आभासी मुद्रा का बुलबुला

आभासी मुद्रा को आधुनिक समय की महामारी कहने के पीछे सबसे अहम कारण इन मुद्राओं का आभासी होना, सरकारी नियंत्रण से बाहर होना और इनकी कीमतों का बेहद खतरनाक ढंग से चढ़ना है।

आभासी मुद्रा।

संजय वर्मा

आभासी मुद्रा को आधुनिक समय की महामारी कहने के पीछे सबसे अहम कारण इन मुद्राओं का आभासी होना, सरकारी नियंत्रण से बाहर होना और इनकी कीमतों का बेहद खतरनाक ढंग से चढ़ना है।

कोरोना काल में जिन आभासी (वर्चुअल) नियम-कायदों की बात जोरशोर से उठी है, उस चर्चा के एक केंद्र में आभासी मुद्रा कही जाने वाली बिटकाइन जैसी डिजिटल यानी क्रिप्टोकरंसी भी है। इन दिनों पूरी दुनिया में निवेश के लिए आभासी मुद्रा (क्रिप्टोकरंसी) की वकालत की जा रही है। आज बिटकाइन सहित सैकड़ों आभासी मुद्राएं हैं जो तमाम देशों के केंद्रीय बैंकों के नियमन के दायरे से बाहर हैं।

अल सल्वाडोर के अलावा दुनिया के किसी अन्य देश में बिटकाइन को लेनदेन का आधिकारिक यानी कानूनी दर्जा नहीं दिया गया है। पर दुनिया भर में निवेश के नए विकल्प के रूप में जिस तरह से इन मुद्राओं की खरीद-फरोख्त की होड़ मची है, उससे अर्थशास्त्रियों और सरकारों के कान खड़े हो गए हैं। भारत में भी केंद्र सरकार ने इस मुद्दे पर बड़ा फैसला लेने की तैयारी कर ली है। माना जा रहा है कि लोकसभा के शीतकालीन सत्र में केंद्र सरकार आभासी मुद्रा के नियमन पर एक व्यापक विधेयक पेश करेगी।

हाल में पूर्व वित्त राज्यमंत्री जयंत सिन्हा की अध्यक्षता वाली संसदीय समिति ने आभासी मुद्रा के गुण-दोषों पर चर्चा की, जिसमें इस पर प्रतिबंध लगाने के बजाय इसे विनियमित करने पर जोर दिया गया। हालांकि इस बैठक के अगले ही दिन भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर शक्तिकांत दास ने आभासी मुद्रा के भविष्य को लेकर अपनी चिंताएं जता दीं और इस मुद्दे पर फूंक-फूंक कर कदम बढ़ाने की बात कही है।

भारत अकेला देश नहीं है जहां आभासी मुद्रा की उठापटक और प्रचलन चिंता की वजह बन गया है। हाल में इंडोनेशिया की नेशनल उलेमा काउंसिल (एमयूआइ) ने आभासी मुद्रा को ‘हराम’ घोषित किया है। काउंसिल ने कहा कि चूंकि आभासी मुद्रा के चरित्र में अनिश्चितता, नुकसान और जुएबाजी जैसे तत्व शामिल हैं, इसलिए ये हराम है।

चीन ने भी इस साल सितंबर में बिटकाइन और अन्य आभासी मुद्राओं के सृजन और लेनदेन पर रोक लगा दी। चीन के केंद्रीय बैंक पीपुल्स बैंक आफ चाइना का कहना था कि ऐसी आभासी मुद्राएं जनता की जमापूंजी की सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा हैं। गौरतलब कि चीन दुनिया के सबसे बड़े आभासी मुद्रा बाजारों में से एक है। वहां आभासी मुद्रा में होने वाले उतार-चढ़ाव से अक्सर इन मुद्राओं की वैश्विक कीमतें प्रभावित होती रही हैं। इसलिए सितंबर में जब चीन ने बिटकाइन पर रोक लगाई तो उस दिन इसकी कीमत दो हजार डालर से ज्यादा गिर गई। हालांकि दुनिया के दूसरे हिस्सों में कोई ठोस नियमन नहीं होने की वजह से बिटकाइन आदि आभासी मुद्राओं का लेनदेन पूर्ववत रहा और इनकी कीमतों में फिर उछाल आ गया।

आज हालत यह हो गई है कि लोग रातों-रात अमीर बनने के लिए आभासी मुद्राओं में भारी निवेश कर रहे हैं। खासतौर से युवा आबादी में इसे लेकर एक किस्म का पागलपन देखा जा रहा है। इसका कारण यह है कि कुछ मामलों में आभासी मुद्राएं अकारण भारी रिटर्न देने वाली भी साबित हुई हैं। जैसे सबसे चर्चित आभासी मुद्रा बिटकाइन की कीमत कुछ ही वर्षों में चंद डालर से लेकर अब साढ़े पैंसठ हजार अमेरिकी डालर (लगभग उनचास लाख रुपए) पहुंच चुकी हैं।

डोजेकाइन, रिपल, इथिरम, लाइटकान, डैश जैसी कई अन्य सैकड़ों आभासी मुद्राएं सिर्फ निवेश के लिए लोगों को आकर्षित करने में सफल हुई हैं। लेकिन सरकारों, केंद्रीय बैंकों और समाजशास्त्रियों की सबसे बड़ी चिंता अब यह है कि कहीं आभासी मुद्रा को लेकर मची यह सनसनी वर्ष 2000 के डाटकाम बबल जैसी न साबित हो, जब वर्ष 2000 के आसपास कंप्यूटर और आइटी कंपनियों का कारोबार बढ़ते देख लोगों ने उनमें अनाप-शनाप पूंजी झोंक डाली थी और बाद में ज्यादातर कंगाल हो गए थे।

