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राजनीतिः साहित्य की सुध लेगा कौन

आज साहित्यकार केंद्रीय और राज्य अकादमियों व्यावसायिक संस्थाओं से आस लगाए बैठे हैं। उनसे प्राप्त पुरस्कारों, सम्मानों से अभिभूत हैं। गुटबंदी में मशगूल हैं। उन्हें इस बात की कोई चिंता नहीं कि उनके पाठक सिमटते जा रहे हैं, वरना वे पाठकों तक पहुंचने के लिए महज प्रकाशकों और सरकारी तंत्र पर निर्भर नहीं रहते। इसके लिए कुछ गंभीर उपाय सोचते।

प्रतीकात्मक तस्वीर

यह ऐसा दौर है, जब व्यक्तिवादी प्रवृत्तियों ने जीवन की सामुदायकिता को दरकिनार कर दिया है। मध्यवर्ग में पढ़ने की प्रवृत्ति बहुत कम दिखाई देती है। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के विकास के साथ अधिसंख्य लोग पढ़ने के बजाय देखने की इच्छा रखते हैं। यही वजह है कि सूचना माध्यमों पर चित्रात्मक और मनोरंजन कर सकने वाली सूचनाओं का प्रसारण प्रमुख होता गया है। मोबाइल युग में सूचनाएं इसी रूप में अधिक आने लगी हैं। महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों में हिंदी साहित्य पढ़ने वाले विद्यार्थी प्राय: वही पढ़ते हैं, जो उनके पाठ्यक्रम में होता है। पाठ्येतर साहित्य पढ़ने की इच्छा बहुत कम में रह गई है। बहुत कम ऐसे विद्यार्थी निकलते हैं, जो पाठ्यक्रम के अलावा साहित्य पढ़ते हैं, साहित्यिक पत्र-पत्रिकाएं पढ़ते हैं। ऐसे विद्यार्थी जिनको किसी प्रतियोगिता वगैरह की परीक्षाओं में बैठना होता है, वे ज्यादातर सूचनात्मक सामग्री, वह भी अंगरेजी माध्यम से पढ़ते हैं। उनके पाठ्यक्रम में जो किताबें हैं, अगर उन्हें उनसे इतर कुछ अच्छी किताबें मिलती हैं, तो कभी-कभार ही पढ़ते हैं।

संख्या की दृष्टि से पहले की तुलना में पाठकों में बढ़ोतरी अवश्य हुई है, पर असल में यह बढ़ोतरी हुई है गैर-साहित्यिक पाठकों की संख्या में। साहित्य के लिए यह संख्या वृद्धि बहुत महत्त्वपूर्ण नहीं है। साहित्य की तो असल वृद्धि होती है पढ़ने वालों के सुगठित समुदाय के रूप में। ऐसा समुदाय जो शहरों में अड््डेबाजी के लिए कहीं बैठता है तो बात करता है कि भाई, आज क्या पढ़ा। कुछ गोष्ठियां आयोजित करते हैं। साहित्य के पठन-पाठन के लिए महत्त्व छोटे-छोटे हर कस्बे और शहर का है। दरअसल, इस बात का संबंध उस पाठक समुदाय से है, जो साहित्य को जीवित रखता है और जो साहित्यकारों को खुराक भी पहुंचाता है, वह समाज संख्या की दृष्टि से बहुत बड़ा नहीं होता।

हालांकि हम देखते हैं कि साहित्य और साहित्यकारों की दुनिया भी दुराग्रहों, संकीर्णताओं और गैर-लेखकीय फजीहतों में कम फंसी नहीं लगती। एक समय में हिंदी क्षेत्रों में भक्तिकालीन, रीतिकालीन, आधुनिक, सभी प्रकार की कविताओं को कंठस्थ रखने की परिपाटी थी। स्कूलों में अंत्याक्षरी प्रतियोगिता होती थी, जिसमें ये कविताएं सुनाई जाती थीं। वैसे भी लोग आपस में जब मिल-बैठते थे, तो एक-दूसरे को कविताएं सुनाते थे, उनका अर्थ बताते थे, उन पर बात करते थे। रामचरित मानस का पाठ तो गांवों की साहित्यिक संस्कृति के रूप में चलन में था। इसके अलावा देव, घनानंद, बिहारी, पद्माकर आदि तमाम कवियों को लोग पढ़ते थे, उनकी कविताएं याद रखते थे।

गांवों-कस्बों में अनेक ऐसे छोटे-छोटे समुदाय थे, जो भक्तिकालीन कविताओं यानी तुलसीदास, सूर, कबीर आदि के पदों को गाते थे। कीर्तन मंडलियों की तरह ये समुदाय हर कहीं मौजूद थे। उन्होंने इन कवियों को जीवित रखा। पुराने समय में किताबें आज की तरह नहीं छपती थीं, लोग भी इतने पढ़े-लिखे नहीं थे, लेकिन कविताएं तब भी जीवित थीं। तब श्रुति परंपरा के माध्यम से बहुत सारा साहित्य जीवित बचा रहा।
उन्नीसवीं शताब्दी के अंत और बीसवीं शताब्दी के शुरू में बड़े शहरों में भी ऐसे लोग हुआ करते थे, जो अनौपचारिक रूप से साहित्यिक विचार-विमर्श के लिए बैठकी करते थे।

