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पाक पर अमेरिकी मेहरबानी के मायने

अमेरिकी रक्षा विभाग ने पाकिस्तान को आठ एफ-16 फाइटर जेट बेचने के सौदे पर मुहर लगा दी है। सत्तर करोड़ डॉलर के इस सौदे के तहत पाकिस्तान को लॉकहीड मार्टिन ग्रुप के इन जहाजों के अलावा रडार और बाकी उपकरण भी मिलेंगे। ये लड़ाकू विमान हर तरह के मौसम में हमला कर सकते हैं। अमेरिका […]

Author नई दिल्ली | February 19, 2016 2:01 AM
एफ-16 विमान एक M-61A1 20मिमी मल्टीबैरल कैनन विथ 500 राउंड, 6 एयर टु एयर, 2 एयर टु ग्राउंड एक साथ ले जाने में सक्षम है। (फाइल फोटो)

अमेरिकी रक्षा विभाग ने पाकिस्तान को आठ एफ-16 फाइटर जेट बेचने के सौदे पर मुहर लगा दी है। सत्तर करोड़ डॉलर के इस सौदे के तहत पाकिस्तान को लॉकहीड मार्टिन ग्रुप के इन जहाजों के अलावा रडार और बाकी उपकरण भी मिलेंगे। ये लड़ाकू विमान हर तरह के मौसम में हमला कर सकते हैं। अमेरिका से दूसरे देशों को हथियार बेचने का काम देखने वाली पेंटागन की डिफेंस सिक्युरिटी को-आॅपरेशन एजेंसी ने इस सौदे को मंजूरी दी है। एजेंसी ने कहा कि हम ये फाइटर जेट इसलिए दे रहे हैं, ताकि पाकिस्तान की खुद की हिफाजत करने की ताकत बढ़े। वह आतंकवाद विरोधी अभियान को भी मजबूती से अंजाम दे सके। अमेरिका का यह फैसला इसलिए ज्यादा ध्यान आकर्षित करता है क्योंकि रिपब्लिकन और डेमोक्रेटिक दोनों ही दलों के प्रभावशाली सांसदों के बढ़ते विरोध के बावजूद अमेरिकी विदेश मंत्रालय ने कांग्रेस को सूचित किया है कि वह पाकिस्तान सरकार को एफ-16 ब्लॉक 52 विमान, उपकरण, प्रशिक्षण और साजोसामान से जुड़े सहयोग वाली विदेशी सैन्य बिक्री को मंजूरी दे रहा है।

जाहिर है, ओबामा प्रशासन का यह बहुत बड़ा फैसला है। हालांकि इससे पहले अप्रैल महीने में अमेरिकी विदेश विभाग ने एक अरब डॉलर की लागत वाले सैन्य सामान और उपकरण पाकिस्तान को देने की स्वीकृति दी थी। लेकिन वहां के माहौल को देखते हुए ऐसा लग रहा था कि पाकिस्तान के साथ इस सौदे को अमेरिका शायद मंजूर न करे। सीनेट की विदेश संबंध समिति के अध्यक्ष सीनेटर बॉब कोर्कर ने ओबामा प्रशासन से पहले कहा था कि वे पाकिस्तान को जेट बेचने के लिए अमेरिकी फंड का इस्तेमाल नहीं होने देंगे। पाकिस्तान अगर विमान चाहता है तो वह खुद के बूते खरीदे। अमेरिका इस सौदे का छियालीस प्रतिशत व्यय नहीं उठाएगा। पाकिस्तान के पास आठ एफ-16 में से चार जहाज, रडार और इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर सिस्टम खरीदने लायक भी कोष नहीं है।

सीनेटर कोर्कर ने अमेरिका के विदेशमंत्री जॉन कैरी को पत्र लिख कर कहा था कि पाकिस्तान के रिश्ते हक्कानी नेटवर्क से हैं। इस वजह से पाकिस्तान को कोई हथियार नहीं बेचा जाना चाहिए। यही नहीं, अमेरिकी सांसदों ने पिछले साल मांग की थी कि अमेरिका पाकिस्तान जैसे चुगलखोर और मुखबिरी करने वाले देश को हथियार न बेचे। सांसदों ने यह भी कहा कि पाकिस्तान लगातार आतंकियों का समर्थन कर रहा है, इसलिए उस पर भरोसा नहीं किया जा सकता।

सांसद टेड पोए ने उसामा बिन लादेन को ऐबटाबाद में मार गिराए जाने की घटना का जिक्र करते हए कहा था कि अगर उस वक्त अमेरिका ने पाकिस्तान को यह बताया होता कि वह लादेन पर कार्रवाई करने वाला है तो पाक ने यह बात लादेन तक पहुंचा दी होती। एक सांसद डाना रोहाब्राशर ने पाकिस्तान को धोखेबाज बताते हुए उसे ‘बेनेडिक्ट अर्नाल्ड’ कहा था। बता दें कि सत्रहवीं सदी में बेनेडिक्ट एक अमेरिकी जनरल था, जिसने अपनी ही फौज को धोखा देते हुए ब्रिटेन की मदद की थी।

