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शहरीकरण और नीतिगत खामियां

पिछले एक-दो दशक में भारत के दर्जनों शहरों की स्थिति पूरी तरह बदल गई है।

शहरीकरण और नीतिगत खामियां
सांकेतिक फोटो।

अभिषेक कुमार सिंह

हाल में बंगलुरु जिस तरह से बारिश में डूबा नजर आया, उससे यह सवाल उठा कि क्या यही वह शहर है, जिसके बल पर हमारा देश खुद की तरक्की के दावे करता है। बेतरतीब शैली का शहरी विकास अपने साथ कैसी-कैसी समस्याएं पैदा कर सकता है, यह बात देश की राजधानी दिल्ली और इससे सटे एनसीआर कहलाने वाले शहरों (गुरुग्राम, गाजियाबाद, नोएडा आदि) में भी कई स्तरों पर दिखाई देती है।

दुनिया के एक प्रतिष्ठित विचार समूह आक्सफोर्ड इकोनोमिक्स ने वर्ष 2018 में दुनिया के कई बड़े और मझोले शहरों की बदलती आर्थिक हैसियत को लेकर सात सौ अस्सी शहरों के बारे में रिपोर्ट पेश की थी। इसमें दावा किया गया था कि 2019 से 2035 के बीच भारत, चीन और इंडोनेशिया के कई शहर यूरोप और अमेरिका के शहरों को पीछे छोड़ देंगे। रिपोर्ट में तेजी से विकसित होते जिन शीर्ष बीस शहरों का विशेष जिक्र किया गया था, उनमें सत्रह भारत के थे। दिल्ली, मुंबई, बंगलुरु, हैदराबाद और सूरत के अलावा नागपुर, तिरुपुर और राजकोट जैसे शहरों को इस सूची में जगह दी गई थी। इस सूची ने हमारे कुछ शहरों को कुछ चमक जरूर दी थी, पर हाल में बारिश के बाद पानी में डूबे बंगलुरु और पुणे आदि शहरों की जो दुर्दशा देखने को मिली, वह सारी उम्मीदों पर पानी फेर रही है।

पिछले एक-दो दशक में भारत के दर्जनों शहरों की स्थिति पूरी तरह बदल गई है। देश में चल रही सौ शहरों को आधुनिक शहर (स्मार्ट सिटी) में बदलने वाली परियोजना का उद्देश्य तेज विकास कर मझोले और छोटे शहरों की चमक-दमक बढ़ाना भी है। मगर आर्थिक गतिविधियों और रोजगार के लिए पलायन कर शहरों की ओर आ रही भीड़ के आंकड़े शहरों पर बढ़ रहे दबाव का खुलासा करते हैं।

बंगलुरु जैसे शहर इसकी मिसाल हैं जहां दुनिया की सैकड़ों बड़ी सूचना प्रौद्योगिकी कंपनियों के दफ्तर हैं। हालांकि इसका एक बड़ा फायदा निश्चित तौर पर हमारी उस युवा आबादी से जुड़ा है, जिसे इन शहरों में बेहतरीन रोजगार मिले हुए हैं। यही नहीं, तेज तरक्की कर रहे शहरों की बदौलत लोहा, सीमेंट से लेकर उपभोक्ता वस्तुएं बनाने वाली कंपनियों को भी ढेरों काम मिलता है और उनकी मोटी कमाई होती है।

लेकिन सवाल इस बात का है कि क्या हमारे ज्यादातर शहर आगे भी इसी तरह रोजगार देते रहेंगे, या फिर आबादी के बोझ, बुनियादी ढांचे पर पड़ते दबावों और पर्यावरणीय कारणों से वे तबाही के ऐसे मुकाम पर पहुंच जाएंगे, जहां उनके लिए कोई उम्मीद बाकी नहीं रहेगी। विडंबना यह है कि आज हम जिन शहरों को बड़ी उम्मीदों के साथ देखते हैं, उनका दम घुटने लगा है। विकास के रास्ते पर तेजी से भागते हुए ये शहर हांफने लगे हैं और इनका भविष्य दिनों-दिन डरावना होने लगा है।

भारत की आइटी-धुरी कहलाने वाले बंगलुरु महानगर को करीब साढ़े तीन हजार आइटी कंपनियों ने अपना ठिकाना बनाया है। इससे अमेरिकी की सिलिकान वैली की चमक धुंधली पड़ गई। कहा जाने लगा था कि जो रोजगार और कारोबार सिलिकान वैली में संभव में है, वैसा ही कुछ बंगलुरु में हो सकता है। लेकिन हाल में बंगलुरु जिस तरह से बारिश में डूबा नजर आया, उससे यह सवाल उठा कि क्या यही वह शहर है, जिसके बल पर हमारा देश खुद की तरक्की के दावे करता है।

बेतरतीब शैली का शहरी विकास अपने साथ कैसी-कैसी समस्याएं पैदा कर सकता है, यह बात देश की राजधानी दिल्ली और इससे सटे एनसीआर कहलाने वाले शहरों (गुरुग्राम, गाजियाबाद, नोएडा आदि) में भी कई स्तरों पर दिखाई देती है। यहां सड़कों का जाल है, मेट्रो दिल्ली और एनसीआर के कई इलाकों में दस्तक दे चुकी है और इसका दायरा बढ़ता ही जा रहा है। इसी के साथ बिजली की बढ़ती खपत एक नया संकट खड़ा कर रही है। दिल्ली में बिजली की मांग के पिछले सभी रिकार्ड टूटते जा रहे हैं।

