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राजनीतिः सबक है केपटाउन का जल संकट

देश में पानी के अधिकांश स्थानीय स्रोत सूख चुके हैं। सैकड़ों छोटी नदियां विलुप्त होने के कगार पर हैं। संरक्षण के अभाव में देश के अधिकांश गांवों और कस्बों में तालाब-कुएं सूख चुके हैं। ज्यादातर जगहों पर गंगा और यमुना अत्यधिक प्रदूषित हैं। इनका पानी पीने लायक नहीं रह गया है। कुल मिला कर देश में जल संकट और जल संरक्षण को लेकर बहुत ज्यादा संजीदगी दिख नहीं रही।

भू-जल के भारी दुरुपयोग की वजह हमारा मौजूदा कानून भी है, जिसमें लोग जितना चाहे उतना जल निकाल रहे हैं।

भारत में ‘जल ही जीवन है’ मुहावरा काफी प्रचलित है। लेकिन इसका वास्तविक अर्थ देश की अधिकांश आबादी को नहीं पता। लोग पानी के महत्त्व को न ठीक से समझते हैं न ही ठीक से समझना चाहते हैं। पानी के बिना जिंदगी क्या हो जाती है, इसे पिछले कुछ महीनों से केपटाउन में आए भयंकर जल संकट से समझ सकते हैं जहां भयंकर जल संकट की वजह से आपातकाल जैसे हालात हो गए हैं।

वह दिन दूर नहीं जब करीब चालीस लाख की आबादी वाले इस शहर का पानी पूरी तरह से खत्म हो जाएगा। इस दिन को कुछ लोग ‘डे जीरो’ कह रहे हैं। डे जीरो यानी जिस दिन पानी मिलना बिल्कुल बंद हो जाएगा। विशेषज्ञों के अनुसार जल्द ही यह शहर पूर्ण रूप से जलविहीन हो सकता है।

कभी हमेशा पर्यटकों से भरे रहने वाले इस शहर में पानी की किल्लत इस कदर हो गई है कि चाहे बुजुर्ग हों या बच्चे, पानी लेने के लिए रात भर कतार में खड़े रहते हैं। केपटाउन में पिछले तीन साल से बारिश नहीं हुई। इस कारण शहर के लगभग सारे जल स्रोत सूख चुके हैं। जो बचे हैं, उनसे बहुत ही सीमित मात्रा में पानी की आपूर्ति की जा रही है। सरकार ने जल वितरण के सार्वजनिक स्थानों पर सुरक्षा बलों को तैनात कर रखा है।

केपटाउन के जल संकट से भारत जैसे देशों को सीख लेने की जरूरत है। हमारे देश में भी कई शहर गंभीर जल संकट से गुजर रहे हैं। पिछले दिनों ‘नेचर कंजरवेंसी’ नाम की एक वैश्विक संस्था ने साढ़े सात लाख से अधिक आबादी वाले पांच सौ शहरों के जल ढांचे का अध्ययन कर यह निष्कर्ष निकाला कि भारत के भी कई शहर गंभीर जल संकट का सामना कर रहे हैं। अगर समय रहते इस समस्या का हल नहीं निकाला तो हालात बेकाबू हो जाएंगे।

देश के कई छोटे और मझोले शहरों के साथ ही दिल्ली, कोलकाता, चेन्नई, बंगलुरु और हैदराबाद जैसे बड़े महानगर भी जल संकट से जूझ रहे हैं। देश में पानी के अधिकांश स्थानीय स्रोत सूख चुके हैं। सैकड़ों छोटी नदियां विलुप्त होने के कगार पर हैं। संरक्षण के अभाव में देश के अधिकांश गांवों और कस्बों में तालाब-कुएं सूख चुके हैं। ज्यादातर जगहों पर गंगा और यमुना अत्यधिक प्रदूषित हैं। इनका पानी पीने लायक नहीं रह गया है। कुल मिला कर देश में जल संकट और जल संरक्षण को लेकर बहुत ज्यादा संजीदगी दिख नहीं रही।

पिछले दिनों संयुक्त राष्ट्र ने विश्व के सभी देशों को चेतावनी देते हुए कहा कि अगर पानी की बर्बादी को जल्द नहीं रोका गया तो दुनिया गंभीर जल संकट का सामना करेगी। दुनिया की आबादी जिस तरह से बढ़ रही है, सबको स्वच्छ पेयजल मुहैया कराना विश्व के सभी देशों खासकर विकासशील देशों के लिए एक चुनौती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्लयूएचओ) के एक अध्ययन के अनुसार दुनिया भर में छियासी फीसद से अधिक बीमारियों का कारण असुरक्षित व दूषित पेयजल है। वर्तमान में सोलह सौ जलीय प्रजातियां जल प्रदूषण के कारण लुप्त होने के कगार पर हैं। विश्व में एक अरब से ज्यादा लोग दूषित पेयजल पीने को मजबूर हैं।

भारत के कई हिस्सों में पेयजल किल्लत का लाभ उठाने के लिए बहुराष्ट्रीय कंपनियां आगे आ गई हैं। कुछ ने जमीन से पानी निकाल कर, तो कुछ ने सामान्य जल आपूर्ति के जरिए मिलने वाले पानी को ही बोतल बंद रूप में बेचना शुरू कर दिया है। देश में बोतल बंद पानी का कारोबार लगातार बढ़ता जा रहा है। निस्संदेह यह कोई खुशखबरी नहीं। तमाम शहरी इलाकों से लेकर ग्रामीण क्षेत्रों तक में औसत गृहणियों का अच्छा-खासा समय पीने का पानी लाने में बर्बाद हो जाता है। पेयजल के मामले में ऐसे चिंताजनक हालात तब हैं जब पानी पर अधिकार जीवन के अधिकार के बराबर है। सरकारों की यह जिम्मेदारी है कि वे हर नागरिक को स्वच्छ पेयजल उपलब्ध कराएं, लेकिन वे इसके लिए सजग नहीं हैं।

