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राजनीतिः अंतरिक्ष में जंग का बढ़ता खतरा

अब वह दिन ज्यादा दूर नहीं लगता, जब ताकतवर मुल्क अंतरिक्ष में भेजे जा रहे अपने उपग्रहों को सिर्फ जासूसी के काम में नहीं लगाएंगे, बल्कि मिसाइलों से लैस कर उन्हें लड़ाकू भूमिका में भी ला सकते हैं और सिर्फ एक बटन दबा कर धरती पर बैठे-बैठे अंतरिक्ष में तबाही ला सकते हैं।

अमेरिका ने आरोप लगाया है कि इस रूसी जासूसी उपग्रह से मध्य जुलाई, 2020 में मिसाइल जैसी कोई चीज निकली, जो एक अन्य रूसी उपग्रह के पास से होकर गुजर गई।

संजय वर्मा

आज से बारह साल पहले 2008 में अमेरिका ने अंतरिक्ष से बेकाबू होकर गिर रहे अपने जासूसी उपग्रह को एक इंटरसेप्टर मिसाइल से मार गिराया, तो दुनिया में बड़ी सनसनी फैल गई थी। अमेरिका का कहना था कि धरती की तरफ बढ़ते उस उपग्रह को अंतरिक्ष में नष्ट करना ही इकलौता उपाय था। यदि ऐसा नहीं किया जाता तो वह अनियंत्रित होकर आबादी वाले किसी हिस्से में गिर सकता था। ऐसा होने पर उपग्रह में मौजूद खतरनाक किस्म का ईंधन- हाइड्राजीन भारी मुसीबत बन जाता, क्योंकि उसकी चपेट में आने वाले इंसान और जानवरों के फेफड़े, त्वचा और बालों को नुकसान हो सकता था। लेकिन तब अमेरिका के सतत प्रतिद्वंद्वी रूस ने अमेरिकी कार्रवाई पर सवाल खड़े कर दिए। रूस ने कहा कि उपग्रह को अंतरिक्ष में नष्ट करना तो सिर्फ बहाना भर था। असल में अमेरिका तो अंतरिक्ष युद्ध की अपनी महत्त्वाकांक्षी परियोजना पर अमल करते हुए अपने अंतरिक्षीय हथियारों का परीक्षण करना चाहता था। एक चिंता यह भी पैदा हुई कि अंतरिक्ष में उपग्रहों को मार गिराने से वहां कचरे की समस्या और बढ़ जाएगी।

इधर ये दोनों आशंकाएं पूरी ताकत से एक बार फिर मानव समुदाय के सामने आकर खड़ी हो गई हैं। हालांकि इस बार ऐसी गतिविधि का आरोप अमेरिका ने रूस पर मढ़ा है। मामला बीते साल नवंबर में अंतरिक्ष की कक्षा में स्थापित किए गए रूस के जासूसी उपग्रह कॉस्मॉस-2542 का है, जिसे लेकर अमेरिका ने एक के बाद एक कई खुलासे किए हैं। अमेरिका ने आरोप लगाया है कि इस रूसी जासूसी उपग्रह से मध्य जुलाई, 2020 में मिसाइल जैसी कोई चीज निकली, जो एक अन्य रूसी उपग्रह के पास से होकर गुजर गई। अमेरिका ने इस चीज को एक उपग्रह भेदी मिसाइल बताया। अमेरिका ने आरोप लगाया है कि इस तरह रूस अंतरिक्ष का सैन्यीकरण कर रहा है। यानी बाजी पलट गई है। जैसे आरोप पहले अमेरिका पर रूस लगाता था, अब कुछ वैसा ही भय अमेरिका रूस की तरफ से महसूस कर रहा है। सिर्फ अमेरिका ही नहीं, ब्रिटेन के अंतरिक्ष निदेशालय ने भी बयान जारी कर कहा कि रूस ने हथियार जैसी किसी चीज को प्रक्षेपित कर अपने एक उपग्रह का परीक्षण किया है, उसे लेकर हम चिंतित हैं क्योंकि इस तरह की कार्रवाई अंतरिक्ष के शांतिपूर्ण इस्तेमाल के लिए खतरा है। अमेरिका और ब्रिटेन, दोनों का कहना है कि यह उपग्रह को मार गिराने वाली मिसाइल थी, जिसका रूस ने परीक्षण किया है।

इस पूरे मामले पर रूस की सफाई भी आई है। उसके रक्षा मंत्रालय ने बयान जारी किया है कि 15 जुलाई को जो परीक्षण किए गए थे, उनसे किसी भी दूसरे अंतरिक्ष यान के लिए कोई खतरा पैदा नहीं हुआ और न ही इसने किसी भी अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन किया। रूस का कहना है कि यह उपग्रह भेदी मिसाइल नहीं, बल्कि उपग्रह कॉस्मॉस-2542 के अंदर से निकला एक अन्य छोटा उपग्रह है। उल्लेखनीय है कि इसी साल फरवरी में इस उपग्रह पर नजर रख रहे अमेरिका ने दावा किया था कि कॉस्मॉस-2542 से एक नया उपग्रह कॉस्मॉस-2543 निकला था और ये दोनों उपग्रह तब से करीब सौ मील की दूरी पर रहते हुए एक अमेरिकी जासूसी उपग्रह की निगहबानी कर रहे हैं।

