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राजनीति: तालिबान और भारत की दुविधा

तालिबान को लेकर भारत की कूटनीति फिलहाल दुविधा में है। इसके कई और मजबूत कारण हैं। तालिबान पश्तून जनजाति का संगठन है। पश्तून जनजाति में कई उप-जातियां हैं और इनमेंभी आपसी संघर्ष काफी ज्यादा हैं। दूसरी ओर, पश्तूनों की एक बड़ी आबादी उदारवादी सोच रखती है और उदारवादी पश्तून तालिबान के घोर विरोधी हैं।

अफगानिस्तान के लिए अमेरिकी विशेष प्रतिनिधि, राजदूत ज़ल्माय खलीलज़ाद, और तालिबान के राजनीतिक मामलों उप कमांडर मुल्ला अब्दुल गनी बरादर के बीच बातचीत। (फाइल फोटो)

अफगान शांति वार्ता के लिए तैनात अमेरिका के विशेष दूत जल्माय खलीलजाद ने भारत को तालिबान से बातचीत की सलाह दी है। खलीलजाद की सलाह के बाद बहस जोर पकड़ गई है कि भारत तालिबान से बातचीत करे या नहीं। पिछले साल जनवरी में भारत के नजदीकी अफगानिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति हामिद करजई ने भी भारत को तालिबान से बातचीत शुरू करने की सलाह दी थी। दरअसल, तालिबान की ताकत को अमेरिका मान चुका है। उधर, पाकिस्तान विरोधी कुछ अफगान नेता भी पाकिस्तान के प्रभाव को कम करने के लिए भारत और तालिबान के बीच बातचीत चाहते हैं।

वैसे तालिबान भी अफगानिस्तान में भारत की मजबूत मौजूदगी को स्वीकार करता है। हाल में कई तालिबान कमांडरों ने साफ तौर संकेत दिए हैं कि वे भारत से बातचीत को इच्छुक हैं। वे अफगानिस्तान में भारत का महत्त्व स्वीकार करते हैं। अफगान तालिबान पाकिस्तानी नियंत्रण से निकलने की कोशिश भी कर रहा है। हालांकि इससे भी इंकार नहीं किया जा सकता है कि आइएसआइ अभी भी तालिबान के एक बड़े गुट को नियंत्रण में रखे हुए है। वहीं भारत विरोधी जैश-ए-मोहम्मद और लश्कर-ए-तैयबा के तालिबान के साथ अच्छे संबंध हैं। जैश और लश्कर के आतंकी पिछले चार दशक से अफगानिस्तान की धरती पर मौजूद हैं और तालिबान को सहयोग दे रहे हैं।

भारत को अफगानिस्तान की वस्तुस्थिति का परीक्षण यथार्थ के धरातल पर करना होगा। वस्तुस्थिति यह है कि अमेरिकी सैनिकों की मौजूदगी के बावजूद अफगान तालिबान अफगानिस्तान के कई इलाकों पर नियंत्रण करने में कामयाब रहा है। अफगानिस्तान के वर्तमान राष्ट्रपति अशरफ गनी पूर्व राष्ट्रपति हामिद करजई की तरह मजबूती से तालिबान से लड़ नहीं पाए। अशरफ गनी के कार्यकाल में तालिबान मजबूत हुआ। कंधार और हेलमंद जैसे प्रांत में तालिबान इस समय बहुत मजबूत है। अफगानिस्तान के पूर्वी राज्यों में भी तालिबान पहले से मजबूत हुआ है। सच्चाई तो यह है कि इस समय अफगानिस्तान के सत्तर फीसद इलाके में तालिबान की मौजूदगी है। दस से पंद्रह फीसद इलाके पर तालिबान का पूरा कब्जा है। कई इलाकोंमें तालिबान सक्रिय है।

काबुल पर कई हमले कर तालिबान ने अपनी ताकत दिखाई है। दूसरी तरफ अमेरिका ने तालिबान से शांति समझौता कर तालिबान को और मजबूत बना दिया है। एसी स्थिति में भारत के लिए एक विकल्प तालिबान से बातचीत भी है। हालांकि तालिबान को अभी भी भारत आतंकी संगठन ही मानता है।

अगर भारत तालिबान से बातचीत का रास्ता खोलता भी है तो कई व्यावहारिक समस्याएं आएंगी। इसकी बड़ी वजह अफगान जनजातियों का आपसी संघर्ष है। पश्तून विरोधी जनजातियां उज्बेक और ताजिक पाकिस्तान की घोर विरोधी हैं। ये भारत के साथ रही हैं। यहां की चार प्रमुख जनजातियों में से एक पश्तून बेशक मजबूत है, लेकिन उज्बेक, ताजिक और हजारा जनजातियों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। इन जनजातियों के बीच लंबे समय से संघर्ष चल रहे हैं।

संघर्ष का एक कारण जातीय है। संघर्ष का दूसरा कारण सत्ता और संसाधन पर कब्जे का प्रयास है। अफगानिस्तान की कुल आबादी में बयालीस फीसद पश्तून और सत्ताईस फीसद ताजिक हैं। तीसरी प्रमुख जनजाति हजारा है जो तालिबान से सबसे ज्यादा नफरत करती है।

