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पानी से घिरा प्यासा देश

हमारे देश में सालाना चार हजार अरब घन मीटर पानी उपलब्ध है। इस पानी का बहुत बड़ा भाग समुद्र में बेकार चला जाता है।

Author नई दिल्ली | April 14, 2016 2:34 AM
चित्र का इस्तेमाल सिर्फ प्रतीक के तौर पर किया गया है।

देश में पानी की कमी नहीं है। एक तरफ हिमालय से निकलने वाली नदियां हैं, तो दूसरी तरफ समुद्र से घिरा देश है। फिर भी आधे से अधिक देश प्यासा है। महाराष्ट्र के लातूर और दिल्ली के कुछ हिस्सों में पेयजल का वितरण कानून-व्यवस्था के लिए भी एक चुनौती बन गया है। महाराष्ट्र, राजस्थान, आंध्र प्रदेश, मध्यप्रदेश और उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड में भी पानी का भारी संकट है। दूसरे राज्यों के कई नगरों का भी बुरा हाल है। हमारे यहां पानी का संकट दोहरा है। एक तो कई राज्यों के अधिकतर भागों में पेयजल का संकट है और दूसरी खास बात यह है कि जहां पानी है वह भी पीने लायक नहीं है। कई राज्य सरकारें पानी के इंतजाम का दावा करती रही हैं, पर गरमी आते ही उनका दावा खोखला साबित हो जाता है। इस मद में अब तक लाखों करोड़ रुपए खर्च किए जा चुके हैं। लेकिन यह समस्या ज्यों की त्यों बनी हुई है।

उत्तर भारत के तीन-चार राज्यों की कहानी कुछ अलग है। यहां हर तीसरे साल सूखा और प्राय: हर साल बाढ़ का संकट पैदा हो जाता है। हर साल सरकार युद्ध स्तर पर काम का दावा करती है, पर मामला जहां का तहां अटका हुआ है। अब चुनाव को देखते हुए उत्तर प्रदेश की अखिलेश यादव सरकार को बुंदेलखंड की याद आई है। विश्व बैंक की ताजा रिपोर्ट भूजल संकट की और भी खतरनाक तस्वीर सामने रख रही है। इसमें चेतावनी दी गई है कि जलवायु परिवर्तन और अंधाधुंध जल दोहन का हाल यही रहा तो अगले एक दशक में भारत के साठ फीसद ब्लाक सूखे की चपेट में होंगे। तब फसलों की सिंचाई तो दूर, पीने के पानी के लिए भी मारामारी शुरू हो सकती है।

राष्ट्रीय स्तर पर 5723 ब्लाकों में से 1820 ब्लाकों में जल स्तर खतरनाक पैमाना पार कर चुका है। जल संरक्षण न होने और लगातार दोहन के चलते दो सौ से अधिक ब्लाक ऐसे भी हैं, जिनके बारे में केंद्रीय भूजल प्राधिकरण ने संबंधित राज्य सरकारों को तत्काल प्रभाव से जल दोहन पर पाबंदी लगाने का सुझाव दिया है। लेकिन कई राज्यों में इस दिशा में कोई प्रभावी कदम नहीं उठाया जा सका है। उत्तरी राज्यों में हरियाणा के पैंसठ फीसद और उत्तर प्रदेश के तीस फीसद ब्लाकों में भूजल का स्तर चिंताजनक पैमाने पर पहुंच गया है। वनों की अंधाधुंध कटाई से यह समस्या और गहराई है। लेकिन वहां की सरकारें आंखें बंद किए हुए हैं। इन राज्यों को जल संसाधन मंत्रालय ने अंधाधुंध दोहन रोकने के उपाय भी सुझाए हैं। इनमें सामुदायिक भूजल प्रबंधन पर ज्यादा जोर दिया गया है। इसके तहत भूजल के दोहन पर रोक के साथ जल संरक्षण और संचयन के भी प्रावधान किए गए हैं।