ओबामा प्रशासन ने इन सारे विरोधों को नजरअंदाज करके अलोकप्रियता का जोखिम उठाते हुए अगर फैसला किया है तो उसके कुछ कारण होंगे। ध्यान रखिए, इस सौदे से दो दिन पहले ही अमेरिका ने पाकिस्तान को मोटी राशि की भी मदद दी है। इसके पक्ष में बोलते हुए विदेशमंत्री जॉन कैरी ने कहा कि इससे पाकिस्तान को आतंकवाद से लड़ने में मदद मिलेगी तथा यह भारत के साथ संबंधों को सामान्य बनाने में भूमिका निभाएगा। उन्होंने यह भी कहा कि इससे अफगानिस्तान में आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में अमेरिका को पाकिस्तान सहयोग कर सकेगा। इस तर्क से हम-आप सहमत हों या न हों, अमेरिका इसी मत से, कई बार न चाहते हुए भी, पाकिस्तान को धन व हथियार मुहैया कराता है।

पाकिस्तान को अमेरिका ने पिछले चौदह सालों में यानी जब से आतंकवाद-विरोध युद्ध आरंभ हुआ, 1820 अरब रुपए की मदद दी है। आरोप है कि पाकिस्तान ने ज्यादातर मदद का इस्तेमाल भारत के खिलाफ अपनी ताकत बढ़ाने में और सरकारी खर्चे निकालने में किया। उदाहरण के लिए, पिछले साल अमेरिका से मिले पचास करोड़ रुपए पाक सरकार ने बिलों का भुगतान करने और विदेशी मेहमानों को तोहफे देने में खर्च कर दिए। अमेरिका इन सूचनाओं को नजरअंदाज करता है।

पाकिस्तान को एफ-16 देने संबंधी अमेरिका का तर्क देखिए। यह प्रस्तावित बिक्री दक्षिण एशिया में एक रणनीतिक सहयोगी की सुरक्षा में सुधार में मदद करके अमेरिकी विदेश नीति और राष्ट्रीय सुरक्षा के लक्ष्यों में अपना योगदान देती है। प्रश्न है कि अमेरिकी विदेश नीति का दक्षिण एशिया में लक्ष्य क्या है? अगर पाकिस्तान उसका रणनीतिक सहयोगी है तो भारत भी रणनीतिक सहयोगी है। ओबामा प्रशासन के इस फैसले के बाद भारत ने दिल्ली में मौजूद अमेरिकी राजदूत को तलब किया। विदेश मंत्रालय ने कहा कि पाकिस्तान का रिकॉर्ड बताता है कि वह हथियार बेचे जाने लायक देश नहीं है। हम ओबामा प्रशासन के फैसले से निराश हैं।

राजदूत को तलब करना सामान्य बात नहीं है। स्पष्ट है कि भारत ने अपनी नाखुशी प्रभावी तरीके से पहुंचा दी है। लेकिन पेंटागन ने बयान में कहा कि इससे क्षेत्र में सामान्य सैन्य संतुलन प्रभावित नहीं होगा। प्रस्तावित बिक्री मौजूदा और भविष्य के सुरक्षा से जुड़े खतरों से निपटने में पाकिस्तान की क्षमता में सुधार लाती है। इसके अनुसार ये अतिरिक्त एफ-16 विमान हर मौसम में, दिन-रात अभियान चलाने में मदद करेंगे, आत्म-रक्षा क्षमता प्रदान करेंगे और उग्रवाद-रोधी व आतंकवाद-रोधी अभियान चलाने की पाकिस्तान की क्षमता को बढ़ाएंगे। पाकिस्तान के पास हथियारों की कमी है ऐसा नहीं माना जा सकता। पाकिस्तान के पास अभी सत्तर से ज्यादा एफ-16 लड़ाकू जेट हैं। उसकी वायुसेना के पास फ्रांस और चीन के बने मारक विमान भी हैं।