आभासी मुद्रा को आधुनिक समय की महामारी कहने के पीछे सबसे अहम कारण इन मुद्राओं का आभासी होना, सरकारी नियंत्रण से बाहर होना और इनकी कीमतों का बेहद खतरनाक ढंग से चढ़ना है। हालांकि मांग और आपूर्ति का बेहद नाजुक संतुलन साधने वाली आभासी मुद्राओं की सिरमौर बिटकाइन की सबसे बड़ी खूबी इसकी सीमित संख्या में छपाई-ढलाई है।

इसके निश्चित माडल और प्रचलन के पुख्ता नियमों की बदौलत दुनिया में सिर्फ दो करोड़ दस लाख बिटकाइन मौजूद हैं। निवेशकों में इसका आकर्षण इसीलिए है क्योंकि आभासी होने के बाद यह खरीदार के पास इसके मालिकाना हक का अहसास कराती है और इसके चोरी होने जैसे खतरे न्यूनतम हैं। लेकिन हाल में कर्नाटक से सामने आए बिटकाइन घोटाले ने आभासी मुद्रा की वेबसाइटों में सेंधमारी के खतरे को भी उजागर कर दिया। कर्नाटक में श्रीकृष्ण उर्फ श्रीकी ने बिटकाइन एक्सचेंज में सेंध लगा कर जिस तरह करोड़ों के बिटकाइन अपने खाते में डाल लिए, उससे इसके खरीदारों की पूंजी के कभी भी स्वाहा होने का खतरा साफ दिखने लगा है।

निवेशकों को आभासी मुद्रा की ओर जो दावा करते हुए लुभाया जाता रहा है, उसमें एक तर्क बिटकाइन आदि को डिजिटल गोल्ड की तरह निवेश का एक आकर्षक विकल्प बताना है। लेकिन ध्यान रहे कि सरकारी मुद्राओं से बाहर किसी भी चीज में निवेश उसके मूल दाम (फंडामेंटल वैल्यू) से तय होता है। मूल दाम ऐसी रकम होती है, जिसके आधार पर किसी संपत्ति के पैदा होने की उम्मीद रखी जाती है। मसलन यदि निवेशक किसी कंपनी में निवेश करता है तो ऐसा वह इस उम्मीद में करता कि आगे चल कर कंपनी मुनाफा कमाएगी।

इससे शेयर की बढ़ी हुई और लाभांश के रूप में निवेशक फायदा उठाने की स्थिति में होगा। इसी तरह केंद्रीय बैंकों की मुद्राओं को एक तय व्यवस्था के दायरे में लेनदेन का आसान जरिया माना जाता है क्योंकि उस मुद्रा पर छपी कीमत के बराबर रकम सरकार देने का वचन देती है। लेकिन आभासी मुद्रा के मामले में स्वर्ण या शेयर में निवेश और सरकारी मुद्राओं जैसे आश्वासन नहीं हैं। इनमें मूल दाम तय करने का कोई आधार या इसके एवज में दी जाने वाली संपत्ति मौजूद नहीं है।

आभासी मुद्रा में निवेश को लेकर आकर्षण इसलिए भी बना हुआ है क्योंकि सरकारी तंत्र से बाहर दुनिया के किसी भी कोने इन्हें भुनाने का विकल्प मौजूद है। आभासी मुद्रा की आपूर्ति और भंडार को सोने की तरह सीमित होने के तर्क से भी जोड़ा जाता है। इनकी कीमतों में इजाफे के पीछे इस तर्क को कुछ हद तक काम करते हुए देखा भी गया है, लेकिन सोने के साथ तुलना करने पर देखें तो पाएंगे कि सोने का एक भौतिक अस्तित्व है, जबकि बिटकाइन आदि का वजूद विशुद्ध आभासी है। यही वजह है कि एलन मस्क जैसे अरबपतियों के एक ट्वीट या बड़ी सरकारों की ओर से प्रतिबंध की खबरों के साथ आभासी मुद्रा की कीमतों के धराशायी होने में भी वक्त नहीं लगता है।

अगर बात प्रचलित सरकारी मुद्राओं के समकक्ष लेनदेन में सरल कंप्यूटरीकृत मुद्रा बनाने की है, तो इसकी कोशिश खुद सरकारों को करनी चाहिए। सरकारें अपनी एक आभासी मुद्रा तैयार करें। लक्ष्मीकाइन के रूप में इसका एक विचार कुछ वर्ष पहले आ भी चुका है। बात चाहे डिजिटल मुद्रा की हो या आभासी मुद्रा की, मोबाइल-इंटरनेट से आसान भुगतान का एक विकल्प जनता को देना एक अच्छी पहलकदमी हो सकती है।

इन मुद्राओं के लेनदेन को सुरक्षित करने और इनमें लगी आम जनता की रकम को महफूज रखने की जो भी चुनौतियां हैं, उनसे उबरने के नए रास्ते खोजने ही होंगे, क्योंकि ये बदलते वक्त की मुद्राएं हैं। आगे का जमाना इन्हीं का है, अच्छा है कि अभी से इन्हें सावधानीपूर्वक बरतने के इंतजाम कर लिए जाएं।

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