आभासी शिक्षा का संकट

बहुसंख्यक भारतीयों के पास कंप्यूटर नहीं है और आभासी शिक्षा तक उनकी पहुंच का एकमात्र जरिया मोबाइल फोन ही है।

सांकेतिक फोटो।

प्रमोद मीणा

बहुसंख्यक भारतीयों के पास कंप्यूटर नहीं है और आभासी शिक्षा तक उनकी पहुंच का एकमात्र जरिया मोबाइल फोन ही है। पूर्णबंदी में रोजगार छिनने और आय में आई भारी कमी के चलते एक बड़ा तबका ऐसा भी है जो अपने मोबाइल फोनों को इंटरनेट से जोड़ने के लिए डाटा भी नहीं खरीद पा रहा है।

महामारी के दौरान देशभर में एक केंद्रीकृत नीति के तहत स्कूलों सहित सारे शिक्षा संस्थानों को बंद कर दिया गया। अब तमाम क्षेत्रों में पूर्णबंदी से छूट दिए जाने के बाद भी स्कूलों को खोलने में विशेष एहतियात बरता जा रहा है। महामारी पर नियंत्रण की दृष्टि से तो यह उचित हो सकता है, लेकिन इस स्कूल बंदी से सुविधा संपन्न और हाशिए के बच्चों के बीच पहले से मौजूद शैक्षणिक खाई और चौड़ी हो गई है। एक ओर परंपरागत कक्षा अध्यापन के विकल्प के रूप में आॅनलाइन कक्षाओं के आयोजन को शिक्षा के लोकतांत्रीकरण की दिशा में बड़ा कदम बता कर प्रचारित किया जा रहा है, लेकिन दूसरी ओर इसने शिक्षा तक पहुंच के मार्ग में बहुसंख्यक दलित-आदिवासी बच्चों के सामने एक नया डिजिटल अवरोध खड़ा कर दिया है। इसमें कोई संदेह नहीं कि चाक और श्यामपट्ट की जगह लेते कंप्यूटर और मोबाइल फोन के कारण अध्यापन प्रक्रिया में बहुत बड़ा बदलाव हो चुका है। लेकिन वंचित तबकों और कमजोर पृष्ठभूमि वाले विद्यार्थियों के लिए इस बदलाव के क्या मायने हैं, इस पर भी विचार होना जरूरी है।

ऐसा नहीं कि कंप्यूटर और इंटरनेट तक पहुंच रखने वाले संपन्न वर्ग के बच्चों पर आभासी माध्यमों से संचालित होने वाली इस शिक्षा का नकारात्मक असर न पड़ रहा हो। तमाम अध्ययनों से यह साबित हो चुका है कि आभासी शिक्षा परंपरागत विद्यालयी शिक्षा का विकल्प नहीं हो सकती। एक ओर विद्यार्थी के सर्वांगीण विकास के लिए विद्यालयी शिक्षा नितांत जरूरी होती है, वहीं दूसरी ओर आॅनलाइन कक्षाओं के माध्यम से पढ़ने वाले विद्यार्थियों की समझ का स्तर भी कक्षा में अध्यापक के सामने प्रत्यक्ष रूप से बैठ कर पढ़ने वाले विद्यार्थियों से कम पाया गया है। स्पष्ट है कि तकनीक अपने सर्वोत्तम रूप में भी एक सहायक मात्र होती है। वह कक्षा अध्यापन की पूरक नहीं हो सकती। यह भी ध्यातव्य है कि स्कूली शिक्षा में डिजिटल माध्यमों का प्रभावी इस्तेमाल भी वास्तविक अध्यापन कक्ष में ही संभव हो पाता है। स्कूलबंदी के कारण आज हर बच्चा अपनी क्षमता का समुचित प्रदर्शन नहीं कर पा रहा है।

शिक्षा के जो सामाजिक-मानवीय आयाम होते हैं, उनके मद्देनजर दूरस्थ आभासी शिक्षा ने शिक्षा के मूल अर्थ को ही पृष्ठभूमि में धकेल दिया है। हम आभासी शिक्षा के नाम पर बच्चों के साथ ऐसे प्रयोग कर रहे हैं जैसे कि वे खाली बर्तन हों, जिन्हें सूचनाओं और तथ्यों से भर देना है। आॅनलाइन कक्षाओं में देखा गया है कि शिक्षा का प्रायोगिक पहलू भी उपेक्षित रह जाता है। बच्चों के सामाजिक और भावनात्मक विकास पर हम अपेक्षित ध्यान नहीं दे पाते। शिक्षण का एक सामान्य-सा सिद्धांत है कि बच्चे दूसरों का अनुकरण करते हुए सीखते हैं। कक्षा में शिक्षक वह माहौल मुहैया कराता है जिसमें सहपाठियों के साथ जुड़ कर बच्चा सहज ही खेल-खेल में चीजों को अपने दिमाग में उतारता जाता है। कोराना काल के शैक्षणिक अनुभव बताते हैं कि इंटरनेट आधारित आभासी कक्षाओं में परस्पर जुड़ कर सीखने का सीधा-साधा कार्य भी संपन्न नहीं हो पाता।