हजारा शिया समुदाय है और इसे ईरान का समर्थन हासिल है। भारत को यह पता है कि वर्तमान में अफगान प्रशासन में शामिल ताजिक और उज्बेक नेता भारत और तालिबान के बीच किसी भी तरह की वार्ता को पसंद नहीं करेंगे। भारत की समस्या यह भी है कि अफगान नेशनल आर्मी में हजारा, ताजिक और उज्बेक जनजाति के लोग काफी हैं। पश्तून विरोधी इन जनजातियों का भारत पर लंबे समय से विश्वास है। उज्बेक और ताजिक जनजाति के युवा लंबे समय से भारत में शिक्षा ग्रहण करने आ रहे हैं।

तालिबान को लेकर भारत की कूटनीति फिलहाल दुविधा में है। इसके कई और मजबूत कारण हैं। तालिबान पश्तून जनजाति का संगठन है। पश्तून जनजाति में कई उप-जातियां हैं और इनमेंभी आपसी संघर्ष काफी ज्यादा हैं। दूसरी ओर, पश्तूनों की एक बड़ी आबादी उदारवादी सोच भी रखती है और उदारवादी पश्तून तालिबान के घोर विरोधी हैं। राष्ट्रपति अशरफ गनी और पूर्व राष्ट्रपति हामिद करजई भी उदारवादी पश्तून हैं। उदारवादी पश्तून नेता शुरू से ही तालिबान का विरोध कर रहे हैं। भारत का संकट यह भी है कि सिर्फ ताजिक और उज्बेक ही नहीं, बल्कि पश्तूनों का उदारवादी धड़ा भी भारत की तालिबान से बातचीत का विरोध करेगा।

मौजूदा अफगान सरकार भी इसे पसंद नहीं करेगी। हालांकि पिछले साल जब अफगान शांति वार्ता चल रही थी तो हामिद करजई ने भारत को भी तालिबान से बातचीत की सलाह दी थी। इसका एक और कारण भी बताया जाता है। शांति वार्ता में शामिल अफगान तालिबान का कमांडर मुल्ला अब्दुल गनी बरादर के हामिद करजई से अच्छे संबंध हैं, क्योंकि बरादर और करजई दोनों पोपलजई कबीले से आते हैं।
लेकिन भारत की समस्या यहीं खत्म नहीं होती। अफगान तालिबान में दो मजबूत गुट काम कर रहे हैं। इसमें एक क्वेटा शूरा और दूसरा हक्कानी नेटवर्क है। हक्कानी नेटवर्क पाकिस्तानी सेना का खासा नजदीक है और भारत का घोर विरोधी भी। इसका मुखिया सिराजुद्दीन हक्कानी अफगान तालिबान में काफी मजबूत स्थिति में है।

यह भी ध्यान रखना होगा कि अमेरिका के साथ शांति वार्ता में तालिबान की तरफ से शामिल तालिबान कमांडर शेर मोहम्मद अब्बास स्थानकजई बेशक पाकिस्तानी सेना के नजदीकी रहे हों, लेकिन जमीनी सच्चाई यह भी है कि भारत से उनका गहरा रिश्ता रहा है। वे तालिबान के शासनकाल में राज्यमंत्री थे। स्थानकजई ने देहरादून की भारतीय सैन्य अकादमी में प्रशिक्षण लिया था।

तालिबानी कमांडरों की प्रारंभिक शिक्षा और प्रशिक्षण पाकिस्तान के देवबंदी मदरसों में हुई है, इसलिए पाकिस्तान के सैन्य प्रतिष्ठान का उन पर प्रभाव होना लाजिमी है। लेकिन एक सच्चाई यह भी है कि अफगान तालिबान ने पश्तून गौरव को अभी तक नहीं छोड़ा है। वे हमेशा से पाकिस्तानी हुक्मरानों को शक की निगाह से देखते रहे हैं। समय-समय पर उनसे विद्रोह भी किया है। पाकिस्तानी सैन्य प्रतिष्ठान की निंदा भी की। कई तालिबानी कमांडर पाकिस्तानी हुक्मरानों को झूठा, दो जीभ और दो मुंह वाला बताते रहे हैं।

हक्कानी नेटवर्क बेशक मजबूत हो, लेकिन कई तालिबान कमांडर पाकिस्तान से स्वतंत्र होकर अपना भविष्य तय करना चाहते हैं। यही कारण है कि पाकिस्तान के तमाम विरोध के बावजूद अफगान तालिबान एक धड़े ने ईरान से रिश्ते बनाने में संकोच नहीं किया। पिछले साल अमेरिकी हमले में मारे गए ईरानी सैन्य कमांडर कासिम सुलेमानी से अफगान तालिबान ने अच्छे संबंध बना लिए थे। यह भी सच्चाई है कि अफगान तालिबान ने डूरंड लाइन को स्वीकार नहीं किया है।

अफगान तालिबान के कई कमांडर भारत का क्षेत्रीय महत्त्व समझते हैं। वे पश्तून जनजाति और भारत के अच्छे संबंधों की जानकारी भी रखते हैं। तालिबान कमांडरों को यह भी पता है कि पश्तून जनजाति की बड़ी आबादी जो पाकिस्तानी मदरसों से दूर रही है, भारत को अपना मित्र मानती है। पाक-अफगान सीमा के दोनों ओर पश्तूनों की बड़ी आबादी पाकिस्तानी हुक्मरानों को पसंद नहीं करती। पाकिस्तान का पश्तून तहफ्फूज मूवमेंट इसका एक उदाहरण है। ऐसे में तालिबान को लेकर नई रणनीति बनाने की जरूरत है।

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