हमारे देश में सालाना चार हजार अरब घन मीटर पानी उपलब्ध है। इस पानी का बहुत बड़ा भाग समुद्र में बेकार चला जाता है। इसलिए बरसात में बाढ़ की, तो गरमी में सूखे का संकट पैदा हो जाता है। कभी-कभी तो देश के एक भाग में सूखा पड़ जाता है और दूसरा भाग बाढ़ की चपेट में आ जाता है। इसको कम करने के लिए आवश्यक है कि हम उपलब्ध जल का भंडारण करें। गंगा-यमुना के मैदानी क्षेत्रों में तो जल का भंडारण करके सूखे की समस्या से आसानी से निपटा जा सकता है। लेकिन इसके लिए जिस मुस्तैदी से नीतियां बना कर अमल किया जाना चाहिए था, वह नहीं हो पाया।

भारत में वर्षा से काफी जल प्राप्त होता है। इसे बांध और जलाशय बना कर इकट्ठा किया जा सकता है। बाद में इस जल का उपयोग सिंचाई और बिजली बनाने के लिए किया जा सकता है। इसके लिए सबसे पहले उन क्षेत्रों की सूची तैयार करनी होगी, जहां गरमी शुरू होते ही ताल, तलैया और कुएं सूख जाते हैं और भूगर्भ में भी जल का स्तर घटने लगता है। ऐसे क्षेत्रों में कुछ बड़े-बड़े जलाशय बना कर भूगर्भ के जल स्तर को घटने से भी रोका जा सकता है और सिंचाई के लिए भी जल उपलब्ध कराया जा सकता है। भारत की जनसंख्या जिस रफ्तार से बढ़ रही है, उसके लिए भी यह सब जरूरी है।

सन 2020 तक भारत की जनसंख्या बढ़ कर एक सौ चालीस करोड़ हो जाएगी। इतनी बड़ी जनसंख्या के लिए लगभग पैंतीस करोड़ टन खाद्यान्न की जरूरत पड़ेगी, जो हमारे वर्तमान उत्पादन से लगभग डेढ़ गुना होगा। इसलिए सिंचाई सुविधाओं के विस्तार के साथ-साथ उपलब्ध जल का भरपूर उपयोग भी जरूरी होगा।

देश में वर्तमान जल संकट का एक बड़ा कारण यह है कि जैसे-जैसे सिंचित भूमि का क्षेत्रफल बढ़ता गया है, वैसे-वैसे भूगर्भ के जल स्तर में गिरावट आई है। देश में सुनियोजित विकास पूर्व सिंचित क्षेत्र का क्षेत्रफल 2.26 करोड़ हेक्टेयर था। आज लगभग 6.8 करोड़ हेक्टेयर भूमि की सिंचाई होती है। सिंचाई क्षेत्र के बढ़ने के साथ-साथ जल का इस्तेमाल भी बढ़ा है, इसलिए भूगर्भ में उसका स्तर घटा है। गरमी आते ही जमीन में पानी का स्तर घटने से बहुत सारे कुएं और तालाब सूख जाते हैं और नलकूप बेकार हो जाते हैं। वर्षा कम हुई तो यह संकट और बढ़ जाता है। आबादी बढ़ने के साथ-साथ गांवों की ताल-तलैया भी घटती जा रही है और इसलिए उनकी जल भंडारण क्षमता भी खत्म हो गई है या घटी है। इसलिए नए जलाशयों के निर्माण के साथ-साथ पुराने तालाबों को भी गहरा किया जाने की जरूरत है।

भारत में पानी की दोषपूर्ण नीति उसकी भौगोलिक व्यवस्था के कारण है। भोपाल के पास से गुजरने वाली कर्क रेखा के उत्तर क्षेत्र की नदियों में यह पानी कुल का दो-तिहाई है, जबकि कर्क रेखा के दक्षिण के क्षेत्रों में एक तिहाई। दक्षिण भारत में कुल पानी का केवल चौथाई भाग उपलब्ध है। उत्तर में भी इलाहाबाद के पश्चिम में आवश्यकता से कम उपलब्ध है। लेकिन उसी गंगा से आगे जाकर जरूरत से अधिक पानी प्राप्त होता है। इसी तरह ब्रह्मपुत्र के पानी की समस्या है। यह संकरी घाटी से गुजरने के कारण उपयोग में नहीं आ पाता है। इसी तरह सिंध नदी में जल संधि के कारण उसका पानी भारत की ओर नहीं बढ़ पाता। अगर इस संदर्भ में एक राष्ट्रीय योजना बनाई जाए तो इस पानी का उचित उपयोग हो सकता है।

