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विकास के शोर में बदहाल गांव

ग्रामीणों का मानना है कि गांवों में रोजगार भी नहीं है, जिसके जरिए लोग अपने पूरे परिवार का पेट पाल सकें।

इस गांव में प्रधानमंत्री से लेकर राष्ट्रपति तक हैं रहते। (Representative Image)

देश के विकास का रास्ता गांव की गलियों से होकर ही गुजरता है। मगर तमाम दावों, वादों और योजनाओं के बावजूद आज भी गांवों की तरफ विकास अपना रुख नहीं कर पाया है, जिससे तरक्की का रास्ता और गुलजार हो सके। सरकार बनवाने में ग्रामीणों का विशेष योगदान होता है, लेकिन चुनाव के बाद गांव की तरफ शायद ही कोई जनप्रतिनिधि रुख करता हो। चुनाव जीतने के बाद वह पूरे पांच साल तक उसे भूल जाता है। कुछ विरले होते हैं, जो अपने क्षेत्र में लगातार संपर्क बनाए रखते हैं। यह उदासीनता ठीक नहीं है। विधानसभा चुनाव का एलान होने के बाद लोग वहां अपने काम और जाति की दुहाई देकर वोट मांगते नजर आते हैं। आर्थिक सामाजिक जातिगत सर्वेक्षण यानी एसइसीसी के आंकड़ों के मुताबिक फिलहाल देश के गांवों में कुल 17.19 करोड़ परिवार निवास करते हैं। एसइसीसी-2011 के आंकड़ों के अनुसार, देश में कुल 73.44 प्रतिशत परिवार ग्रामीण क्षेत्रों में निवास करते हैं। उत्तर प्रदेश में ग्रामीण परिवारों का औसत आकार 6.26 है। इसके बाद लक्षद्वीप (5.86) और बिहार (5.54) का स्थान है। इस सूची में सबसे अंतिम स्थान पर आंध्र प्रदेश है, जिसका ग्रामीण परिवारों का औसत आकार 3.86 है। सामाजिक, आर्थिक और जाति जनगणना-2011 के आंकड़ों के अनुसार, देश की 35.73 प्रतिशत ग्रामीण आबादी (31.57 करोड़) अशिक्षित है। देश में छप्पन प्रतिशत ग्रामीण परिवार आज भी भूमिहीन हैं, जबकि चौवालीस प्रतिशत ग्रामीण परिवारों के पास किसी न किसी प्रकार की भूमि है।

देश में 5.32 करोड़ (29.70 प्रतिशत) ग्रामीण परिवारों के पास असिंचित भूमि है और 4.59 करोड़ (25.63 प्रतिशत) ग्रामीण परिवारों के पास सिंचित भूमि है। देश के 64.88 लाख (3.62 प्रतिशत) ग्रामीण परिवारों के पास पचास हजार और इससे अधिक की मानक सीमा के किसान क्रेडिट कार्ड हैं। देश के 6.99 लाख (0.39 प्रतिशत) भूमिहीन परिवारों के पास किसान क्रेडिट कार्ड हैं।पचास हजार रुपए और इससे अधिक की मानक सीमा के किसान क्रेडिट कार्ड धारक की दृष्टि से सर्वाधिक 9.63 प्रतिशत किसान क्रेडिट कार्ड धारक ग्रामीण परिवार हरियाणा में हैं। इसके बाद राजस्थान (8.42 प्रतिशत) और पंजाब (8.20 प्रतिशत) का स्थान है। उत्तर प्रदेश में 7.48 प्रतिशत ग्रामीण परिवार किसान क्रेडिट कार्ड धारक हैं और क्रम की दृष्टि से इसका चौथा स्थान है। देश के 5.39 करोड़ (30.10 प्रतिशत) ग्रामीण परिवारों की आय का मुख्य स्रोत खेती है। खेती पर निर्भर सबसे कम ग्रामीण परिवार (1.35 प्रतिशत) चंडीगढ़ में हैं। उत्तर प्रदेश में 40.04 फसदी ग्रामीण परिवारों की आय का मुख्य स्रोत खेती है।

इस आधार पर गांवों में ज्यादा विकास नहीं हो सका है। आज भी बहुत सारे गांवों में स्कूल, अस्पताल, स्वच्छ पेयजला, सिंचाई के साधन, कृषि, कुटीर उद्योग जैसी मूलभूत सुविधाओं की भारी कमी है। इन सबको ठीक करने के लिए अगर ग्राम पंचायतों को जिम्मेदारी दी जाए तो सरकार का भी कुछ बोझ कम किया जा सकता है।गांवों के विकास के लिए शासन की न कोई योजनाबद्ध प्रणाली है और न ही विकास कार्यों को लेकर इच्छाशक्ति दिखाई देती है। इसी के चलते निरंतर व्याप्त निराशा और भविष्य कीचिंता में गांवों से भारी संख्या में लोग पलायन कर चुके हैं। उत्तर प्रदेश में आज भी ऐसे बहुत से गांव ऐसे हैं, जहां अभी तक बिजली नहीं पहुंची है। अगर पहुंची भी है तो सिर्फ खंभे लगे हैं। इसका सीधा उदाहरण फतेहपुर का गढ़ा क्षेत्र है, जहां चिकित्सा के लिए ग्रामीण लोगों को आज भी झोलाछाप के भरोसे ही रहना पड़ता है। बुंदेलखंड के कई ऐसे गांव हैं, जहां आज भी पेयजल के लिए सिर पर पानी उठा कर लंबी दूरी तय करनी पड़ती है। पेयजल की अधिकतर लंबी पाइप लाइनें क्षति ग्रस्त हैं और समुचित देखरेख के अभाव में काम नहीं कर रहीं। इससे अधिकतर ग्रामीण दूषित पानी पीने को बाध्य हैं।

