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सहेजना होगा पानी को

मानसून एक अवसर है। भारत में हर साल औसतन एक सौ पच्चीस सेंटीमीटर बारिश होती है। इसमें से पचहत्तर प्रतिशत बारिश जून से सितंबर तक रहने वाले दक्षिण-पश्चिमी मानसून के कारण होती है। ऐसे में यदि मानसून के दिनों में हम वर्षा जल संग्रहण के प्रति सजग हो जाएं तो साल भर की जरूरत के लिए पर्याप्त मात्रा में पानी का संग्रहण कर सकते हैं।

सांकेतिक फोटो।

अतुल कनक

राजस्थानी भाषा की एक कहावत का भावार्थ है कि आषाढ़ के महीने में खेती की तैयारियां करने से चूके हुए किसान की हालत उस वानर की तरह होती है जो एक डाल से दूसरी डाल पर छलांग लगाते समय किसी कारण से चूक जाता है। दोनों ही फिर आसानी से संभल नहीं पाते। कहावत का एक भावार्थ यह भी हो सकता है कि अवसर मिलने पर उसका सदुपयोग करने से चूका हुआ व्यक्ति कालांतर में अपनी लापरवाही के परिणाम भुगतता है। तैयारियों का यह तादात्म्य केवल रोजमर्रा की जरूरतों के लिए ही जरूरी नहीं है, बल्कि प्रकृति से मानव जीवन के रिश्तों को बनाए रखने के लिए भी आवश्यक है। हमारी आधुनिक जीवनशैली ने सामान्य जीवन की जरूरतों को असामान्य रूप से बढ़ा दिया है। ये जरूरतें इसलिए भी सामान्य से अधिक प्रतीत होती हैं क्योंकि इनसे संबंधित प्राकृतिक संसाधनों की संरक्षा के प्रति मनुष्य समाज लापरवाह हो गया है। इन जरूरतों में पानी की जरूरत भी है।

पृथ्वी के दो तिहाई से अधिक भाग पर जल है। फिर भी कतिपय विद्वानों को आशंका है कि कहीं अगला विश्व युद्ध पानी के मुद्दे पर ही नहीं हो। कुछ लोगों को यह बात आश्चर्यजनक लग सकती है कि जब दुनिया में इतना पानी है तो पानी के मुद्दे पर युद्ध का भय क्यों? लेकिन यह आशंका उस समय सच का स्पर्श करती-सी प्रतीत होती है, जब यह पता चलता है कि पृथ्वी की सतह पर मौजूद कुल जल राशि का दो प्रतिशत ही पीने के लिए उपयोग किया जा सकता है या यह कि दुनिया की आबादी का एक बहुत बड़ा हिस्सा आज भी स्वच्छ पेयजल की सुविधा से वंचित है। हर साल गर्मी के मौसम में देश के अनेक शहरों में होने वाली पानी की किल्लत इस बात का अहसास तो करा ही देती है कि पानी की कमी सभ्य कहे जाने वाले समाज को किन-किन परेशानियों में धकेल सकती है।

ऐसे में आवश्यक है कि स्वच्छ पेयजल का भंडारण बढ़ाया जाए और उपलब्ध भंडारण को बचाया जाए। यहीं आकर प्रकृति और मनुष्य के रिश्ते को सहेजने का प्रसंग महत्त्वपूर्ण हो जाता है। कहते हैं कि अभी भी प्रकृति के पास इतने संसाधन हैं कि वह सब मनुष्यों की जरूरतों को पूरा कर सकती है। मानसून के दिनों में आकाश से बरसने वाला पानी मनुष्य को अपने जल भंडारण समृद्ध करने का अवसर देता है। इसीलिए मानसून एक अवसर है। भारत में हर साल औसतन एक सौ पच्चीस सेंटीमीटर बारिश होती है। इसमें से पचहत्तर प्रतिशत बारिश जून से सितंबर तक रहने वाले दक्षिण-पश्चिमी मानसून के कारण होती है। ऐसे में यदि मानसून के दिनों में हम वर्षा जल संग्रहण के प्रति सजग हो जाएं तो साल भर की जरूरत के लिए पर्याप्त मात्रा में पानी का संग्रहण कर सकते हैं।

पश्चिमी भारत के जिन हिस्सों में अपेक्षाकृत कम बरसात होती है, उन क्षेत्रों की परंपराओं में वर्षा जल संग्रहण के प्रति जागरूकता को देखा जा सकता है। राजस्थान के जैसलमेर शहर में एक ऐतिहासिक तालाब है- गढ़सीसर तालाब। रियासत काल में मानसून आने से पहले इस तालाब की सफाई का कार्य शहरवासियों के लिए एक उत्सव हुआ करता था। जैसलमेर के शासक स्वयं अपने परिजनों के साथ इस काम में लगते थे। पहली बरसात के बाद इस तालाब में स्नानादि कार्य करना पूरी तरह वर्जित था।