आज की तरह नहीं कि अखबार में खबर छप जाए इसलिए साहित्यिक विषयों पर चर्चा करते थे, बल्कि वे बिना इसकी परवाह किए नियमित मिलते थे। समाचार-पत्रों में दैनिक सूचनाओं के साथ गंभीर लेख, साहित्य से जुड़े लेख, अग्रलेख और संपादकीय छपते थे। मगर आज समाचार-पत्रों से साहित्य पूरी तरह नहीं, तो लगभग गायब हो चुका है। साहित्य, कला, संस्कृति, नाटक, विज्ञान और गणित की कोई चर्चा या महत्त्वपूर्ण खबर इनमें नहीं आ पाती। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में तो जैसे इनका प्रवेश भी वर्जित है, क्योंकि इनसे सनसनी नहीं पैदा होती, इसलिए उनकी टीआरपी बढ़ने की भी कोई गुंजाइश नहीं होती।

एक जमाना था, जब हिंदी की साहित्यिक पुस्तकों के प्रकाशन की दुनिया में इलाहाबाद का बोलबाला था। मुंशी प्रेमचंद और रवींद्रनाथ ठाकुर से लेकर मैथिलीशरण गुप्त, रघुपति सहाय फिराक गोरखपुरी, उपेंद्रनाथ अश्क, महादेवी वर्मा, सुमित्रनंदन पंत, निराला, मार्कंडेय और अमरकांत जैसे अनेक नामीगिरामी साहित्यकारों की रचनाएं यहीं से प्रकाशित हुआ करती थीं। लेकिन समय की बदलती रफ्तार ने बहुत कुछ बदल डाला और इलाहाबाद में प्रकाशन व्यवसाय देखते ही देखते बर्बादी के कगार पर पहुंच गया। साहित्यिक कृतियों के प्रकाशन के क्षेत्र में कभी केंद्रीय भूमिका निभाने वाले इलाहाबाद के स्थान पर आज दिल्ली काबिज हो गई है।

बनारस का भी यही हश्र हुआ। साहित्य प्रेमियों के जेहन में आज भी हलाहाबाद के इंडियन प्रेस, लीडर प्रेस, माया प्रेस, सरस्वती प्रेस, हंस प्रकाशन, साधना प्रकाशन, किताबिस्तान, नीलभ प्रकाशन, धारा प्रकाशन, लॉ जर्नल प्रेस, भारती भंडार, छात्र हितकारी प्रकाशन, संगम प्रकाशन, साधना सदन और चित्रलेखा प्रकाशन सरीखी प्रकाशन संस्थाओं का नाम है। प्रकाशन की दुनिया में लाला रामनारायण लाल बुकसेलर ने भी काफी शोहरत और दौलत कमाई। मगर इनमें से अधिकतर संस्थान समय के साथ नहीं चल पाए। जो प्रकाशन संस्थान बचे भी हैं, वे किसी प्रकार अपना वजूद बचाने की कोशिश कर रहे हैं और वे कमोबेश सरकारी खरीद के भरोसे अपना अस्तित्व बचाए हुए हैं। अब प्रकाशन व्यवसाय दलाली का धंधा बन चुका है। आज प्रकाशक लेखकों से किताब छापने के लिए मनमाने पैसे वसूलते हैं और डेढ़-दो सौ पुस्तकें छाप देते हैं।
अब लेखक पैसे देकर किताबें छपवा रहे हैं। अपने खर्चे से उनका विमोचन करा रहे हैं। दिल्ली के पुस्तक मेले के समय हजारों किताबों का विमोचन होता है। आज समकालीन साहित्य के पाठक समुदाय की जांच केवल हिंदी में प्रकाशित होने वाली पत्रिकाओं की पाठक संख्या के आधार पर ही की जा सकती है। इसके अलावा जानने का कोई साधन नहीं है। कुछ संस्थाएं हैं, जिनमें कभी-कभी बैठक होती है, जिनसे हम अंदाजा लगा सकते हैं कि शायद पूरे हिंदी समाज की यह संख्या कुल मिला कर कुछ लाख में पहुंच सकती है, इससे ज्यादा नहीं। तमाम कोशिशों के बावजूद साहित्य उन लोगों तक नहीं पहुंच पा रहा है, जिनके लिए वह रचा और लिखा जा रहा है। अब स्थिति कुल मिला कर यह हो गई है कि हिंदी में साहित्यिक पुस्तकों का कोई भविष्य ही नहीं है। इस स्थिति में साहित्य के नाम पर लेखन, सृजन आत्मभिव्यक्ति भर है? हिंदी में उत्कृष्ट साहित्यिक पुस्तकों का अभाव नहीं है, मगर वे विभिन्न कारणों से पाठकों तक नहीं पहुंच पाती।

