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कचरा प्रबंधन और व्यक्तिगत जवाबदेही

दिखावे का प्रतिमान बनते शादी समारोह पर्यावरण प्रदूषण के हर र्मोर्चे पर एक बड़ा जोखिम बन गए हैं।

मोनिका शर्मा

दिखावे का प्रतिमान बनते शादी समारोह पर्यावरण प्रदूषण के हर र्मोर्चे पर एक बड़ा जोखिम बन गए हैं। साल-दर-साल बढ़ती जा रही चमक-दमक और ‘यूज ऐंड थ्रो’ उत्पादों की संस्कृति हमें विस्फोटक स्थिति में ले आई है। ऐसे आयोजनों के कारण न केवल गीला और सूखा कूड़ा बढ़ रहा है, बल्कि नालों-नदियों में बहाए जाने वाले भोज्य पदार्थों से वायु प्रदूषण भी फैल रहा है। परिवेश में गंदगी और हवा में बदबू का यह मेल वाकई घातक है।

प्रदूषण फैला कर धरती के रंग उड़ाने की बात हो या सहेजने योग्य सेवाओं-वस्तुओं की फिजूलखर्ची, हाल के बरसों में बदली जीवन-शैली में इंसान का खुशियां मनाने का अंदाज भी पर्यावरण को नुकसान पहुंचा रहा है। परंपरागत रंग-ढंग से दूर हुए वैवाहिक आयोजन इसी का उदाहरण हैं। शादी समारोहों के सामाजिक-पारिवारिक आयोजनों के नए अंदाज ने इन्हें कचरा फैलाने वाले कारज बना दिया है। अनगिनत व्यंजन परोसे जाने से लेकर साज-सज्जा तक, ऐसे अवसरों पर जूठन, कागज-प्लास्टिक और बचे हुए खाने को यहां-वहां फेंकना जल-थल और वायु प्रदूषण का अहम कारण बन गया है। शादी समारोहों से निकले अपशिष्ट का सही ढंग से निपटारा न होने के चलते यह कई बीमारियों की भी वजह बन रहा है।

गौरतलब है कि देश के सबसे स्वच्छ शहरों में शुमार इंदौर में पर्यावरण की सुरक्षा के लिए एक जरूरी पहल की गई है। अपने परिवेश को स्वच्छ रखते हुए पर्यावरण को बचाने के लिए उठाए जा रहे कदम के तहत यहां शून्य अपशिष्ट शादियों का नया चलन शुरू होना एक सकारात्मक बदलाव है। इस परिकल्पना के मुताबिक अब शहर में आयोजित विवाह समारोहों में अपशिष्ट का उत्सर्जन कम से कम रखने के कदम उठाए जा रहे हैं। अन्न-जल बचाने से लेकर कूड़ा-करकट न फैलाने तक, किए जा रहे जतन वाकई जरूरी हैं। साथ ही, पर्यावरण को दमघोंटू और अस्वच्छ होने से बचाने के लिए भी ऐसे कदम उठाए जाने आवश्यक हैं। इसलिए इंदौर में वैवाहिक समारोहों में निकलने वाले कचरे के सुव्यवस्थित निपटान की शुरुआत एक अनुकरणीय कदम कही जा सकती है।

दरअसल, हमारे देश में अन्न-जल जैसी अनमोल चीजों की कमी की एक बड़ी वजह इनका अपव्यय भी है। पर्यावरण प्रदूषण के कारणों में भी सार्वजनिक ही नहीं, व्यक्तिगत और पारिवारिक वजहें भी शामिल हैं। दिखावटी-बनावटी शादी समारोह इसी का हिस्सा हैं। हाल के बरसों में आम परिवार भी बड़े स्तर पर ऐसे आयोजन करने लगे हैं। कई तरह की जरूरी, गैर-जरूरी तैयारियों और सज-धज का मेल कूड़ा फैलाने का जरिया बन गए हैं। यह दुखद है कि पहले से ही कचरे से अंटे हमारे शहरों में शादियों के मौसम में हर गली, हर सड़क कूड़े के अतिरिक्त बोझ से लद जाती है। चमचमाती सज-धज वाले शादी सभागृहों के बाहर का दृश्य वाकई तकलीफदेह होता है। लाखों-करोड़ों रुपए खर्च कर शाही अंदाज में ऐसे आयोजन करने वाले परिवार भी इस मामले में अपनी उचित जिम्मेदारी नहीं निभाते। नतीजतन, दुर्गंध और यहां-वहां फैला गीला-सूखा कचरा खुशियां मनाते हुए अपनी जिम्मेदारी भूल जाने की तस्दीक करता नजर आता है।

भोजन की बर्बादी सीधे-सीधे पानी की फिजूलखर्ची से भी जुड़ी हुई है। शादी-ब्याह के मौसम में सैकड़ों टन खाना बर्बाद होता है। ऐसे में यह परोक्ष रूप से अनाज की पैदावार में लगने वाले जल का व्यर्थ जाना ही है। शादियों में थर्मोकोल, प्लास्टिक और कई दूसरी चीजों का कचरा भी खूब निकलता है। इस तरह इंदौर में शून्य अपशिष्ट शादियों की परिकल्पना के तहत वैवाहिक आयोजनों में स्वच्छता सूत्र के आधार पर काम किया जाना सार्थक पहल है। शहर में कचरा प्रबंधन स्टार्ट-अप ‘स्वाहा’ के मुताबिक इन्हीं दिनों दो शून्य अपशिष्ट शादियां करवाई जा चुकी हैं और आने वाले समय में ऐसी करीब दो सौ शादियां कराने की योजना है। इस तरह ये आयोजन कचरे के ढेर बढ़ाने के बजाय उनमें शामिल हो रहे लोगों को स्वच्छता का सार्थक संदेश भी दे रहे हैं। इन समारोहों के माध्यम से यह समझने वाल पक्ष है कि सरकारी प्रयासों से इतर आम जन भी अपनी जवाबदेही से धरती के रंग बचाने की कोशिशों का हिस्सा बन सकते हैं।