हालांकि कुछ विश्लेषकों का मानना है कि अभी यह नहीं मानना चाहिए कि सौदा हो ही गया है। पेंटागन से सौदे पर मुहर लगने के बाद अमेरिकी सांसदों के पास तीस दिनों का वक्त होगा। इस दौरान वे पाकिस्तान को लड़ाकू विमान बेचने के कदम पर रोक भी लगा सकते हैं। पर अब इसकी संभावना अत्यंत क्षीण है। अमेरिकी सांसदों ने ऐसा नहीं किया तो ओबामा प्रशासन की तरफ से अधिसूचना जारी होगी और सौदे पर काम शुरू हो जाएगा। अगर पाकिस्तान को एफ-16 मिल जाता है तो भारत की तुलना में वह कहां होगा। भारत को राफेल विमान मिलने वाला है। दोनों के बीच एक तुलना आवश्यक है। भारत ने स्वयं तेजस विमान विकसित भी किया है। इसी तरह चीन के पास रूस से मिला सुखोई-27 है।

इनकी तुलना करें तो अमेरिका की लॉकहीड मार्टिन द्वारा निर्मित एफ-16 की अधिकतम गति ढाई हजार किलोमीटर प्रतिघंटा है। फ्रांस की दासौ द्वारा निर्मित राफेल की गति लगभग इतनी ही है, तेईस सौ किमी से ज्यादा। भारत के हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड द्वारा निर्मित तेजस की गति बाईस सौ किमी प्रतिघंटा है, तो चीन के पास स्थित रूस के सुखोई की ढाई हजार किमी प्रतिघंटा। अगर इस आधार पर विचार करें कि एक बार में इनका रेंज कितना है तो क्रमश: इस प्रकार होगा चौबीस सौ किलोमीटर, सैंतीस सौ किलोमीटर, बत्तीस सौ किलोमीटर व साढ़े तीन हजार किलोमीटर। इसी तरह इनकी क्षमता देखिए। मिसाइलें 6 एयर टु एयर, 2 एयर टु ग्राउंड, 6 सुपरसोनिक मिसाइलें, 6 एयर टु एयर, एयर टु सरफेस क्रूज मिसाइलें, 5 क्रूज मिसाइलें।

पाकिस्तान को आत्मरक्षा किससे चाहिए? क्या भारत से? चलिए इस प्रश्न के जवाब का इंतजार करें। इन एफ-16 लड़ाकू विमानों का इस्तेमाल भारत के खिलाफ किए जाने से जुड़ी भारत की आशंकाओं के बारे में पूछे जाने पर अमेरिकी विदेश मंत्रालय के अधिकारी ने कहा, मुझे स्पष्ट तौर पर बता लेने दीजिए, किसी भी हथियार के हस्तांतरण से पहले हम क्षेत्रीय सुरक्षा और कुछ अन्य कारकों को ध्यान में रखते हैं। हमारा मानना है कि हमारी सुरक्षा-मदद एक ज्यादा स्थायी और सुरक्षित क्षेत्र के लिए योगदान देती है। विदेश मंत्रालय के अधिकारी ने कहा, अमेरिका क्षेत्र में अपने सुरक्षा सहयोग को किसी के लाभ और किसी के नुकसान के आधार पर नहीं देखता। पाकिस्तान, भारत और अफगानिस्तान के साथ हमारे सुरक्षा संबंध अलग-अलग हैं, लेकिन हर संबंध अमेरिकी हित और क्षेत्रीय स्थिरता को आगे बढ़ाता है।

अमेरिका की ओर से कहा गया है कि ये अभियान पाकिस्तानी क्षेत्र का इस्तेमाल आतंकवाद की शरणस्थली और अफगानिस्तान में उग्रवाद को बढ़ावा देने वाले आधार के तौर पर किए जाने की आतंकियों की क्षमता को कम करते हैं। अधिकारी ने कहा कि ये अभियान पाकिस्तान और अमेरिका, दोनों के राष्ट्र-हित में हैं। इसके साथ-साथ यह पूरे क्षेत्र के हित में है। तो यह है अमेरिका का जवाब।

आखिर इस क्षेत्र में अमेरिकी हित क्या है? क्षेत्रीय स्थिरता की उसकी सोच क्या है? आतंकवाद विरोधी अभियान चलाने में वह कितना मदद करता है यह भी देखना होगा। यह उसका विश्लेषण है और हमें देखना होगा कि क्या वाकई नवाज शरीफ सरकार इतनी बदल गई है कि इसका इस्तेमाल वह पाकिस्तान में आतंकवाद के खात्मे व अफगानिस्तान में आतंकवाद-विरोधी युद्ध में करेगी? लेकिन अमेरिका कुछ भी कहे, इससे भारत की चिंता तो बढ़ेगी, जिसे उसने स्पष्ट कर दिया है। स्वयं अमेरिका ने कहा है कि पाकिस्तान द्वारा लगातार अपने नाभिकीय अस्त्रों में वृद्धि चिंता पैदा करती है। तो क्या अमेरिका ने उसके सामने कम से कम यह शर्त रखी है कि वह अपने नाभिकीय अस्त्रों में बढ़ोतरी न करे? इसकी जानकारी उसे भारत को अवश्य देनी चाहिए।

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