जितना हैरतअंगेज मामला उपग्रह के अंदर से नया उपग्रह निकाल देने वाला था, उतना ही आश्चर्यजनक यह भी है कि कोई उपग्रह अंतरिक्ष में रहते हुए अपने भीतर से कोई मिसाइल छोड़े और किसी अन्य उपग्रह पर हमला कर दे। हालांकि इसकी पुष्टि नहीं हो सकी है कि कॉस्मॉस-2542 से निकली चीज मिसाइल ही थी। लेकिन इस ताजा मामले को देखते हुए अब वह दिन ज्यादा दूर नहीं लगता, जब ताकतवर मुल्क अंतरिक्ष में भेजे जा रहे अपने उपग्रहों को सिर्फ जासूसी के काम में नहीं लगाएंगे, बल्कि मिसाइलों से लैस कर उन्हें लड़ाकू भूमिका में भी ला सकते हैं और सिर्फ एक बटन दबा कर धरती पर बैठे-बैठे अंतरिक्ष में तबाही ला सकते हैं।

अब तक दुनिया के चार देश- अमेरिका, रूस, चीन और भारत अंतरिक्ष में उपग्रह भेदी मिसाइल तकनीक को लेकर अपनी क्षमताओं का प्रदर्शन कर चुके हैं। भारत ने वर्ष 2019 में ‘मिशन शक्ति’ के तहत अंतरिक्ष में तीन सौ किलोमीटर दूरी पर स्थित लो अर्थ ऑर्बिट (एलइओ) सैटेलाइट को मार गिराया था। यह एक मौसम उपग्रह था। रक्षा वैज्ञानिकों का मानना है कि इस तरह भारत ने अंतरिक्ष में युद्ध छिड़ने की आशंकाओं के मद्देनजर प्रतिरोधक शक्ति हासिल कर ली है। यदि कोई देश हमारे उपग्रहों को निशाना बनाएगा, तो भारत अंतरिक्ष में जवाबी कार्रवाई कर सकता है। पड़ोसी चीन ने तो साल 2007 में ही अंतरिक्ष में आठ सौ किलोमीटर की ऊंचाई पर स्थित अपने उपग्रह को नष्ट कर यह ताकत हासिल कर ली थी।

लेकिन मूल प्रश्न यही है कि इसकी शुरुआत कैसे हुई और ऐसे युद्ध की आशंका कितनी ज्यादा है। महाशक्ति देश अमेरिका तो हमेशा ही इस मामले में अपनी बादशाहत कायम करना चाहता है। इसका सपना सबसे पहले 1983 में तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन ने देखा था। वे चाहते थे कि पृथ्वी पर जो युद्ध होते हैं, उन पर अंतरिक्ष में तैनात सैनिक उपग्रहों और उपकरणों से इस तरह नियंत्रण पाया जाए कि अमेरिका और उसके मित्र देश हमेशा बढ़त पा सकें। हालांकि तमाम कारणों से करीब तेरह साल तक इन योजनाओं पर अमेरिका अमल नहीं कर सका। पर 1996 में बिल क्लिंटन के सत्ता में आते ही इस पर नए सिरे से सुगबुगाहट शुरू हो गई। लेकिन इस पर होने वाले खर्च और अंतरिक्ष की शांति के मद्देनजर क्लिंटन प्रशासन ने योजना को ठंडे बस्ते में डालना उचित समझा। हालांकि जॉर्ज बुश और डोनाल्ड ट्रंप अलग ही सोच के निकले। सन 2008 में बुश प्रशासन ने अंतरिक्ष में हथियारों की तैनाती पर एक रिपोर्ट में कहा था कि इससे न सिर्फ अमेरिका अपनी सैन्य क्षमता बढ़ा सकता है, बल्कि दूसरे देशों को अंतरिक्ष में बढ़त लेने से रोक सकता है।

ट्रंप प्रशासन को महसूस हुआ कि रूस-चीन की इस मामले में बढ़त को देखते हुए जरूरी है कि स्टार वॉर की योजनाओं को झाड़-पोंछ कर फिर से देखा जाए और अंतरिक्ष से क्या युद्ध हो सकते हैं- इसकी संभावनाएं टटोली जाएं। इस बाबत मार्च,2018 में अमेरिकी रक्षा खुफिया के निदेशक लेफ्टिनेंट जनरल रॉबर्ट पी. एश्ले जूनियर ने अमेरिकी सीनेट आर्म्ड सविर्सेज कमेटी के सामने बयान दिया था कि रूस और चीन ऐसे हथियार विकसित कर रहे हैं जिनका इस्तेमाल वे अंतरिक्ष में जंग में कर सकते हैं। इसलिए जरूरी है कि अमेरिका इसकी तैयारियों के बारे में पुनर्विचार करे।

वैसे तो अभी तक इस तकनीक से संपन्न सभी देश यह दावा कर रहे हैं कि अंतरिक्ष में हथियारों के परीक्षण का मकसद अपनी सुरक्षा को पुख्ता करना है। इसकी वजह यह है कि ज्यादातर देशों की अर्थव्यवस्था अब अंतरिक्ष में तैनात कामकाजी उपग्रहों पर टिकी है। ये उपग्रह मौसम पर नजर रखते हैं, इंटरनेट से लेकर दूरसंचार के तमाम कार्यों को संपन्न कराते हैं, दुश्मन देशों की गतिविधियों की निगरानी करते हैं और पृथ्वी के अन्वेषण का काम करते हैं, जिनसे जरूरी डाटा मिलता है और देश के विकास में मदद मिलती है। ऐसे में यदि कोई देश किसी मुल्क को ठप करना चाहे तो उसके उपग्रहों को निशाना बना कर कर सकता है और धरती पर वास्तविक जंग किए बगैर भारी नुकसान पहुंचा सकता है। ऐसे में यदि उपग्रहों पर निर्भर देश अंतरिक्ष में तैनात अपने उपग्रहों की सुरक्षा के उपाय के तौर पर भी उपग्रह रोधी मिसाइलों का परीक्षण करता है, तो उससे भी अंतरिक्ष की जंग का खतरा पैदा होता है।

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