ताज़ा खबर
 

राजनीति: ब्रह्मांड में जीवन का रहस्य

हमें यह तो पता है कि डार्क एनर्जी क्या कर रही है, पर यह नहीं पता कि असल में यह है क्या। अगर यह पता चल जाए तो अतीत, वर्तमान और भविष्य की तमाम गुत्थियां खुल सकती हैं। आखिर में इस ब्रह्मांड का क्या होगा, यह इस बात पर तय होगा कि डार्क एनर्जी असल में है क्या। पहला ब्लैक होल कैसे बना? पहली आकाश गंगा कैसे बनी? बिग बैंग से पहले क्या हुआ?

ब्रह्मंंड का रहस्‍य (पोटो सोर्स वीकिपीडिया )

ब्रह्मांड शुरू से दार्शनिकों, वैज्ञानिकों के लिए कौतूहल और रहस्य का विषय रहा है। आज कई तरह के वैज्ञानिक उपकरणों, दूरबीनों और कृत्रिम उपग्रहों के जरिए इसके बारे में बहुत-सी जानकारियां प्राप्त हो चुकी हैं। लेकिन इस अनंत ब्रह्मांड की उत्पत्ति और खगोलीय पिंडों की रचना के बारे में बहुत-सी बातें अभी नहीं पता हैं। ब्रह्मांड कैसे बना, इस बारे में अंतिम रूप से प्रामाणित तथ्य हमारे पास नहीं हैं। खगोलविदों के अनुसार सबसे स्थापित सिद्धांत बिग बैंग है, जो इस ब्रह्मांड के शुरुआती चरण को दर्शाती है।

इसके अनुसार करीब एक सौ चालीस करोड़ साल पहले एक सूक्ष्म बिंदु में महाविस्फोट हुआ। इसे बिग बैंग कहते हैं। विस्फोट से बिंदु टुकड़े-टुकड़े होकर इधर-उधर छिटकने लगा। इसी से ब्रह्मांड की रचना हुई। आकाश गंगाएं, तारे, ब्लैक होल, ग्रह आदि बने। लेकिन ब्रह्मांड के फैलने का सिलसिला अब भी लगातार जारी है। लगता था कि एक समय इसका फैलना बंद हो जाएगा और यह वापस एक बिंदु में समा जाएगा।

लेकिन 1998 में हबल टेलिस्कोप से पता चला कि ब्रह्मांड तेजी से फैल रहा है। यानी कोई बाहरी ताकत है। वैज्ञानिकों का मानना है कि ऐसा डार्क एनर्जी के कारण हो रहा है। यह डार्क एनर्जी हमारे आसपास हर जगह मौजूद है। पर यह हमें दिखाई नहीं देती। इसीलिए इसे हम डार्क कहते हैं। इसे हम न तो माप सकते हैं और न ही इसकी जांच कर सकते हैं। हां, इसका असर हमें महसूस होता है। यह खाली जगहों पर पाई जाती है। ब्रह्मांड जितना हमें दिखता है, वह समूचे ब्रह्मांड का सिर्फ पांच फीसद हिस्सा है। डार्क एनर्जी अड़सठ फीसद है।

बाकी सत्ताईस फीसद डार्क मैटर है। यह सन 1933 में खोजा गया था। इसे भी देखना मुमकिन नहीं है, लेकिन इसका असर दिखता है। दरअसल, डार्क मैटर ही इतना ताकतवर गुरुत्वाकर्षण पैदा कर रहा है कि आकाश गंगा के सारे तारे एक ही गैलेक्सी में बंधे रहते हैं। वे इधर-उधर नहीं बिखरते। यह डार्क मैटर न तो रोशनी को जज्ब करता है और न ही उसे रिफ्लेक्ट करता है। यह अणु-परमाणु से न बना होकर ऐसे जटिल और अनोखे कणों से बना है, जिनके बारे में हमें अभी तक पता नहीं चला है।