बरसात के दिनों में यह तालाब पानी से लबालब भर जाता था और साल भर लोगों की जरूरतों के लिए जल उपलब्ध करवाता था। जैसलमेर के प्राचीन निवासी बरसात के पानी के संग्रहण के लिए इतने सचेत थे कि इस तालाब के पूरे भर जाने पर छलक जाने वाले पानी को संचित करने के लिए उसे एक पतली नहर के माध्यम से दूसरे तालाब तक ले जाने की व्यवस्था कर रखी थी। पश्चिमी राजस्थान में मौजूद बड़े और गहरे प्राचीन कुएं आज भी भारत की प्राचीन वर्षा-जल संग्रहण परंपराओं के बारे में बताते हैं।

पश्चिमी राजस्थान में बरसात कम होती है और पानी की उपलब्धता भी सीमित है। इसलिए उस क्षेत्र में जल संग्रहण की परंपराओं को यह कह कर समझा जा सकता है कि किसी वस्तु या साधन की कमी मनुष्य को उस वस्तु या साधन के संग्रहण के प्रति संवेदनशील बना देती है। लेकिन दक्षिण-पूर्वी राजस्थान का कोटा शहर तो उस चंबल नदी के किनारे बसा है, जिसे संस्कृत ग्रंथों में सदासलिला कह कर संबोधित किया है।

सदासलिल अर्थात् ऐसी नदी, जिसमें पूरे साल पानी का सतत प्रवाह बना रहे। चौदहवीं शताब्दी में जब बूंदी रियासत के अधीन कोटा एक छोटा-सा शहर था, तब बूंदी के राजकुमार धीरदेह ने इस शहर में तेरह तालाब बनवाए थे, जो बरसात का पानी संग्रहित कर लेते थे। इससे भूजल स्तर भी बना रहता था। प्राचीनकाल में तालाब ही नहीं, कुएं, जोहड़, बावड़ियां, झील और कुंड जैसे मानवनिर्मित जल स्रोत यही भूमिका निभाते थे। प्रकृति जब बरसात के पानी के रूप में धरती को वरदान दे रही हो, तो उस पानी को सहेजना प्रकृति के वरदान को मान देना है।

हमारी परंपराओं में पानी के संग्रहण को समृद्धि का परिचायक माना गया है और पानी के अपव्यय को आपदा का कारक। लेकिन जरूरतें पूरी करने लायक पानी बहुत सहजता से उपलब्ध होने लगा तो हम भूल गए कि क्यों रहीम ने कहा था- रहीमन पानी राखिये, बिन पानी सब सून..। पर्याप्त देखभाल और संरक्षण के अभाव में अधिकांश कुएं और कुंड उजड़ते गए और कचरा संग्रहण केंद्र में तब्दील हो गए। बावड़ियां अपनी उपेक्षा पर आंसू बहाती दिखने लगीं। स्थिति यह हो गई कि जिन नदियों को पवित्र मान कर उनकी पूजा की जाती है, विकास के नाम पर हमने उन्ही नदियों को प्रदूषण के हवाले कर दिया।

इतने से भी विकास का अंधा सपना पूरा नहीं हुआ तो हमने धरती के गर्भ में सुरक्षित जल को अनियंत्रित तरीके से उलीचना शुरू कर दिया। अस्सी के दशक में देश भर में नलकूप खोदने की एक होड़-सी लगी। ठीक है, लोगों को उनकी जरूरत भर जल उपलब्ध कराने के लिए प्रबंध करना था, लेकिन आमद और निर्गम में संतुलन नहीं बनाए रख पानी वाली संस्था तो दिवालिया होती ही है। होना तो यह चाहिए था कि भूजल स्तर बचाए रखने के लिए समुचित प्रबंधन भी किए जाते। लेकिन जिम्मेदार लोगों ने इस दायित्व की तरफ से अपनी आंखें मूंद लीं और परिणाम यह हुआ कि देश के कई हिस्सों में नदी किनारे बसी हुई बस्तियों के आसपास भी भूजल स्तर खतरनाक रूप से कम हो गया।

दक्षिणी-पूर्वी राजस्थान के हाड़ौती अंचल में छोटी- बड़ी नदियों का एक जाल है। चंबल के अलावा पार्वती, काली सिंध, परवन, चंद्रलोही, आहू, घोड़ा पछाड़, उजाड़, बिलास जैसी एक दर्जन से अधिक क्षेत्रीय नदियां इस अंचल की शिराओं को सींचती हैं। लेकिन भूगर्भ की दृष्टि से इस अंचल की अधिकांश पंचायत समितियों को डार्क जोन (जहां भूजल स्तर बेहद गिर गया हो) में शामिल किया गया है। यह उदाहरण बताता है कि बरसात के पानी के संग्रहण के अभाव में हम भूगर्भ जल के स्तर को बनाने और बढ़ाने में सफल नहीं हो सके हैं। प्राचीनकाल में पानी के प्रवाह के मार्ग में तालाब, कुओं या बावड़ियों का निर्माण करवा दिया जाता था ताकि बरसात का पानी ये जल संसाधन अपने चुल्लू में समेट लें। मानसून एक अवसर देता है कि हम पीढ़ियों की जरूरत के प्रति संवेदनशील हों और वर्षा जल संग्रहण के प्रति सचेत।

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