भारत में पेयजल संकट बढ़ती आबादी और कृषि की जरूरतों के कारण भी गंभीर होता जा रहा है। करीब पैंसठ-सत्तर प्रतिशत जल कृषि कार्यों में खप जाता है। इसके अलावा उद्योगों को चलाने में भी जल का इस्तेमाल बढ़ता जा रहा है। विडंबना यह है कि न तो उद्योग और कृषि क्षेत्र को अपनी आवश्यकता का पानी उपलब्ध हो पा रहा है और न ही आम आदमी को। इस समस्या से निपटने के लिए सबसे पहले कृषि क्षेत्र में इस्तेमाल हो रहे जल के उपयोग को नियंत्रित करना होगा। फसल के चयन में बदलाव के साथ सिंचाई के आधुनिक तरीकों का इस्तेमाल करना होगा।

बरसाती पानी को संजो कर रखने और गंदे पानी को दोबारा प्रयोग में लाने योग्य बनाने की दिशा में गंभीरतापूर्वक काम करने की जरूरत है। इसी तरह भू-जल को प्रदूषण से बचाने पर भी प्राथमिकता के आधार पर ध्यान देना आवश्यक है। आवश्यकता पड़ने पर समुद्र के जल को सिंचाई के पानी के रूप में इस्तेमाल करने की विधि भी विकसित की जानी चाहिए, लेकिन यह ध्यान रहे कि ऐसी कोई विधि पर्यावरण को क्षति न पहुंचाए।

जल संरक्षण के लिए भारत के विभिन्न आर्थिक, कृषि, पर्यावरणीय और सामाजिक क्षेत्रों ने अपनी-अपनी व्यवस्थाएं विकसित की हैं। अगर इन्हें संरक्षित कर लिया जाए तो कृषि और पीने योग्य पानी की जरूरतें पूरी हो सकती हैं। इसके लिए जल संसाधन के प्रबंधन पर जोर देने की जरूरत है। जल संसाधनों का प्रबंधन स्थानीय लोगों के हाथ में ही होना चाहिए। बड़े केंद्रीयकृत निर्माण और प्रबंधन व्यवस्था लंबे समय तक इसलिए कारगर नहीं हो पाते क्योंकि वे बहुत महंगे साबित होते हैं और उसमें स्थानीय लोगों की भागीदारी नहीं हो पाती।

जल प्रबंधन एक पर्यावरणीय और तकनीकी मुद्दा होने के साथ ही सामाजिक-सांस्कृतिक मुद्दा भी है। लेकिन आधुनिक समाधानों में इसे नजरअंदाज कर दिया गया है। जहां तक संभव हो सके, जल स्रोतों के प्रयोग का प्रबंधन करने वाली सामाजिक संरचनाओं और तंत्रों को आधुनिक तकनीकी समाधानों के साथ जोड़ा जाना चाहिए।

प्रकृति जीवनदायी संपदा जल हमें एक चक्र के रूप में प्रदान करती है। हम भी इस चक्र का एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा हैं। चक्र को गतिमान रखना हमारी जिम्मेदारी है। चक्र के थमने का अर्थ है, हमारे जीवन का थम जाना। प्रकृति के खजाने से हम जितना पानी लेते हैं, उसे वापस भी हमें ही लौटाना है। हम स्वयं पानी का निर्माण नहीं कर सकते। इसलिए प्राकृतिक संसाधनों को दूषित न होने देना हमारी सबसे बड़ी जिम्मेदारी होनी चाहिए।

धरातल पर तीन चौथाई पानी होने के बाद भी पीने योग्य पानी सीमित मात्रा में ही है। उस सीमित मात्रा के पानी का इंसान ने अंधाधुंध दोहन किया है। नदी, तालाबों और झरनों को पहले ही हम जहरीले रसायनों की भेंट चढ़ा चुके हैं। जो बचा-खुचा है उसे अब हम अपनी अमानत समझ कर बहा रहे हैं। संसार इस समय जहां अधिक टिकाऊ भविष्य के निर्माण में व्यस्त है, वहीं पानी, खाद्य और ऊर्जा की पारस्परिक निर्भरता की चुनौतियों का सामना हमें करना पड़ रहा है।

भू-जल के भारी दुरुपयोग की वजह हमारा मौजूदा कानून भी है, जिसमें लोग जितना चाहे उतना जल निकाल रहे हैं। भू-जल संसाधन के इस्तेमाल को लेकर अभी तक कोई स्पष्ट कानूनी ढांचा नहीं बना है। इसे तत्काल बनाने की जरूरत है। आज भारत के ज्यादातर हिस्सों में जल संकट गहराता जा रहा है, लेकिन इस समस्या से निपटने के लिए ठोस कदम उठते नहीं दिख रहे। कहावत है, बूंद-बूंद से सागर भरता है।

अगर इस कहावत को अक्षरश: सत्य माना जाए तो छोटे-छोटे प्रयास एक दिन काफी बड़े समाधान में परिवर्तित हो सकते हैं। आकाश से बारिश के रूप में गिरे हुए पानी को बर्बाद होने से बचाना और उसका संरक्षण करना पानी को बचाने का एक अच्छा पारंपरिक प्रयास हो सकता है। जल संरक्षण के लिए ऐसे ही कई और प्रयास करने पड़ेंगे तभी हम जल संकट से निपट पाएंगे।

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