कुल मिलाकर डार्क मैटर ब्रह्मांड को बांधे रखने का काम करता है, जबकि डार्क एनर्जी ब्रह्मांड का लगातार विस्तार करती रहती है, जिसकी वजह से हर गैलेक्सी का एक-दूसरे से फासला बढ़ता जा रहा है। इसी ब्रह्मांड में ब्लैक होल नाम की ऐसी चीज भी है, जो अपने दायरे में आने वाली हर चीज को निगल जाती है। ब्लैक होल सब कुछ खींच लेता है, यहां तक कि रोशनी को भी। खगोलविदों के अनुसार कुछ गलत धारणाएं भी पैदा हो गई हैं। एक तो यह कि इस ब्रह्मांड का कोई केंद्र है। सच्चाई यह है कि ब्रह्मांड का कोई केंद्र नहीं है।

दूसरी गलत धारणा यह है कि ब्रह्मांड कुछ और बनने के लिए फैल रहा है, जबकि सच्चाई यह है कि ब्रह्मांड फैल तो रहा है, पर कुछ अलग बनने के लिए नहीं। अकसर एक मिसाल दी जाती है गुब्बारे के फैलने की। ब्रह्मांड वैसे ही फैल रहा है जैसे हवा भरने पर गुब्बारा फैलता जाता है। पर यह तुलना एक सीमा तक ही सही है। गुब्बारा जैसे-जैसे फूलता है, वह बाहर हवा की जगह को घेरता है, पर ब्रह्मांड खुद में फैलता है। उसका विस्तार किसी बाहरी इलाके में नहीं होता।

डार्क मैटर की प्रकृति क्या है, यह किस चीज से बना है? डार्क एनर्जी क्या है? यह एक तरह से कार के एक्सेलरेटर की माफिक ब्रह्मांड के फैलने की रफ्तार बढ़ा रही है। हमें यह तो पता है कि डार्क एनर्जी क्या कर रही है, पर यह नहीं पता कि असल में यह है क्या। अगर यह पता चल जाए तो अतीत, वर्तमान और भविष्य की तमाम गुत्थियां खुल सकती हैं।

आखिर में इस ब्रह्मांड का क्या होगा, यह इस बात पर तय होगा कि डार्क एनर्जी असल में है क्या। पहला ब्लैक होल कैसे बना? पहली आकाश गंगा कैसे बनी? बिग बैंग से पहले क्या हुआ? इन सवालों के जवाब अभी वैज्ञानिक खोज रहे हैं। हमारे चारों तरफ पृथ्वी की तरह के करीब पांच हजार ग्रह हैं। कहीं न कहीं जिंदगी होगी और यह जिंदगी जरूरी नहीं कि हमारी तरह हो। बहुत प्राथमिक स्तर का जीवन भी हो सकता है। मछली जैसा या हमसे उन्नत प्राणी भी हो सकते हैं। लेकिन अपने ग्रह के हिसाब से हम कुछ प्रभावी हैं। हमारे पास विनाश की क्षमता है। हम अपने ग्रह को बर्बाद कर रहे हैं। जलवायु परिवर्तन हो रहा है।

वैज्ञानिक धरती से रेडियो तरंगें भेज कर एलियन्स से संपर्क करने की कोशिश करते रहे हैं। मगर अब तक एलियन्स ने इंसान के किसी भी संदेश का जवाब नहीं दिया है। एलियन कहां हैं? हैं भी या नहीं? ये सवाल मशहूर भौतिक विज्ञानी एनरिको फर्मी ने 1950 में अपने एक सहकर्मी से पूछा था। फर्मी का मानना था कि इस ब्रह्मांड में इंसानों जैसी कई और बुद्धिमान सभ्यताएं अलग-अलग ग्रहों पर मौजूद हैं। लेकिन फिर सवाल उठता है कि अगर वे हैं तो उनसे हमारा संपर्क क्यों नहीं हो पाता? वे आखिर हैं कहां? ये सवाल बेहद अहम हैं और इनके कारण पैदा हुए विरोधाभास को फर्मी पैराडॉक्स के नाम से जाना जाता है। एसईटीआई (सेटी) यानी रिसर्च फॉर एक्स्ट्रा टेरेस्ट्रियल इंटेलिजेंस संस्था कई सालों से इस सवाल का जवाब तलाश रही है।