हिंदी भाषाभाषी लोग सालगिरह, विवाह, जन्मदिन आदि मौकों पर आत्म प्रदर्शन के उद्देश्य से इलेक्ट्रिक डेकोरेशन, आतिशबाजी, डीजे, सूट-बूट, गिफ्ट, प्रीतिभोज वगैरह में पचासों हजार रुपए देखते ही देखते बर्बाद कर डालते हैं, मगर वे हजार-पांच सौ रुपए की साहित्यिक पुस्तकें नहीं खरीद सकते। विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रमों में प्रेमचंद, इलाचंद्र जोशी, अमरकांत, निराला, महादेवी वर्मा, रामधारी सिंह दिनकर, नागार्जुन, शमशेर बहादुर सिंह, अज्ञेय आदि रचनाकारों की जो साहित्यिक कृतियां निर्धारित हैं, वे भी छात्रों और शिक्षकों द्वारा खरीद कर नहीं पढ़ी-पढ़ाई जाती और विद्यार्थीगण गाइड खरीद कर वार्षिक परीक्षा की वैतरणी पार करने का जुगाड़ लगाने लगते हैं।

अगर विश्वविद्यालयी पाठ्यक्रम में साहित्यकारों की पुस्तकें निर्धारित न हों तो वे जो अल्प संख्या में बिकती हैं अन्यथा वे भी न बिकें। जिस प्रकार हम अपनी मासिक आय में से बच्चों की फीस, पढ़ाई-लिखाई, दूध, राशन, सब्जी, मकान का किराया, मोबाइल का खर्च, बिजली का बिल वगैरह विभिन्न मदों के लिए अलग रुपया निकाल कर खर्च करते हैं, उसी प्रकार वे साहित्यिक पुस्तकों की खरीदारी के लिए अलग मद क्यों नहीं बनाते?

एक तो हिंदी भाषाभाषियों में वैसे ही साहित्यिक पुस्तकें खरीद कर पढ़ने में दिलचस्पी नहीं है, ऊपर से रही-सही कसर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने पूरी कर दी है। हिंदी साहित्य की पहुंच हमारे समाज के एक प्रतिशत भाग में भी नहीं है। यह दायरा लगातार सिकुड़ रहा है। घरेलू महिलाओं और बच्चों की दिलचस्पी पत्र-पत्रिकाओं और पुस्तकों के बजाय अब टीवी चैनलों के धारावाहिकरों, टीवी गेम, मोबाइल गेम और कंप्यूटर गेम्स में हो गई है, जिससे आम पाठकों की तादाद में और गिरावट आ गई है।

सरकारी खरीद में धांधली, कमीशनखोरी, जोड़-जुगत और मुनाफे के गुणा-गणित से प्रकाशन जगत को काफी नुकसान पहुंचा है। सरकारी खरीद में व्याप्त अराजकता के आगे उनका टिके रहना आसान नहीं रहा। इस स्थिति के लिए सरकारी नीतियां भी कम दोषी नहीं। पुस्तकें खरीद कर लाइब्रेरियों में जमा कर दी जाती हैं। असल में यह स्थिति उन साहित्यिक पुस्तकों से जुड़ी हैं, जिनके माध्यम से हम जन जागरूकता की उम्मीद करते हैं। आवश्यकता इस बात की है कि साहित्यिक पुस्तकों के प्रकाशन और प्रचार-प्रसार के लिए सरकारी और गैर-सरकारी स्तर पर प्रयास किए जाने चाहिए और यह ध्यान रखा जाए कि साहित्यिक पुस्तकों का दाम इतना अधिक न हो कि वह पाठकीय क्रय शक्ति और जनसाधारण की पहुंच के बाहर हो। जन-जन में साहित्यिक रुचि के स्फुरण की आवश्यकता है और इसके लिए पुस्तक प्रकाशकों, सामाजिक संस्थाओं और शिक्षण संस्थाओं को शहर और कस्बों में शिविर और पुस्तक प्रदर्शनी का आयोजन कर आम लोगों में पुस्तकों के प्रति आकर्षण बढ़ाया जा सकता है।

आज आलम यह है कि साहित्यकार केंद्रीय और राज्य अकादमियों, दूरदर्शन, सरकारी और अर्द्ध-सरकारी संस्थानों, व्यावसायिक संस्थाओं से आस लगाए बैठे हैं। उनसे प्राप्त पुरस्कारों, सम्मानों से अभिभूत हैं। अपनी-अपनी साहित्यिक दुकानें चला रहे हैं, गुटबंदी में मशगूल हैं। उन्हें इस बात की कोई चिंता नहीं कि उनके पाठक सिमटते जा रहे हैं, वरना वे पाठकों तक पहुंचने के लिए महज प्रकाशकों और सरकारी तंत्र पर निर्भर नहीं रहते, बल्कि इसके लिए कुछ गंभीर उपाय सोचते।

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