनों की कमी को दूर करने और मृत शाखाओं को गर्मियों के दिनों में काटना भी शामिल है। सुझावों में खास बात यह रही कि आग बुझाने के लिए स्थानीय लोग आएं या न आएं, जंगल से लकड़ी लेने का उनका अधिकार बना रहना चाहिए। लेकिन इन सुझावों की ओर ध्यान ही नहीं दिया गया।

वर्ष 2001 में वैज्ञानिकों ने केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय को जंगलों को आग से बचाने के लिए कई महत्त्वपूर्ण सुझाव दिए थे जिनमें वन रक्षक (फॉरेस्ट गार्ड) को विशेष प्रशिक्षण तथा आस्ट्रेलिया व अमेरिका की तर्ज पर अग्निशमन की व्यवस्था लागू करना शामिल था। लेकिन जमीन पर कोई पहल नहीं हुई। वर्ष 2015 में भी केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय ने एक समिति बनाई थी जिसकेसामने मुख्य मुद््दा जंगलों में लगने वाली आग व जीव-जंतुओं की सुरक्षा से संबंधित था। समिति की रिपोर्ट अब तक नहीं आई है।

अमेरिका व आस्ट्रेलिया के जंगलों में भी आग लगने की घटनाएं होती हैं। लेकिन वहां रोजाना ताजातरीन स्थिति की सूचना सरकारी वेबसाइट पर देने के अलावा मौसम विज्ञान ब्यूरो की तरफ से घटते-बढ़ते तापमान, हवा की गति और आर्द्रता में कमी के बारे में नियमित रूप से जानकारी मुहैया कराई जाती है।

यों जंगलों में आग अमूमन हर साल लगती है। पर आग बुझाने की रणनीति एहतियातन बना ली जाए तो आग से होने वाली क्षति कम की जा सकती है। इसके लिए सबसे जरूरी यह है कि वन संरक्षण अधिनियम, 1980 की समीक्षा की जाए। जब तक वन कानून में संशोधन कर वनों के प्रबंधन में आमजनों की भागीदारी नहीं बढ़ाई जाएगी, तब तक कोई भी इंतजाम वनों को आग से नहीं बचा सकता है।

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