ऑनलाइन शिक्षा की चुनौतियां

ऑनलाइन शिक्षा के लिए बिजली के साथ-साथ स्मार्टफोन या कंप्यूटर और इंटरनेट की सुविधा का उपलब्ध होना प्रमुख शर्त है।

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सांकेतिक फोटो।

सुधीर कुमार

ऑनलाइन शिक्षा के लिए बिजली के साथ-साथ स्मार्टफोन या कंप्यूटर और इंटरनेट की सुविधा का उपलब्ध होना प्रमुख शर्त है। लेकिन इस मामले में हमारी स्थिति बहुत अच्छी नहीं है। 2017-18 के राष्ट्रीय प्रतिदर्श सर्वेक्षण रिपोर्ट की मानें तो देश के केवल चौबीस फीसद परिवारों के पास ही इंटरनेट की सुविधा है। ऐसे में आॅनलाइन शिक्षा कैसे समूचे देश के बच्चों को निर्बाध रूप से उपलब्ध होगी, यह बड़ा सवाल है।

महामारी के दौर में भारत में प्रौद्योगिकी संचालित शिक्षा की उपयोगिता को नया आयाम मिला है। देश की शिक्षा व्यवस्था इस वक्त यथाशक्ति आॅनलाइन व्यवस्था में ढलती जा रही है। देशभर के शैक्षणिक संस्थान सवा साल तक बंद ही रहे। हालांकि अब राज्यों ने शिक्षण संस्थानों को फिर से खोलने की दिशा में कदम बढ़ाए हैं। लेकिन अब आॅनलाइन शिक्षण एक व्यापक विकल्प के तौर पर स्थापित हो गया है। पर यह भी सच्चाई है कि महामारी ने स्कूल प्रबंधकों, कोचिंग संचालकों, अस्थायी शिक्षकों और कर्मचारियों की अर्थव्यवस्था और जीवन को गहरे तौर पर प्रभावित किया है। साथ ही, करोड़ों विद्यार्थियों का भविष्य भी अभी अधर में ही है।

भविष्य की चिंता के कारण वे हताशा और अवसाद के शिकार हो रहे हैं। शैक्षणिक संस्थानों के लंबे समय तक बंद रहने के कारण विद्यार्थियों का सर्वांगीण विकास भी प्रभावित हुआ है। स्कूल परिसर का वातावरण छात्रों में दायित्व बोध का भाव भरता है। स्कूल महज चंद कमरों की संरचना नहीं होती, बल्कि वहां बच्चे शिक्षा के साथ संस्कार और जीवन का पाठ भी सीखते हैं। स्कूल परिसर में सहपाठियों के साथ सामाजिकता का विकास होता है। बच्चों में एक सुसंस्कृत और जिम्मेदार नागरिक की नींव पड़ती है। ये कुछ ऐसी विशेषताएं हैं, जो आॅनलाइन शिक्षा के संदर्भ में लागू नहीं होती है।

लेकिन आॅनलाइन शिक्षा माध्यम का जो एक और पक्ष भी सामने आया है, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। तथ्य यह है कि देश के स्कूलों में प्रौद्योगिकी संचालित शिक्षा की स्थिति संतोषजनक नहीं है। इस मामले में हमारे स्कूल अभी भी बहुत पीछे हैं। महामारी ने देश में तकनीक आधारित शिक्षा की सही तस्वीर सामने रख दी। बुनियादी संरचना के अभाव, बिजली की किल्लत और महंगे और इंटरनेट की समस्या के कारण आॅनलाइन शिक्षा को मुकम्मल ऊंचाई नसीब नहीं हो पा रही है। हाल में आई एकीकृत जिला शिक्षा सूचना प्रणाली की 2019-20 की रिपोर्ट में बताया गया है कि देश के पंद्रह लाख स्कूलों में से केवल 38.54 फीसद स्कूलों में ही कंप्यूटर उपलब्ध हैं।

मध्यप्रदेश के महज 13.59, मेघालय के 13.63, पश्चिम बंगाल के 13.87, बिहार के 14.19 और असम के पंद्रह फीसद स्कूलों में ही कंप्यूटर की सुविधा उपलब्ध है। अगर बात करें स्कूलों में इंटरनेट उपलब्धता की, तो इस मामले में स्थिति और भी बुरी है। देश के केवल बाईस फीसद स्कूलों यानी पंद्रह लाख स्कूलों में से केवल तीन लाख तीस हजार स्कूलों में ही इंटरनेट की सुविधा है। केरल और दिल्ली के स्कूलों में क्रमश: अठासी और छियासी फीसद स्कूलों में इंटरनेट की सुविधा उपलब्ध है, लेकिन दूसरी तरफ त्रिपुरा में महज 3.85, मेघालय में 3.88 और असम में 5.82 फीसद स्कूलों में ही इंटरनेट कनेक्शन हैं। जाहिर है, तकनीकी शिक्षा और संचार के आधुनिकतम तकनीक से हमारे विद्यार्थी आज भी कोसों दूर हैं। तकनीकी युग में कंप्यूटर और इंटरनेट की गिनती मूलभूत सुविधाओं में होती है। आॅनलाइन शिक्षा के दौर में सरकारी स्कूलों के पिछड़ने की यह एक प्रमुख वजह है, जिस पर नीति-नियंताओं को सोचने की जरूरत है।