कहना गलत न होगा कि दिखावे का प्रतिमान बनते शादी समारोह पर्यावरण प्रदूषण के हर र्मोर्चे पर एक बड़ा जोखिम बन गए हैं। साल-दर-साल बढ़ती जा रही चमक-दमक और ‘यूज ऐंड थ्रो’ उत्पादों की संस्कृति हमें विस्फोटक स्थिति में ले आई है। ऐसे आयोजनों के कारण न केवल गीला और सूखा कूड़ा बढ़ रहा है, बल्कि नालों-नदियों में बहाए जाने वाले भोज्य पदार्थों से वायु प्रदूषण भी फैल रहा है। परिवेश में गंदगी और हवा में बदबू का यह मेल वाकई घातक है। एक ओर जहरीली गैसों का उत्सर्जन, तो दूसरी ओर कचरे से अंटती सड़कें और गली-मोहल्ले। चिंतनीय है कि आज भी गरीबी, भूख और कुपोषण से जूझ रहे हमारे देश में अनाज, दलहन, फल और सब्जियों के कुल उत्पादन का चालीस फीसद हिस्सा बर्बाद होता है। मानवीय मोर्चे पर तो यह अफसोसनाक है ही, आर्थिक रूप से भी इस अपव्यय का बाजार मूल्य हजारों करोड़ रुपए है।

हमारे देश में हर गीले-सूखे और यहां तक इलेक्ट्रानिक कचरे का सही निपटान एक बड़ी समस्या बना हुआ है। ऊपर से आज की बढ़ती जरूरतें और बदलती जीवनशैली तो कूड़ा-करकट बढ़ाने वाली है ही। स्वच्छता और पर्यावरण से जुड़े कई अध्ययन चेताते रहे हैं कि आगामी वर्षों में शहरों और महानगरों की सबसे बड़ी समस्या कचरे का उचित निस्तारण करने से जुड़ी ही होगी। जानलेवा दुर्घटनाएं और जल जमाव की आफत हर साल लोगों का जीना मुश्किल करती है। इसका एक अहम कारण नालों का कूड़े से अटे होना है।

रिहायशी इलाकों से लेकर बाजारों और सड़कों तक बिखरा कचरा बारिश के पानी की निकासी रोकता है। नतीजतन हर बार बरसात में शहरों में बाढ़ जैसे हालात बन जाते हैं। स्मार्ट सिटीज बनाने के इस दौर में भी ऐसा कोई शहर नहीं, जिसमें अशोधित कचरे के छोटे-बड़े पहाड़ न दिखते हों। कमोबेश सभी शहरों में कूड़े के ढेर स्वास्थ्य के लिए तो गंभीर खतरे के अलावा हादसों की वजह बन रहे हैं। साथ ही धरती, वायु और जल सभी को दूषित भी करते हैं। अध्ययन बताते हैं कि 2050 तक समुद्र में मछलियों से ज्यादा प्लास्टिक होगा। एक अध्ययन के मुताबिक दुनिया के समुद्रों और महासागरों में करीब अस्सी प्रतिशत प्लास्टिक कचरा जाता है, जिसका सीधा अर्थ है कि यह किसी न किसी तरह इंसानों के उपयोग से ही जुड़ा है। इतना ही नहीं, स्टेट आफ ग्लोबल एयर-2020 रिपोर्ट के मुताबिक वायु प्रदूषण से होने वाली सालाना मौतों में चीन और भारत अव्वल देश हैं। ऐसे में समझना मुश्किल नहीं कि कचरे का उचित निस्तारण कितना आवश्यक है।

आज अपशिष्ट निपटान की समस्या दुनिया के कई देशों के लिए एक मुद्दा बनी हुई है। खासकर विकासशील देशों में स्थितियां वाकई चिंतनीय हैं। भारत में भी हर राज्य और स्थानीय प्राधिकरण कचरे के बढ़ते उत्पादन और प्रभावी अपशिष्ट निपटान के तरीकों की कमी से जूझ रहे हैं। ऐसे में कम से कम सामाजिक समारोहों का आयोजन जवाबदेही के साथ किया जाए, तो बड़ा बदलाव आ सकता है। हमारे सामाजिक-पारिवारिक ढांचे में हर विशेष दिन एक समारोह की तरह मनाए जाने की रीत है। शादी के आयोजन तो वाकई बड़े स्तर पर होते हैं।

यह सुखद है कि ऐसे आयोजन समाज को जोड़ कर रखते हैं। सामाजिक संबंधों को पोषण देते हैं। चिंतनीय है तो यह कि इनसे जुड़ी दिखावटी तैयारियां और ‘यूज ऐंड थ्रो’ सामान के इस्तेमाल की बढ़ती संस्कृति पर्यावरण के लिए नुकसानदेह है। सेहत से जुड़ी समस्याओं के इस दौर में हमें समझना होगा कि बात चाहे दमघोंटू हवा की हो या दूषित पानी की। पर्यावरण का प्रदूषण हमारे जीवन को किसी न किसी रूप में प्रभावित करता ही है। ऐसे में हमारी खुशियां इसके रंग छीनने की वजह न बनें, इतना तो किया ही जाना चाहिए। इस मोर्चे पर कम से कम संसाधनों में गुजरा कोरोना आपदा का काल हमें इच्छाओं और जरूरतों का फर्क समझाने को काफी है।

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