हमारी आकाश गंगा में ही करीब सौ अरब तारे हैं। विरोधाभासी फर्मी पैराडॉक्स का आॅक्सफर्ड विश्वविद्यालय के तीन अकादमिकों ने हाल ही में फिर से मूल्यांकन किया। उन्होंने इससे जुड़ा एक अध्ययन किया है, जिसे नाम दिया गया है डिजॉल्विंग द फर्मी पैराडॉक्स स्टडी। इसके मुताबिक इस बात की संभावना ज्यादा है कि इंसान ब्रह्मांड में अकेला जीवित बुद्धिमान प्राणी है।

यानी एलियन्स का होना लगभग नामुमकिन है। यह अध्ययन करने वाले तीन विशेषज्ञों में से एक एंडर्स सैंडबर्ग हैं। वे आॅक्सफर्ड विश्वविद्यालय के फ्यूचर आॅफ ह्यूमैनिटी इंस्टीट्यूट के रिसर्चर हैं। दूसरे वैज्ञानिक हैं एरिक ड्रेक्सलर। इनका नैनोटेक्नोलॉजी की अवधारणा खासा लोकप्रिय हैं। इनके अलावा इसी अकादमिक सेंटर में दर्शनशास्त्र के प्रोफेसर टॉड आॅर्ड इस अध्ययन से जुड़े थे। इस अध्ययन में फर्मी पैराडॉक्स के एक गणितीय आधार का विश्लेषण किया गया है, जिसे ड्रेक समीकरण कहा जाता है। ड्रेक समीकरण का पहले इस्तेमाल किया जाता था। इससे उन संभावित जगहों की लिस्ट बनाई जाती थी, जहां जीवन हो सकता है।

अंतरिक्ष वैज्ञानिक इस निष्कर्ष पर पहुंच गए हैं कि पृथ्वी के अलावा दूसरे ग्रहों पर प्राणियों (एलियंस) का अस्तित्व है। एलियंस तकनीकी विकास में मनुष्यों से कहीं आगे हैं और वे हमारी गतिविधियों पर नजर रखे हुए हैं। स्पेन के इंस्टीट्यूट एस्टोफिसिका डेल केनारियास और फ्लोरिडा विवि के अंतरिक्ष वैज्ञानिकों के एक दल का मानना है कि दूसरे ग्रहों के प्राणी पृथ्वी पर मनुष्यों द्वारा विकसित तकनीकों के इस्तेमाल को शायद कौतूहल से देख रहे हैं।

नासा के एक वैज्ञानिक ने अनुमान जताया है कि हो सकता है, एलियंस धरती पर आए हों, लेकिन हमें पता न चला हो। नासा के कम्प्यूटर वैज्ञानिक और प्रोफेसर सिल्वानो पी. कोलंबो ने एक शोध-पत्र में दावा किया है कि हो सकता है कि एलियंस की संरचना परंपरागत कार्बन संरचना पर आधारित न हो, इसलिए हमें इनका पता न चल पाया हो। सिल्वानो ने कहा कि एलियंस संभवत इंसानों की कल्पना से बिल्कुल अलग दिखते हों। एक अध्ययन के अनुसार हमारी आकाश गंगा में एक सौ साठ अरब ग्रह हैं, जहां एलियंस हो सकते हैं।

Hindi News के लिए हमारे साथ फेसबुक, ट्विटर, लिंक्डइन, टेलीग्राम पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News AppOnline game में रुचि है तो यहां क्‍लिक कर सकते हैं।

Next Stories
1 राजनीति : संयुक्त राष्ट्र के पुनर्गठन की जरूरत
2 राजनीतिः सुशासन और संसाधन
3 राजनीतिः एक अनथक योद्धा
ये पढ़ा क्या?
X