ग्रामीणों का मानना है कि गांवों में रोजगार भी नहीं है, जिसके जरिए लोग अपने पूरे परिवार का पेट पाल सकें। घटती जोत, घटती पैदावार, पानी का नीचे जाता स्तर और बंजर होती जमीन जैसे करणों के चलते अनपढ़ और पढ़े-लिखे लोगों को रोजगार की तलाश में शहरों की ओर भागना पड़ रहा है। अच्छा रोजगार मिलने के बाद अपने परिवारों को भी वे शहर में ही बसा लेते हैं। चुनाव के समय राजनीतिक दलों को चाहिए कि वे विधानसभावार सही ढंग से सर्वेक्षण करा कर उन क्षेत्रों की समस्याओं को ध्यान में रख कर ही घोषणा-पत्र बनाएं। घोषणा-पत्र महज खोखला न बनाया जाए, उसकी बातों पर अमल भी किया जाए। हर विधानसभा के सबसे अविकसित गांवों को ज्यादा अच्छा बनाने का प्रयास जनप्रतिनिधियों को करना चाहिए। ग्रामीणों को सिंचाई की लिए पर्याप्त बिजली मुहैया कराना भी सरकार का नैतिक दायित्व है। अगर देश को विकास के रास्ते पर आगे बढ़ाना है, तो सबसे पहले गांवों का विकास जरूरी है और गांवों का विकास ग्राम पंचायतों की जागरूकता के बिना संभव नहीं है। गांवों के विकास के लिए जब भी कोई योजना तैयार की जाए या अमल में लाई जाए तो सबसे पहले योजना के महत्त्व के बारे में ग्रामवासियों, पंचायतों को पूर्ण जानकारी देकर जागरूक किया जाना चाहिए। साथ ही योजना को सफल बनाने के लिए पूरा दायित्व ग्राम पंचायतों को ही दिया जाए। गांव में समस्याओं का अंबार होता है। काम बहुत करने होते हैं। काम कहां से और कैसे शुरू करें इसके लिए जनप्रतिनिधियों को ग्रामसभा का भी सहारा लेना चाहिए। पंचायत घर को अच्छा और मजबूत बनाया जाना चाहिए। स्कूल, सड़क, पानी, अस्पताल को ज्यादा से ज्यादा विकसित किया जाना अनिवार्य है।

ग्रामीणों को मूलभूत सुविधाओं के साथ ज्यादा से ज्यादा रोजगार गांवों में उपलब्ध कराए जाएं, जिससे शहरों की तरफ पलायन रुके। ग्रामीणों को महज चुनाव के वक्त याद न किया जाए, बल्कि उनका खयाल चुनाव बाद भी रखा जाए। विकास का एजेंडा अगर सरकार बनने के बाद तुरंत लागू कर दिया जाए, तो ग्रामीणों का भरोसा राजनीतिक दलों पर और बढ़ेगा। सरकार की इतनी सारी योजनाएं आती और चली जाती हैं, लेकिन ग्रामीण आज भी उनसे अनजान बने रहते हैं। गांवों के पढ़े-लिखे नौजवानों को जागरूक बनाने की अवश्यकता है। चुनाव घोषणा-पत्र में ग्रामीण समस्याओं को ज्यादा शरीक किया जाना चाहिए। खेती पर आश्रित क्षेत्रों में सुविधाएं बढ़ाने की जरूरत है, इसलिए इस ओर भी ध्यान देना अनिवार्य है। देश की अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने में ग्रामीण लोग बहुत साहयक होते हैं। गांवों की याद सिर्फ चुनाव समय न रखी जाए। उन्हें उपेक्षित रखना ठीक भी नहीं है। जिन गांवों में मूलभूत सुविधाएं नहीं हैं, उनका खाका सबसे पहले तैयार किया जाना चाहिए, जिससे ज्यादा से ज्यादा लोग लाभ उठा सकें।

गांव देश की आत्मा हैं तो शहर शरीर। अगर गांव की आत्मा खत्म हो गई तो गांव का ढांचा कभी ठीक नहीं हो सकता है। गांव के व्यक्ति को कृषि गोवंश नस्ल सुधार, शिक्षा, स्वास्थ्य, स्वच्छता, जैविक खेती को बढ़ावा देने के लिए प्रेरित किया जाए। गांव के व्यक्ति में स्वाभिमान और स्वावलंबन आने से उसका शहरों की ओर पलायन नहीं होगा। ग्रामीणों के अंदर अपने गांव के प्रति लगाव होगा और उसे तीर्थ के रूप में देखेंगे। गांव के विकास से ही देश का विकास संभव है।गांवों के आसपास बाजार और भंडारण की पर्याप्त व्यवस्था होनी चाहिए, जिससे किसानों की फसल बर्बाद न हो और उन्हें उपज का उचित मूल्य मिले। सड़क, बिजली, खाद, बीज आदि की उपलब्धता सुनिश्चित होनी चाहिए। इसके लिए केंद्र और राज्य के बीच बेहतर तालमेल होना आवश्यक है। े

 

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