एक ओर जहां मोबाइल और कंप्यूटर से वंचित सरकारी स्कूलों के गरीब विद्यार्थी वर्ग में आभासी कक्षाएं निष्प्राभावी पाई गई हैं और दूरस्थ आदिवासी इलाकों में इंटरनेट की समुचित उपलब्धता ने जहां इन्हें अर्थहीन साबित किया है, वहीं समृद्ध परिवारों के कुछ बच्चे स्मार्टफोन और लैपटॉप जैसे गैजेटों पर जरूरत से ज्यादा आश्रित बन गए हैं। इससे उनके स्वास्थ्य पर भी प्रतिकूल असर पड़ रहा है। जरूरत से ज्यादा वक्त स्क्रीन पर बिताने वाले ऐसे बच्चों में अपेक्षित शारीरिक-सामाजिक विकास नहीं हो पाता। स्पष्ट है कि महामारी के इस दौर में तकनीक ने शैक्षणिक असमानता में गुणात्मक वृद्धि की है। आज भारत में अमीर और गरीब की तर्ज पर तकनीक संपन्न और तकनीक विहीन लोगों के वर्गीकरण को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण कार्यालय के पचहत्तरवें दौर के आंकड़े इस अंतराल पर मुहर लगाते हैं। इन आंकड़ों के अनुसार ग्रामीण इलाकों में तो पांच फीसद से भी कम ग्रामीण घरों में कंप्यूटर हैं, जबकि शहरी इलाकों में भी यह आंकड़ा मुश्किल से ही पच्चीस फीसद को छू पाता है। जाहिर है, बहुसंख्यक भारतीयों के पास कंप्यूटर नहीं है और आभासी शिक्षा तक उनकी पहुंच का एकमात्र जरिया मोबाइल फोन ही है। पूर्णबंदी में रोजगार छिनने और आय में आई भारी कमी के चलते एक बड़ा तबका ऐसा भी है जो अपने मोबाइल फोनों को इंटरनेट के लिए डाटा नहीं खरीद पा रहा है। केरल जैसे एकाध राज्य को छोड़ कर गरीब बच्चों के लिए आॅनलाइन शिक्षा हेतु आधारभूत डिजिटल संसाधनों की उपलब्धता सुनिश्चित करने की दिशा में भी प्राय: काम नहीं हो रहा है।

महामारी काल में बेरोजगारी और विस्थापन का जो दौर चला, उसके साथ-साथ बीच में ही पढ़ाई छोड़ देने वाले बच्चों की संख्या में भी इजाफा हुआ। यह नहीं भूलना चाहिए कि स्कूल सिर्फ शिक्षा देने का काम नहीं करते, अपितु वे ऐसे बच्चों के लिए सुरक्षा कवच का काम भी करते हैं जिनका पारिवारिक और सामाजिक परिवेश उनके लिए असुरक्षित होता है। स्कूलबंदी का निहितार्थ इन बच्चों के लिए उस कवच का छिन जाना है। भयानक गरीबी में फंस चुके इनके माता-पिता इन्हें अतिरिक्त आय के लिए घरेलू नौकर या खेत मजदूर बनने की दिशा में धकेल सकते हैं। स्कूल का साथ छूटने से बाल विवाह और बाल तस्करी के दलदल में भी इनके फंसने की आशंका रहती है।

अब जब धीरे-धीरे देश में स्कूल खुलने लगे हैं तब स्कूलबंदी के दौरान पैदा हुए शैक्षणिक अंतराल को पाटने की दिशा में विशेष प्रयास किए जाने की जरूरत है। जैस-तैसे पाठ्यक्रम पूरा कर देने और परीक्षाओं के आयोजन की कवायद से अपेक्षित परिणाम नहीं मिलने वाले। विषयवार हुई क्षति का मूल्यांकन करते हुए पाठ्यक्रम के समायोजन की दिशा में अविलंब कदम उठाने की जरूरत है। स्कूलों में विभिन्न स्तरों पर सतत और व्यापक मूल्यांकन को प्रोत्साहित करना होगा। बच्चों ने अभी तक क्या सीखा और कहां उन्हें समस्याएं आ रही हैं, इसका मूल्यांकन होना चाहिए। इस काम में शिक्षकों को छूट दी जानी चाहिए।

लंबित पड़े मूल्यांकन सुधारों को लागू करने का भी अब वक्त? आ गया है। कोरोना की तीसरी लहर की आशंका के मद्देनजर स्कूली शिक्षा के क्षेत्र में विशेष कदम उठाने की जरूरत है, ताकि पढ़ाई छोड़ चुके बच्चों को वापस स्कूल तक लाया जा सके जिससे आगे की पढ़ाई बाधित न हो। स्वाध्याय के लिए शैक्षणिक सामग्री का विकास करना और उन्हें विद्यार्थियों के बीच वितरित करना इस दिशा में एक बड़ी पहल हो सकती है। विद्यालय के बंद रहने की स्थिति में भी बच्चे इसका इस्तेमाल कर सकते हैं। मुफ्त इंटरनेट के साथ कंप्यूटर आदि का वितरण और उनके प्रयोग हेतु प्रशिक्षण भी अपेक्षित है।

लेकिन स्कूली शिक्षा की दिशा में कोई भी बदलाव और सुधार तब तक संभव नहीं है जब तक हम इस हकीकत को स्वीकार न करें कि महामारी ने स्कूली शिक्षा पर बहुत ही ज्यादा नकारात्मक असर डाला है। हमें पहले मानना होगा कि हाशिए के बच्चों को अपने साथी सहपाठियों से इसने इतना पीछे धकेल दिया है कि शायद बराबरी करना अब उनके लिए संभव न हो पाए। अगर हम इस शैक्षणिक अंतराल को पाटने की दिशा में योजनाबद्ध ढंग से अविलंब कार्य शुरू नहीं करते हैं तो यह अंतर बढ़ता ही जाएगा।

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