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चुनौती बनता जल प्रदूषण

विगत कुछ सालों में मौसम परिवर्तन के कारण वर्षा की अनियमित स्थिति, कम वर्षा आदि को देखते हुए उद्योगों को अपनी जल खपत पर नियंत्रण करना सीखना चाहिए। साथ ही दूषित जल का समुचित उपचार कर इसे फिर से उपयोगी बनाया जाना चाहिए, ताकि जलस्रोतों के अत्यधिक दोहन की स्थिति से बचा जा सके।

Riverसांकेतिक फोटो।

प्रदीप श्रीवास्तव

जीवन के लिए वायु के बाद जल ही सबसे जरूरी तत्व है। तमाम मानव सभ्यताओं का विकास नदियों के किनारे हुआ है। सभी बड़े शहर नदियों के किनारे स्थित हैं। लेकिन, विकास की अंधी दौड़ में नदियों को इतनी तेजी से प्रदूषित किया जा रहा है कि अब शहरों को बसाने से ज्यादा नदियों को बचाने की जरूरत पड़ रही है।

अब भी राज्यों और देशों के बीच सबसे ज्यादा झगड़े जल बंटवारे को लेकर होते हैं। आमतौर पर प्रदूषित पानी से होने वाले आर्थिक नुकसान की गणना नहीं की जाती है, लेनिक कुछ रिपोर्टें बताती हैं कि दुनिया को हर साल करीब छियालीस खरब डॉलर का नुकसान प्रदूषण के कारण होता है। यह वैश्विक अर्थव्यवस्था का 6.2 प्रतिशत है। हालांकि, मामूली खर्च से प्रदूषित पानी को साफ करके फिर से उपयोगी बनाया जा सकता है।

दुनिया मानती है कि वाहनों से होने वाले प्रदूषण को कम करने में पेड़-पौधे अहम भूमिका निभाते हैं, क्योंकि ये अपने भोजन बनाने की प्रक्रिया में कार्बन डाइआॅक्साइड सोखते और आॅक्सीजन छोड़ते हैं। यह बात अपनी जगह सही है, लेकिन देहरादून स्थित वन अनुसंधान संस्थान के एक अध्ययन के अनुसार, बढ़ते वायु प्रदूषण से पेड़-पौधों में कार्बन सोखने की क्षमता घट रही है। यही हाल नदियों का हो रहा है। नदियों का मीठापन कम हो रहा है, इसकी सबसे बड़ी वजह जल प्रदूषण है। हृषिकेश में गंगा का पानी काफी मीठा है, जबकि बंगाल में यह पानी प्रदूषित होकर कसैला हो जाता है।

लैंसेट मेडिकल जर्नल की रिपोर्ट के मुताबिक भारत की आबोहवा इतनी ज्यादा दूषित हो गई है कि यह सर्वाधिक मौतों का कारण बन रही है। प्रतिवर्ष करीब तीस लाख लोगों की मौत की वजह प्रदूषण जनित बीमारियां हैं। दुनिया के अन्य किसी देश में इतनी मौतें प्रदूषण के कारण नहीं होती हैं। भारत के बाद चीन का स्थान है। प्रदूषण जनित बीमारियों पर खर्च भी बहुत अधिक है।

भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान नई दिल्ली और इकहान स्कूल आॅफ मेडिसीन के अध्ययन के अनुसार बानबे प्रतिशत मौतें निम्न और मध्य आमदनी वाले देशों में होती हैं। पानी के क्षेत्र में काम करने वाली संस्था वाटर एड की रिपोर्ट के अनुसार भारत में उपलब्ध जल का अस्सी प्रतिशत हिस्सा प्रदूषित है। पानी में इस प्रदूषण का कारण देश में बढ़ता शहरीकरण और उद्योगीकरण है। देश में आबादी का घनत्व भी जल प्रदूषण को बढ़ाने का काम कर रहा है, जबकि पानी के निस्तारण को लेकर सरकारें उदासीन हैं।

वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम की रिपोर्ट के मुताबिक भारत की आर्थिक राजधानी मुंबई में प्रति वर्ग किमी 31,700 लोग रहते हैं। शहरों पर इस तरह से आबादी का बोझ बढ़ना विकास के असंतुलन को दर्शाता है। इस कारण अपशिष्ट पदार्थ नदियों, नहरों, तालाबों और अन्य जलस्रोतों में बहाए जा रहे हैं। इससे जल जीवों और पौधों पर तो बुरा प्रभाव पड़ता ही है, इन स्रोतों का जल पीने योग्य भी नहीं रह जाता।

इसकी सबसे अच्छी बानगी देश की राजधानी में बहने वाली यमुना नदी है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड का मानना है कि जल प्रदूषण में पचहत्तर से अस्सी फीसद भूमिका घरों से सीवेज के जरिए निकलने वाले मल-मूत्र की है।

जल प्रदूषण का दुष्प्रभाव सीधे-सीधे लोगों के स्वास्थ्य पर पड़ता है। ये प्रभाव अल्पकालिक और दीर्घकालिक दोनों तरह के होते हैं। कई बार दूषित जल का उपयोग जानलेवा साबित होता है। कुछ बीमारियां ऐसी हैं जो सीधे प्रदूषित जल से होती हैं, जैसे हैजा, पीलिया, डायरिया, हेपेटाइटिस आदि संक्रामक रोगों की मुख्य वजह दूषित जल है।

