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अरब की नई उम्मीद

सालों की मेहनत, लाखों लोगों का खून, दुनिया की सबसे पुरानी और पावन सभ्यता की लूट, मानव इतिहास के सबसे दुर्दान्त आतंकवाद को पनाह और करोड़ों डॉलर के हथियार लहराते वहशी वहाबियों का अंत शायद पुतिन ही कर सकते थे।

Author October 14, 2015 10:42 AM

सालों की मेहनत, लाखों लोगों का खून, दुनिया की सबसे पुरानी और पावन सभ्यता की लूट, मानव इतिहास के सबसे दुर्दान्त आतंकवाद को पनाह और करोड़ों डॉलर के हथियार लहराते वहशी वहाबियों का अंत शायद पुतिन ही कर सकते थे। अमेरिका, इजराइल, सऊदी अरब, कतर, तुर्की और नाटो के आगे पुतिन ने रूस, ईरान, सीरिया और इराक का मजबूत गठजोड़ खड़ा कर रातोंरात मुसलमान अवाम के बीच एक नायक की छवि बना ली। उन्होंने वह साहस दिखाया जो क्षेत्र की आवश्यकता थी। कई वर्षों में खड़े किए गए इस्लामिक स्टेट के आधे ढांचे को पुतिन की सेना ने मात्र चार दिन में ढेर कर दिया। सीरिया में आतंकवादियों पर रूस की ऐतिहासिक विजय के बाद इराक ने भी रूस से मदद मांगी है।

पुतिन न सिर्फ दुनिया को जताना चाहते हैं कि डेढ़ दशक में उन्होंने पुन: रूस को दुनिया की दूसरी महाशक्ति बना दिया, बल्कि वह इस्लामी जगत में यह बात स्थापित करने में भी कामयाब रहे हैं कि उनके शेख उनसे झूठ बोलते हैं, अपने ही अवाम को लूटते हैं और इन तानाशाहों का अमेरिका और उसकी मंडली के साथ नापाक गठजोड़ है। पुतिन ने सीरिया की बशर अल असद सरकार को बचा कर रूसी अर्थव्यवस्था को भी बचा लिया।

तिरसठ साल के रूसी राष्ट्रपति व्लादिमिर व्लादिमिरोविच पुतिन ने आखिर इतना सख्त कदम क्यों उठाया? अगर सीरिया को बचाने के लिए अब वह आगे आए हैं तो क्या सीरिया में वहाबी आतंकवाद के पहली बार सिर उठाने के समय 2010 की शुरुआत में वह ऐसा नहीं कर सकते थे? पुतिन के इतने आक्रामक होने से अरब की सियासत पर क्या असर पड़ेगा और इस्लामिक स्टेट को मारने के बावजूद अमेरिका, इजराइल, सऊदी अरब, कतर और अधिकतर नाटो देश उनसे क्यों नाराज हैं? पुतिन ने आतंकवादी तो मार गिराए लेकिन कई बेहद अहम सवाल जिंदा कर दिए।

सीरिया में बशर अल असद की सरकार को गिराने की मुहिम के पीछे अमेरिका, इजराइल, सऊदी अरब, कतर, तुर्की और नाटो के अपने अपने फायदे थे। नाटो और यूरोप की मंशा थी कि कतर की गैस पाइपलाइन सीरिया के रास्ते पहुंच जाए तो वे रूस पर अपनी ऊर्जा निर्भरता समाप्त कर सकते थे। इजराइल चाहता है कि कोई भी अरब देश कभी भी इतना मजबूत न हो कि उसे रत्ती भर खतरा हो, चाहे इसकी जो कीमत चुकानी पड़े। सऊदी अरब और कतर के कमजोर वहाबी शेख लोकतंत्र और ‘अरब बसंत’ से डरते हैं जो अमेरिका जब चाहेगा, ला देगा। और तुर्की के इतिहास के सबसे कमजोर राष्ट्राध्यक्ष और मुसलिम ब्रदरहुड के वहाबी कट्टर नेता तैयब इरदोगन अपने आका हसन अलबन्ना के सपनों की उस खिलाफत को संजो कर बैठे हैं जिसका भद््दा स्वरूप आइएसआइएस ने इराक और सीरिया में दिखाया और जिसकी कोशिश को मिस्र की जनता ने एक ही साल में धूल चटा दी। मगर सवाल लाजमी है, इससे रूस को खतरा क्या था?