भारत में जल संसाधन मुख्यतया दक्षिण-पश्चिम मॉनसून पर निर्भर है। उत्तर-पूर्वी मानसून से भी कुछ पानी प्राप्त होता है। दक्षिण-पूर्वी मानसून, वर्मा, थाईलैंड आदि की ओर चला जाता है। कभी-कभी इस मानसून के कुछ बादल हिमालय की ओर मुड़ कर भारत के उत्तर में वर्षा करते हैं। विश्व के कई देशों में एक नदी के पानी को दूसरी ओर मोड़ कर पानी की समस्या हल की गई है। भारत में भी इस दिशा में कुछ काम हुआ है और इसमें तेजी लाने की आवश्यकता है।

तमिलनाडु में पूर्वी भागों का पानी पेरियार की ओर मोड़ा गया है। यमुना का पानी भी पश्चिमी भाग की ओर मोड़ा गया है। सिंधु नदी को राजस्थान की ओर प्रवाहित किया गया है, लेकिन ये योजनाएं अत्यंत लघु स्तर की रही हैं। राष्ट्रीय स्तर पर पानी की असमानताएं और समस्या दूर करने के लिए कुछ नहीं किया गया है। भारत में संयुक्त राष्ट्र से पानी की समस्या के बारे में अध्ययन करने आए एक दल ने कई सुझाव दिए हैं। एक, ब्रह्मपुत्र से फरक्का तक एक प्रणाली बना कर उसके पानी को गंगा में मिला कर पानी की समस्या हल की जा सकती है।

इसी तरह गंगा के पानी को सोन नदी से लेकर एक नहर के जरिए कावेरी तक लाया जा सकता है। इससे जहां उत्तर से दक्षिण के लिए सस्ता संचार सुलभ होगा, वहां दक्षिण को पर्याप्त पानी मिल जाएगा। इस तरह की नहर भारत की मुख्य नदियों को जोड़ देगी, जिससे कुछ नदियों का विशाल और परेशान करने वाला जल भंडार काम में आ जाएगा। एक नहर चंबल को राजस्थान नहर से बांध सकती है। इसके लिए नागौर पर बांध की आवश्यकता होगी। हम अभी तक समुद्र के खारे पानी को भी पीने योग्य नहीं बना सके हैं, जबकि इसराइल अपनी पानी की सारी आवश्यकताएं समुद्र से पूरा करता है। इजराइल से समझौता कर हम यह तकनीक हासिल कर सकते हैं।

संयुक्त राष्ट्र के दल ने कहा है कि अगले तीस वर्षों में भारत में पानी की समस्या बहुत कठिन हो जाएगी। यह संकट शुरू हो गया है। इसलिए पानी के संकट के लिए भी कई तात्कालिक कदम उठाए जाने चाहिए और इसके लिए ग्रामीण क्षेत्रों में छोटे-छोटे जलाशयों का निर्माण किया जाना चाहिए, ताकि उस क्षेत्र के कुओं को सूखने से बचाया जा सके और पशुओं को भी जल मिल सके। हवा के बाद पानी पहली जरूरत है। इस काम को सबसे अधिक प्राथमिकता दी जानी चाहिए। लेकिन अब तक हम ऐसा तंत्र विकसित नहीं कर सके हैं, जो हमारी पेयजल और सिंचाई योजनाओं को ठीक से लागू कर सके।

राजनीतिक दल एक-दूसरे को उखाड़ने-पछाड़ने के लिए जिस तरह की जाति-बिरादरी और आरक्षण की घटिया राजनीति करते हैं, उससे हमारी राष्ट्रीय समस्याएं कभी राजनीति का हिस्सा नहीं बन पाती हैं और समस्या ज्यों की त्यों बनी रहती है। देश का जागरूक जनमत ही राजनीतिक दलों को पानी और विकास की समस्याओं पर काम करने के लिए विवश कर सकता है।

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