जल प्रदूषण का मुख्य स्रोत औद्योगिक और घरेलू इस्तेमाल के बाद निकलने वाला पानी है। ऐसा नहीं कि दूषित जल का उपचार कर प्रदूषण स्तर को कम नहीं किया जा सकता, लेकिन दूषित जल का उपचार करना काफी महंगा है। जबकि, नई जगह से जल निकालना तुलनात्मक रूप से ज्यादा सस्ता होता है। इसी लिए लोग जल के नए भंडार खोजते और उसका दोहन करते हैं।

विगत कुछ सालों में मौसम परिवर्तन के कारण वर्षा की अनियमित स्थिति, कम वर्षा आदि को देखते हुए उद्योगों को अपनी जल खपत पर नियंत्रण करना सीखना चाहिए। साथ ही दूषित जल का समुचित उपचार कर इसे फिर से उपयोगी बनाया जाना चाहिए, ताकि जलस्रोतों के अत्यधिक दोहन की स्थिति से बचा जा सके।

औद्योगिक गतिविधियों से बड़ी मात्रा में दूषित जल उत्पन्न होता है। इस दूषित जल में उपस्थित प्रदूषकों की प्रकृति और मात्रा औद्योगिक उत्पादन के अनुसार अलग-अलग होती है। इनमें से कुछ उद्योगों से निकलने वाला दूषित जल विषैला होता है, जिसके निस्तारण के लिए काफी खर्च की जरूरत होती है, जबकि कुछ उद्योगों का दूषित जल बहुत मामूली खर्च से उपचारित किया जा सकता है। जल प्रदूषण की स्थिति से बचने का सबसे कारगर उपाय यही है कि स्वच्छ जलस्रोतों में प्रदूषित जल को मिलने से रोका जाए और जो जलस्रोत दूषित हो चुके हैं उन्हें फिर से प्रदूषणमुक्त बनाने की योजना पर काम किया जाए।

साथ ही, जलस्रोतों में होने वाली प्रदूषणकारी गतिविधियों जैसे नदियों और तालाबों पर शौच करके गंदा करना, घरों का कचरा डालना, मूर्तियों, पूजन सामग्री का विसर्जन करना और शवों को नदियों में बहाने आदि पर तत्काल अंकुश लगा देना चाहिए। नदियों में बह कर आने वाली गाद, वर्षा के सामान्य बहाव द्वारा बाग-बगीचों खेतों में उपयोग किए जाने वाले रासायनिक खादों-कीटनाशकों के बह कर आने से रोकने के उपायों पर भी विचार किया जाना जरूरी है।

वर्तमान में वर्षा की अनियमित स्थिति, कम वर्षा आदि को देखते हुए उद्योगों को अपनी जल खपत पर नियंत्रण और दूषित जल को उपचारित करने की प्रक्रिया विकसित करके जल का पुन: उपयोग करना चाहिए, ताकि जलस्रोतों के अत्यधिक दोहन की स्थिति से बचा जा सके। प्राकृतिक जलस्रोतों, खासकर नदियों को जल प्रदूषण के दुष्प्रभावों से बचाने का सबसे अच्छा तरीका यही है कि इनमें दूषित जल के निस्तारण को रोका जाए।

साथ ही ऐसे मॉडल अपनाए और प्रोत्साहित किए जाने चाहिए, जो पानी को शुद्ध करते हैं। दूषित जल को उपयोग लायक बनाने के कुछ प्रयोग क्योर संस्था ने किए हैं। द सेंटर फार अरबन एंड रीजनल एक्सेलेंसी का शामली शहर में जल प्रदूषण को रोकने के लिए किया गया प्रयोग सराहनीय है, इससे शहर के खराब पानी को साफ करके सिंचाई योग्य बनाया जाता है।

यह शहर पच्चीस वार्डों में बंटा है। शहर का सारा गंदा पानी नाले के रास्ते कृष्णा नदी में मिलता है। यह नदी हिंडन में जाकर मिलती है, जोकि बाद में गंगा नदी में मिलती है। शहर के बीच में एक चीनी मिल है, जिसका गंदा पानी भी नाले में मिलता है। नगर पालिका के अनुसार प्रतिदिन शहर से करीब पैंतीस एमएलडी प्रदूषित जल नाले में बहता है, जिसके निस्तारण की कोई उचित प्रक्रिया नहीं अपनाई जाती है।

क्योर ने नाले के प्रदूषित पानी के निस्तारण की योजना शुरू की है, जिससे प्रतिदिन करीब बारह हजार लीटर पानी का निस्तारण किया जाता है। इस प्रक्रिया में बहुत कम खर्च आता है, इसलिए आसपास की नगर पालिकाओं ने भी इस मॉडल को अपनाना शुरू कर दिया है। जहां पानी साफ किया जाता है, वहां एक बायोडाईवर्सिटी पार्क भी बनाया गया है, जिसमें नाले के गंदे पानी का निस्तारण करने के बाद इस्तेमाल किया जाता है।

यह दूसरी जगहों के लिए भी नजीर बन सकता है। देश के और भी कई हिस्सों में इस तरह के प्रयोग हो रहे हैं, जो यह दर्शाते हैं कि अगर सामाजिक तौर पर ऐसे प्रयोगों को व्यापक बनाया जाए तो नदियों को प्रदूषित होने से बचाया जा सकता है।

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