महामारी के कारण दुनियाभर में स्कूली शिक्षा बाधित हुई है। संक्रमण से बचाव की कोशिशों के तहत दुनिया के एक सौ नब्बे से अधिक देशों को अपने स्कूलों के दरवाजे बंद करने पड़े। यूनेस्को के मुताबिक कोविड-19 की शुरूआत के बाद दुनिया के एक सौ अड़तीस देशों के करीब डेढ़ अरब छात्रों की शिक्षा स्कूलों के बंद होने से बाधित हुई है। स्कूली शिक्षा में आए इस व्यवधान के बाद एक विकल्प के रूप में आॅनलाइन शिक्षा का प्रचलन तेजी से तो बढ़ा है, लेकिन इस तरह की शिक्षा की पहुंच हरेक तक नहीं हो पाई। इकोनॉमिस्ट इंटेलीजेंस यूनिट की एक रिपोर्ट बताती है कि स्कूलों के बंद रहने से दुनियाभर में एक अरब साठ करोड़ स्कूली बच्चों में से केवल दस करोड़ बच्चों की ही शिक्षा बाधित होने से बच पाई। यानी ऐसे बच्चे स्कूल बंद होने के बावजूद घर पर रह कर आगे की पढ़ाई कर पाने में सक्षम हो पाए हैं। इसका एकमात्र बड़ा कारण घर पर तकनीक की सुलभता की रहा।

लेकिन दूसरी तरफ आॅनलाइन शिक्षा की पहुंच से दूर करोड़ों बच्चों का भविष्य अधर में है। अगर भारत के संदर्भ में बात करें तो ग्रामीण इलाकों में या छोटे शहरों में तो स्मार्टफोन की अनुपलब्धता, बाधित विद्युत व्यवस्था, इलेक्ट्रॉनिक गैजेट खरीदने में असमर्थता और धीमे इंटरनेट जैसी समस्याओं ने बच्चों के भविष्य पर ग्रहण लगा दिया है। सरकारें भले ही देश में सौ फीसद विद्युतीकरण का सपना पूरा होने की बात कह कर अपनी पीठ थपथपा ले, लेकिन देश में विद्युतीकरण और विद्युत आपूर्ति की वास्तविक स्थिति किसी से छिपी नहीं है।

ग्रामीण विकास मंत्रालय द्वारा 2017-18 में कराया गया एक सर्वे बताता है कि देश में सोलह फीसद परिवारों को प्रतिदिन एक से आठ घंटे, तैंतीस फीसद परिवारों को नौ से बारह घंटे और सिर्फ सैंतालीस फीसद परिवारों को ही बारह घंटे से अधिक बिजली मिलती है। आॅनलाइन शिक्षा के लिए बिजली के साथ-साथ स्मार्टफोन या कंप्यूटर और इंटरनेट की सुविधा का उपलब्ध होना प्रमुख शर्त है। लेकिन इस मामले में हमारी स्थिति बहुत अच्छी नहीं है। 2017-18 के राष्ट्रीय प्रतिदर्श सर्वेक्षण रिपोर्ट की मानें तो देश के केवल चौबीस फीसद परिवारों के पास ही इंटरनेट की सुविधा है। ऐसे में आॅनलाइन शिक्षा कैसे समूचे देश के बच्चों को निर्बाध रूप से उपलब्ध होगी, यह बड़ा सवाल है।

दरअसल, हकीकत यह है कि देश के सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले अधिकांश बच्चे निम्न आय वर्ग के परिवारों से आते हैं। उनके पास न तो स्मार्टफोन की सुविधा होती है और न ही इंटरनेट पैक खरीदने की हैसियत। ऐसे परिवारों में गरीबी, जागरूकता और तकनीकी ज्ञान के अभाव में प्रौद्योगिकी संचालित शिक्षा की आवश्यकता को पर्याप्त महत्त्व नहीं दिया जाता है। ऐसे में देश के करोड़ों बच्चे चाह कर भी आॅनलाइन शिक्षा का लाभ नहीं उठा पाते। ग्रामीण क्षेत्रों के वे बच्चे जिनके पास संसाधनों का घोर अभाव है, आॅनलाइन शिक्षा के दौर में निश्चय ही पिछड़ जाएंगे। लंबे समय तक स्कूलों के बंद रहने से बच्चों की पढ़ाई का क्रम टूटा है। ऐसे में से पढ़ाई के प्रति मोह कम होना भी स्वाभाविक ही है। जब स्कूल दोबारा खुलेंगे तो जाहिर है कि बच्चों के लिए पढ़ाई में पुन: उसी प्रकार से जुटना आसान नहीं होगा। लाखों बच्चे तब तक स्कूल भी छोड़ चुके होंगे। महामारी ने बच्चों को स्कूल से जोड़ने की सारी कवायदों को भारी धक्का पहुंचाया है।

आॅनलाइन शिक्षा समाज में एक गहरा विभेद भी उत्पन्न कर सकती है। कुछ समय पहले यूनेस्को ने भारत को सचेत करते हुए कहा था कि शिक्षा पाने के लिए यह सोचना गलत है कि आॅनलाइन सीखना हर किसी के लिए आगे का रास्ता खोलता है, क्योंकि आॅनलाइन पढ़ाई से दूर-दराज के इलाकों में रह रहे बच्चे आॅनलाइन पढ़ाई नहीं कर सकते। इसलिए किसी खास वर्ग को दी जाने वाली शिक्षा सामाजिक विभेद को बढ़ाएगी। ऐसे में सरकार को इन बच्चों के भविष्य के बारे में भी सोचना चाहिए, जो स्कूल से दूर होकर अपने भविष्य को दांव पर लगाने को विवश हैं। 2020-21 के आर्थिक सर्वेक्षण में कहा गया था कि अगर आॅनलाइन शिक्षा का सही इस्तेमाल किया जाता है तो इससे शैक्षिक परिणाम में होने वाली असमानताएं खत्म होंगी। लेकिन क्या आॅनलाइन शिक्षा की सर्व-सुलभता के बिना इस असमानता को खत्म कर पाना मुमकिन होगा?

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