रूस की अर्थव्यवस्था का करीब चालीस फीसद ऊर्जा-निर्यात से आता है। इसमें भी प्राकृतिक गैस एक बहुत बड़ा साधन है। अमेरिकी और इजराइली ‘न्यू वर्ल्ड आॅर्डर’ में गैस के लिए यूरोप की रूस पर निर्भरता को घटाना शामिल है। अगर रूस की अर्थव्यवस्था बर्बाद हो गई तो वह फिर से दूसरी महाशक्ति बनने के सपने को तिलांजलि दे सकता है। रूसी खुफिया एजेंसी केजीबी में दूसरे सबसे महत्त्वपूर्ण पद पर सेवा दे चुके पुतिन मगर ऐसा नहीं चाहते थे। कतर की ही गैस पाइपलाइन नहीं बल्कि ईरान के साथ अमेरिका और अन्य पांच देशों के परमाणु करार के बाद यूरोप तक ईरान की गैस पाइपलाइन की भी उम्मीद बनने लगी थी। दोनों ही सूरत में इस पाइपलाइन का रास्ता पहले सीरिया और फिर तुर्की होते हुए यूरोप तक था। लेकिन अगर बशर अल असद की सरकार बचा ली जाए तो यह काम रोका जा सकता है। पुतिन ने ऐसा ही किया।

सीरिया में बशर की सरकार पर साल 2013 में जब रासायनिक हथियारों के इस्तेमाल का इलजाम लगा कर अमेरिका और इजराइल ने तकरीबन युद्ध करने की ठान ली थी, व्लादिमिर पुतिन ने तेजी से काम किया और अमेरिका के पिट्ठू वहाबी देश सऊदी अरब को सबक सिखाने की बात कह कर हमला टलवा दिया। पुतिन ने न सिर्फ सीरिया को हथियार से मदद की बल्कि उन्होंने सुन्नी के नाम पर वहाबी, यहूदी और ईसाई देशों के इस भयानक गठजोड़ की काट के लिए शिया ताकतों को साथ लिया। पुतिन ने 2012 में इराक के साथ करीब सवा चार अरब डॉलर के हथियारों का सौदा किया और ईरान का तो रूस पुराना सुरक्षा सहयोगी है।

आइएसआइएस के लिए लड़ रहे वहाबी वहशियों की सत्तर हजार की तादाद में अकेले रूस (चेचेन्या और मुसलिम बहुल राज्य) और मध्य एशिया यानी कजाखस्तान, ताजिकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान, उज्बेकिस्तान और किर्गिजिÞस्तान से गए लड़कों की तादाद पांच हजार से अधिक है। पुतिन ने चेचेन्या के राष्ट्रपति रमजान कादिरोव के कुशल और सूफी नेतृत्व से वहाबियों को पटखनी देने का शानदार प्रयोग पहले किया है लेकिन सीरिया में रूसी और मध्य एशियाई लड़कों के इस्लामिक स्टेट की तरफ से लड़ने से उनका परेशान होना लाजमी है।

अफगानिस्तान में तालिबान के साथ ताजिक, चेचेन्याई और उज्बेकी लड़के ही नहीं बल्कि हाल ही में बहुत कजाखी, तुर्कमेनी और किर्गिज आतंकवादी भी पहुंचने लगे हैं। अगर सीरिया में उन्हें अमेरिकी तकनीक, तुर्की और इजराइली सहयोग और सऊदी तथा कतरी धन मिलता है तो सोवियत संघ के दौर में वैज्ञानिक तरक्की पाए ये नौजवान नए इस्लाम के नाम पर वहाबी विचारधारा के झांसे में रूस को बर्बाद करने की योजना पर काम कर सकते हैं। पुतिन इतना बड़ा खतरा मोल नहीं ले सकते क्योंकि अकेले चेचेन्या मसले को समझने में ही देश को पंद्रह साल लगे और सूफी नेता के तौर पर अगर कादिरोव परिवार उन्हें नहीं मिलता तो शायद देश अब भी वहाबी आंतकवाद से जूझ रहा होता।

