ताज़ा खबर
 

कैसे दूर होगी गरीबी

कौन गरीब है, कुल कितने गरीब हैं, कहां गरीब चिन्हित किए जाते हैं, गरीबी का आंकड़ा बढ़ रहा है या घट रहा है, और अंतत: गरीब होना क्या मायने रखता है, ये कुछ ऐसे अनुत्तरित प्रश्न हैं जिनका उत्तर ढूंढ़े जाने की जरूरत है। गरीब कभी अपनी गरीबी के लिए स्वयं जिम्मेदार नहीं होता, बल्कि वह समाज में व्याप्त असमानताओं और अवसरों के अभाव का शिकार है।

Author June 17, 2019 1:32 AM
विश्व के आधे से ज्यादा गरीब दक्षिण एशियाई देशों में रहते हैं।

बिभा त्रिपाठी

आज के विकृत पूंजीवादी वैश्विक परिदृश्य में गरीबी एक सापेक्ष शब्द हो चुका है। भारत को सदा से ही एक गरीब देश की संज्ञा से नवाजा जाता रहा है। इससे ऊपर यदि दक्षिण एशियाई देशों तक गरीबी को विस्तारित किया जाए तो आंकड़े बताते हैं कि विश्व के आधे से ज्यादा गरीब दक्षिण एशियाई देशों में रहते हैं। इसीलिए ‘साउथ एशिया अलायंस फॉर पावर्टी इरेडिकेशन’ की साधारण महासभा के प्रथम सम्मेलन में श्रीलंका के प्रतिनिधि ने अपने उद्घाटन भाषण में कहा था कि हम गरीब नहीं हैं, यह तो सदैव पश्चिम की ओर से ही कहा जाता रहा है कि हम गरीब हैं। कहने का तात्पर्य है कि गरीबी को परिभाषित और निर्धारित करने के वैश्विक एवं राष्ट्रीय प्रयासों से गरीबों का कोई लेना-देना नहीं है। चाहे तेंदुलकर कमेटी द्वारा खरीद क्षमता के आधार पर परिभाषित गरीबी हो या फिर डा. रंगराजन समिति द्वारा परिभाषित गरीबी हो, लब्बोलुआब यह है कि क्या गरीबी रेखा के ऊपर की सारी आबादी खुशहाल है, संपन्न है? संतुष्ट है? और यदि नहीं तो फिर इस हाय-हाय, किच-किच का क्या मतलब है?

अगर विश्व के समृद्धतम देश संयुक्त राज्य अमेरिका की चर्चा होती है तो आम धारणा यह बनती है कि यह देश न सिर्फ सर्वशक्तिशाली है, वरन सबसे समृद्धशाली भी है। परंतु गरीबी का दुष्चक्र वहां भी अर्थशास्त्रियों की नाक का नकेल बनता है। करोड़ों अमेरिकी रोटी, कपड़ा और मकान जैसी मूलभूत सुविधाओं से वंचित हैं। बाजारवाद के चरमोत्कर्ष के इस काल में ऐसे करोड़ों लोगों के साथ शिक्षा, रोजगार, व्यवसाय, स्वास्थ्य एवं सुरक्षा के नाम पर गहरे विभेद का सामना करना पड़ता है। कौन गरीब है, कुल कितने गरीब हैं, कहां गरीब चिन्हित किए जाते हैं, गरीबी का आंकड़ा बढ़ रहा है या घट रहा है, और अंतत: गरीब होना क्या मायने रखता है, ये कुछ ऐसे अनुत्तरित प्रश्न हैं जिनका उत्तर ढूंढ़े जाने की जरूरत है। गरीब कभी अपनी गरीबी के लिए स्वयं जिम्मेदार नहीं होता, बल्कि वह समाज में व्याप्त असमानताओं और अवसरों के अभाव का शिकार है। हालांकि कई अर्थशास्त्रियों का मानना है कि गरीब, सुस्त और आलसी होते हैं और उनका वर्तमान जीवन स्तर उन्हें गरीब बनाए रखता है। अत: गरीबी उन्मूलन हेतु जब भी नीतियों एवं कार्यक्रमों का निर्धारण करना हो, उक्त तथ्यों को ध्यान में रखना नीतिगत सफलता की एक पूववर्ती शर्त मानी जाएगी। गरीब और अमीर का निर्धारण करने वाली गरीबी रेखा कितने तर्कसंगत आधारों पर निर्मित की जाती है, यह प्रश्न अभी तक अनुत्तरित है। चूंकि गरीबी का एक गंभीर दुष्परिणाम शक्तिविहीनता भी है जिसमें एक गरीब को असहाय और बेचारा माना जाता है। उसके साथ भेदभाव पूर्ण व्यवहार किया जाता है। परिणामस्वरूप उसके शरीर, मन और जीवन पर गरीबी की काली छाया मंडराती रहती है और वह असमय ही काल का ग्रास बन जाता है। गरीब की दशा पर राजनीति की रोटी सेंकने वालों की अपनी अलग ही दुनिया है। एक राजनेता का यह बयान कि ‘गरीबी एक मानसिक दशा है’, विचारणीय है। ऐसे बयानों से जे़हन में यह लाइन सहसा ही आ जाती है कि ‘एक शहंशाह ने बनवा के हसीं ताजमहल हम गरीबों का उड़ाया है मजाक।’ निहितार्थ यह है कि हमने गरीब और गरीबी को समझा तो बहुत, लेकिन उसे दूर करने की जगह इसे हास्य और व्यंग्य का, हंसी-ठिठोली का विषय बना डाला। कभी हृदयविदारक, मर्माहत करने वाली कविता के माध्यम से तो कभी उदारवादी आर्थिक नीतियों के क्रियान्वयन से।