रोजाना इतनी बिजली की आपूर्ति के लिए कितने बड़े स्तर पर प्रबंध करने की जरूरत है, इसका अंदाजा इससे लगाया जा रहा है कि इसके लिए उत्तराखंड के विशालकाय टिहरी पावर प्लांट जैसे छह से अधिक बिजलीघरों चाहिए होंगे। देश के सिर्फ एक ही शहर को जगमग रखने के लिए हजार मेगावाट की क्षमता वाले छह या इससे ज्यादा बिजलीघर लगाने पड़ें, तो सोचा जा सकता है कि आखिर ये शहर हमारे लिए कैसी समस्याएं खड़ी करने वाले हैं।

शहरीकरण जो समस्याएं पैदा कर रहा है, उसका दूसरा संदर्भ विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्लूएचओ) और यूएन-हैबिटेट द्वारा संयुक्त रूप से किए गए अध्ययन की रिपोर्ट से मिलता है। रिपोर्ट बताती है कि शहरों की इमारतों और घरों को रोशन करने, उन्हें ठंडा रखने व पानी को शीतल करने वाले उपकरणों जैसे एअरकंडीशनर, फ्रिज, वाटर कूलर आदि के इस्तेमाल और कारों के प्रयोग की वजह से शहरी इलाकों के औसत तापमान में एक से तीन डिग्री सेल्सियस की वृद्धि हो जाती है।

रिपोर्ट में इस बदलाव को ‘अर्बन हीट आइलैंड इफेक्ट’ की संज्ञा दी गई है। कारों से निकलने वाला धुआं वातावरण में सिर्फ कार्बन डाई-आक्साइड ही नहीं झोंकता, बल्कि आसपास के तापमान को भी बढ़ाता है। इसी तरह फ्रिज, एसी, वाटर कूलर जैसे उपकरण भी अपने आसपास गर्मी पैदा करते हैं। इससे मई-जून जैसे गर्म महीनों में शहर और गर्म हो जाते हैं।

मौसमी बदलाव के कारण प्राकृतिक गर्मी से मुकाबले के लिए जो साधन और उपाय आजमाए जा रहे हैं, उनमें कमी लाना नीतिगत बदलावों के बिना संभव नहीं है। अभी हमारे योजनाकार देश की आबादी की बढ़ती जरूरतों और गांवों से पलायन कर शहरों की ओर जाती आबादी के मद्देनजर आवास समस्या का ही जो उपाय सुझा रहे हैं, वह शहरों की आबोहवा को बिगाड़ने का बड़ा कारण बनेगी। जैसे, एक उपाय यह है कि अब शहरों में ऊंची इमारतें बनाने को प्राथमिकता दी जाए।

इस नीति ने दिल्ली-मुंबई ही नहीं, बंगलुरु-हैदराबाद आदि शहरों के बड़े इलाके को कंक्रीट के जंगलों में बदल डाला है। एक सच यह भी है कि सुविधाओं के नाम पर भयानक प्रदूषण झेलते ये शहर बुनियादी ढांचे पर बढ़ते दबाव, महंगाई और कामकाज की जगहों से रिहाइश की बढ़ती दूरियों के कारण लोगों के लिए सुविधा की बजाय दुविधा का केंद्र बन चुके हैं। ऐसे में जब अतिशय बारिश या गर्मी का कहर अलग से टूटता है, तो शहरीकरण के नाम पर जुटाई गई सारी संपदा बेमानी लगने लगती है।

फिलहाल देश के ज्यादातर शहरों की पहली बुनियादी समस्या ढांचागत सुविधाओं की बिगड़ती स्थिति से जुड़ी है। सड़कें, सीवर, बिजली और पानी की कमी के बाद अवैध कब्जों और बिना किसी नियोजन के विकास ने ज्यादातर शहरों को नरक जैसी स्थितियों में धकेल दिया है। इसके बाद सरकारी योजनाओं की खामियां दो स्तरों पर हैं। पहली तो यह कि जब भी शहरी विकास की बात होती है तो पहले से बसे-बसाए शहरों में ही सुविधाएं बढ़ाने की योजनाएं पेश की जाती हैं।

यूपीए सरकार की योजना- अर्बन रिन्यूअल मिशन और मौजूदा एनडीए सरकार की स्मार्ट सिटी परियोजनाओं को इसी खाते में डाला जा सकता है। दूसरे, सरकार उन इलाकों को आरंभ में शहर नहीं मानती जो बड़े शहरों के आसपास अपने आप बेतरतीब तरीके से विकसित होते जाते हैं। दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, कानपुर, इंदौर आदि किसी भी बड़े शहर के आसपास के इलाके शहर की सरकारी परिभाषा के दायरे में नहीं आते, लिहाजा इन्हें तब तक बिजली, पानी, सीवर, सड़क, स्कूल, अस्पताल, मेट्रो रेल जैसी सुविधाएं मुहैया नहीं कराई जाती हैं, जब तक कि उनका विकास एक राजनीतिक मुद्दा न बना दिया जाए।

असल में, शहरों को स्मार्ट बनाने का जिम्मा सिर्फ सरकारों पर छोड़ने का ही खामियाजा है जो हमारे शहर आज भुगत रहे हैं। अतिक्रमण बड़ी और गंभीर समस्या बन चुका है। नागरिक दायित्वों का घोर अभाव ऐसी समस्याओं को और जटिल बना रहा है। ऐसे में बेहतर होगा कि जनता और सरकार, दोनों अपने गिरेबान में झांकें। तभी शहरों की बीमारियों और उनके निदान के सही रास्ते खोजे जा सकेंगे।

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First published on: 26-09-2022 at 06:22:14 am