रूस के आक्रामक रवैये से तुर्की की स्थिति काफी हास्यास्पद हो गई है। नाटो के सदस्य देश तुर्की की हवाई सीमा के उल्लंघन के नाम पर नाटो रूस को धमका रहा है, लेकिन पुतिन के हौसलों पर कोई असर नहीं पड़ा है। दरअसल, तुर्की में मध्यावधि चुनाव होने वाले हैं। अगर तैयब इरदोगन की मुसलिम ब्रदरहुड फिर चुनाव नहीं जीतती है तो आइएसआइएस को रसद कट जाएगी। इसीलिए कुर्दों के दमन में अमेरिका, सऊदी अरब, कतर और इजराइल तुर्की के साथ हैं। तुर्की में दो बड़े आतंकवादी हमलों से यह बात पुष्ट हो जाती है कि उसने इस्लामिक स्टेट को कितनी मदद दी है।

रूस के हाथों अपने पालतू आइएसआइएस के वहाबी वहशियों को मात खाता देख सऊदी अरब बौखला गया है। उसके बावन वहाबी तथाकथित उलमा ने सीरिया में रूस के विरुद्ध ‘जिहाद’ की अपील की है। कतर और सऊदी अरब के शेख के धन पर पलने वाले इंटरनेशनल यूनियन आॅफ मुसलिम स्कॉलर्स संस्था के वहाबी उलमा की इस फतवे में संख्या बहुत अधिक है। भारत के भी कई तथाकथित उलमा इसके सदस्य हैं। फतवा कहता है कि मुसलमान तन-मन-धन से सीरिया और रूस के खिलाफ जिहाद करें। यानी मुसलमान नौजवान आइएसआइएस से जुड़ कर आतंकवाद फैलाएं?

सीरिया की बशर अल असद सरकार को रूस इसलिए भी बचाए रखना चाहता है क्योंकि धर्मनिरपेक्ष बाथ पार्टी के साथ रूस की वैचारिक साम्यता है। सीरिया स्वयं को अरब गणराज्य कहता है, इस्लामी सल्तनत या इस्लामी गणराज्य नहीं। यहां पैगम्बर याहया, हजरत अली की बेटी हजरत जैनब और महान इस्लामी योद्धा हजरत सलाउद््दीन अयूबी के मजार पर शिया और सुन्नी सूफी एकीदत से जुटते हैं, पुरातन सीरियाई चर्च का मुख्यालय सीरिया है, आर्मेनियाई और यजीदियों को कभी कोई परेशानी नहीं हुई और यहूदियों ने कभी यहां धार्मिक भेदभाव की वह शिकायत नहीं की, जो अक्सर फिलस्तीन के मुसलमान इजराइल के बारे में करते हैं। मगर वहाबी ही नहीं, हथियार बेचने वाले देशों, तेल और गैस के लुटेरों और इजराइल को यह सब चुभता है।

सीरिया में जितने प्रवासियों को मीडिया ने दिखाया, यह कभी नहीं बताया कि वैचारिक रूप से ये कौन लोग हैं? ये सिर्फ यजीदी, आर्मेनियाई, ईसाई, यहूदी या शिया नहीं। इनमें सबसे बड़ी तादाद सुन्नी सूफी मुसलमानों की है। वे सूफी जो तसव्वुफ के पहले इमाम हजरत अली और इनके घराने, हजरत अब्दुल कादिर जिलानी ही नहीं, पूरे अरब, मध्य एशिया और भारत में सूफी संतों के दरबार के चक्कर लगा कर अपनी फरियाद पहुंचाते हैं। इंसानियत को अपनी जिंदगी का मकसद मानते हैं। सूफी खुद को सुन्नी यानी ‘नकल करने वाले’ यानी पैगम्बर मुहम्मद के कार्यों को दोहराने वाला कहते हैं।

वहाबी वहशी इनसे सुन्नी चादर चुरा कर अपने गुनाहों पर उसे डालना चाहता है। भारत समेत दुनिया भर के सुन्नी सूफियों ने रूस की कार्रवाई की तारीफ करते हुए इसे मानवता के हक में बताया। लेकिन घटनाओं की रिपोर्टिंग करने वाले मीडिया के एक हिस्से को इस बात में कोई दिलचस्पी नहीं कि वह वहाबी विचारधारा और सूफीवाद की पेचीदगी को समझे।

तभी तो उसे यह भी समझ नहीं आता कि मक्का के वहाबी इमाम को भारत के सूफी काले झंडे क्यों दिखाते हैं, क्यों उसके पीछे नमाज नहीं पढ़ते और क्यों वे अलसऊद और इनकी वहाबियत को इस्लाम के लिए खतरा मानते हैं। इस्लामफोबिया बने रहने से भी कई मतलब सधते हैं। धंधा चालू आहे।
अख़लाक अहमद उस्मानी

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