मूल रूप से सामाजिक संरचना, सांस्कृतिक लक्ष्य, संस्थागत साधनों का अभाव और सरकारी नीतियां ही कमोवेश रूप से गरीबी के मूल कारक है। अत: इनमें जब तक सुधार नहीं होगा तब तक चाहे उत्तर प्रदेश का संदर्भ हो, चाहे अमेरिका या इंग्लैंड का, गरीबों की दशा में सकारात्मक परिवर्तन संभव नहीं है। गरीबी को मानव अधिकारों के उल्लंघन का कारण एवं प्रभाव दोनों माना जाता है। इसलिए मानव अधिकारों एवं मौलिक अधिकारों के साथ राज्य के नीति-निर्देशक तत्त्व संबंधी समस्त दस्तावेजी प्रावधानों को गरीबों की दशा के संदर्भ में उद्धरित किया जाता है। सर्वोच्च न्यायालय द्वारा न्याय की विशुद्ध विधिक व्याख्या को ‘सामाजिक न्याय’ की तरफ केंद्रित करने की मंशा का भान उसके द्वारा बंधुआ मजदूरी, बाल श्रमिक, असंगठित श्रमिक, परिव्रजन करने वाले श्रमिक, शरणार्थी, वेश्या इत्यादि के संदर्भ में दिए गए निर्णयों से होता है। नीतियों एवं कार्यक्रमों के क्रम में देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू के अनुसार भारत की सेवा का तात्पर्य करोड़ों पीड़ित व्यक्तियों की सेवा से है। नीतियां ऐसी हों जो गरीबी, अज्ञानता, बीमारी एवं अवसरों की असमानता को खत्म करने वाली हों, जिनसे हर व्यक्ति की आंख का आंसू पोछा जा सके। ‘गरीबी हटाओं’ और ‘गरीबी उन्मूलन’ जैसे नारों के अन्तर्गत विभिन्न पंचवर्षीय योजनाएं बनाई गर्इं और राष्ट्रीय रोजगार कार्यक्रम, मनरेगा, अंत्योदय, जननी सुरक्षा योजना, प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना, बाल्मीकि आंबेडकर योजना, स्वर्ण जयंती ग्राम स्व-रोजगार योजना जैसी तमाम योजनाओं को सरकार के द्वारा संचालित किया गया है।

गरीबी उन्मूलन के लिए सबसे जरूरी है कि इसके सकारात्मक प्रयासों को चरणबद्ध तरीके से चलाया जाना चाहिए। मसलन, सबसे पहले बच्चों के लिए शिक्षा एवं उद्यमिता प्रशिक्षण का कार्यक्रम चलाना चाहिए। माता-पिता को योग्यतानुसार विभिन्न लघु उद्योगों में प्रशिक्षण प्रदान कर उन्हें स्वाबलंबी बनाने की दिशा में कार्य करना चाहिए। जन्म एवं मृत्यु का अनिवार्य पंजीकरण करवा कर उन्हें सामाजिक सुरक्षा की गारंटी प्रदान करनी चाहिए। इसके अलावा अन्य ऐसे सभी उपाय जो विकल्प के रूप में अब तक सुझाए गए हैं, उनका छोटे-छोटे समूहों पर प्रयोग करना चाहिए और प्राप्त निष्कर्षों के आधार पर उनका आगे क्रियान्वयन करना चाहिए। सबसे महत्त्वपूर्ण एवं कारगर कदम के रूप में कुपोषण निवारण योजनाओं को लागू किए जाने की जरूरत है। यदि पूरा देश एकजुट होकर गरीबी उन्मूलन के लिए उसी प्रकार से आंदोलित हो जाए, जैसा कि स्वाधीनता संग्राम के दौरान हुआ था तो वह दिन दूर नहीं जब उत्तर प्रदेश से अमेरिका तक पूरा विश्व यह भूल जाएगा कि गरीबी रेखा नाम की भी कोई चीज होती है। गरीबी को परिभाषित और पुनर्परिभाषित करने का जो प्रायोजित सरकारी दायित्व निभाया जाता है वह इसलिए क्योंकि सरकार की वास्तविक ढांचागत स्थिति में परिवर्तन संभव नहीं है। गरीबी एक जटिल और दुरूह संकल्पना है। यदि दार्शनिक दृषिटकोण से गरीबी की संकल्पना को समझ कर उसका आकलन किया जाए तो यह बात बखूबी स्पष्ट हो जाती है कि केवल आर्थिक दृष्टिकोण से गरीबी की व्याख्या नहीं की जा सकती, बल्कि उसका विस्तार बहुपक्षीय एवं बहुआयामी है। आज यह कहना कहीं से गलत नहीं है कि यदि हम शिक्षित नहीं है तो भी गरीब हैं, यदि दीक्षित नहीं है तो भी गरीब हैं। यदि नैतिक मूल्यों के अनुगामी नहीं है तो भी गरीब हैं और यदि मजहबी, जातिवादी और संकुचित मानसिकता के पोषक रूढ़िवादी हैं तो भी गरीब हैं। अत: आवश्यकता है आत्मावलोकन की और जब हम सभी अपना आत्मावलोकन करेंगे, तभी गरीबी के बदनुमा दाग को मिटा पाने में कामयाब हो पाएंगे। चुनौती इस बात की है कि विकल्प तलाशा जाए। अन्यथा गरीबों की गरीबी एक ऐसे चक्रवाती तूफान की तरह आएगी जिसमें सब कुछ खत्म हो जाएगा। आवश्यकता इस बात की है कि समय रहते ही हम चेत जाएं और सोच समझ कर नीतियों का निर्धारण करें।

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ लिंक्डइन पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App